सावित्री बाई फुले

महिलाओं और शूद्रों को पढ़ाने का बीड़ा उठाने वाली भारत की प्रथम महिला टीचर

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पत्रकार, मीना कोतवाल की क़लम से

भारत की प्रथम महिला टीचर माता सावित्री बाई फुले ने महिलाओं और शूद्रों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया था. ऐसा करने के लिए उन्होंने अपनी जान की बाजी तक लगा दी थी. जब भी वे पढ़ाने जाती थीं तो ब्राह्मणवादी लोग उनपर गोबर और पत्थर फेंकते थे. मनुवादियों को लगता था कि ऐसा करने से सावित्री बाई फुले पढ़ाना छोड़ देंगी. लेकिन प्रथम महिला टीचर ब्राह्मणवादियों के आगे नहीं झूकीं.

वे जब भी पढ़ाने जातीं तो 2 साड़ी साथ लेकर जाती थीं. रास्ते में गोबर फेंकने वाले ब्राह्मणों का मानना था कि शूद्रों और महिलाओं को पढ़ने का अधिकार नहीं है, यह पाप है, मनु के विधान के खिलाफ है. सावित्री बाई फुले घर से जो साड़ी पहनकर निकलती थीं वो दुर्गंध से भर जाती थी. स्कूल पहुंच कर वे दूसरी साड़ी पहन लेती थीं. फिर महिलाओं और शूद्रों को पढ़ाने लगती थीं.

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सावित्री बाई फुले उस दौर में अपने पति को खत लिखा करती थीं. उन खतों में सामाजिक मुद्दों और ब्राह्मणवादी व्यवस्था का जिक्र होता था. 1868 में गणेश नाम के एक ब्राह्मण को छोटी जाति की महिला से प्यार होता है, महिला 6 महीने की पेट से हो जाती है. यह बात गांव वालों को पता चलती है, सब दोनों को जान से मारने के लिए इकट्ठा होते हैं. तभी सावित्री बाई फुले वहां पहुंचती हैं और अपनी जानपर खेलकर दोनों को बचा लेती हैं.

इस घटना का उल्लेख मां सावित्री बाई फुले ने अपने खत में किया है, यह खत उन्होंने ज्योतिराव फुले को 29 अगस्त 1868 को लिखा था.इसी तरह एक दूसरे खत में वह अपने भाई की सोच का जिक्र करती हैं. 1856 में माता सावित्री बाई फुले का छोटा भाई कहता है, ‘आप पती-पत्नी शूद्रों के लिए काम कर कुल-मर्यादा का उल्लंघन कर रहे हो.’ तब ज्योतिराव फुले को लिखे एक खत में सावित्री बाई फुले लिखती हैं, ‘मैंने उसकी बात को काटते हुए कहा, तुम्हारी बुद्धि ब्राह्मणों की सीख से दुर्बल हो गई है.

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तुम बकरी, गाय इन को प्यार से पाल लेते हो, नागपंचमी पर नाग को दूध पिलाते हो. महार-मांग (दलित) तुम्हारे जैसे मानव हैं. उनको तुम अछूत समझते हो इसकी वजह बताओ, ऐसा सवाल मैंने उससे किया.’देश की मेरी प्यारी महिलाओं जिन राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले की वजह से आज आप पढ़, लिख और बोल पा रही हैं उनके सम्मान में कलम न रूकने देना. उनके विचारों को पढ़ना, घर-घर जाकर उनके बारे में बताना.

जो दुष्ट मनु महिलाओं और शूद्रों को जानवर समझता था, उन्हें दासता से मुक्ति दिलवाने में सावित्री बाई फुले का बड़ा योगदान है. उन्होंने तब बलात्कार से पीड़ित विधवा महिलाओं की प्रसूति के लिए शेल्टर खोले थे. अकाल और महामारी के दौरान जान हथेली पर लेकर लोगों की सेवा की. इतना ही नहीं उस दौर में अपने पति महात्मा ज्योतिराव फुले के अर्थी को कंधा दिया था.ऐसी थी हमारी मां सावित्री बाई फुले.

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