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भारत की 130 करोड़ आबादी 19,059 भाषाओं में करती है संवाद: रिपोर्ट

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भारत में 1872 से ही हर 10 सालों में जनगणना होती है। 1931 में जो जनगणना हुई वह कुछ ख़ास थी, क्योंकि उसमें जाति की भी जनगणना हुई। उसके बाद 1941 की जनगणना दुसरे विश्व युद्ध की वजह से प्रभावित हुई। जबकि 1951 में भी भाषाओं को नहीं गिना गया।
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नई दिल्ली, 19 जुलाई।। रिपोर्ट- अल्फांसो जॉनसन। देश दुनिया में भाषाओं का इतिसास काफी पुराना समझा जाता है। संवाद के लिए पहले साइन लेंग्वेज का उपयोग किया जाता था लेकिन बदलते वक्त के बाद धीरे-धीरे मानव सभ्यता ने लिपि की खोज कर उससे कम्यूनिकेट करना सीखा। आज दुनिया भर में हजारों भाषाएं प्रचलित हर समाज में अपनी खुद की भाषा का बड़ा महत्व है।

नए जमाने में डिजीटल और मैसेज लेंग्वेज भी एक प्रकार की भाषा ही कही जा सकती है। हांलाकि इन भाषओं को सहेज कर रखना भी किसी चैलेंजिंग काम से कम नहीं है। जब  भीकोई भाषा लुप्त हो जाती है, तो उस भाषा में सदियों से इकठ्ठा किया गया ज्ञान भी उसी के साथ ख़त्म हो जाता है। किसी भी भाषा का लुप्त होना अपने आप में एक हिंसा है। नीति में एक छोटा बदलाव भी पूरी संस्कृति नष्ट कर देता है। ऐसा कई बार देखने को मिला।

भारत में 1872 से ही हर 10 सालों में जनगणना होती है। 1931 में जो जनगणना हुई वह कुछ ख़ास थी, क्योंकि उसमें जाति की भी जनगणना हुई। उसके बाद 1941 की जनगणना दुसरे विश्व युद्ध की वजह से प्रभावित हुई। जबकि 1951 में भी भाषाओं को नहीं गिना गया।

साल 1961 में हुई जनगणना में भाषाओं को गिना गया, जिससे ये पता लगा कि देशभर में करीब 1652 भाषाएँ बोली जा रही थी। लेकिन 1971 में ये बताया गया कि जिस भाषा को कम से कम दस हज़ार लोग बोलते होंगे उसे ही मातृभाषा कहा जायेगा। इस आधार पर केवल 109 भाषाएँ सामने आईं। ये अंतर देखने लायक था।

भारत में भाषाएँ गिनने की प्रक्रिया हर दशक के पहले साल में होती है, लेकिन इसकी रिपोर्ट करीब सात साल बाद आती है। वैसे ही 2011 की जनगणना के आंकड़े अब 2018 में आये हैं। 2011 में हुई भाषा की गिनती में पता लगा की भारत में 19,059 भाषाएँ बोली जाती है।

लेकिन अधिकारियों ने “पूर्व भाषीय सामाजिक सूचना” के आधार पर कहा है कि 18,200 भाषाएँ मातृभाषा में नहीं आती, इसलिए अब केवल 1,369 भाषाएं मातृभाषा मानी जाएँगी। इसके अलावा “अन्य” की भी सूची है, जिसमें करीब 1474 भाषाएँ हैं।

लेकिन 1971 में 109 और 2011 में 1369 भाषाओं का चयन होना ठीक तो है लेकिन ये हुआ कैसे? असल में भाषाओँ को 121 सूचियों में बाँट दिया गया है, जिसमें 22 भाषाएँ अनुसूचित 8 की भाषाएँ हैं और बाकी अन्य हैं।

भोजपुरी जो कि करीब पांच करोड़ लोगो द्वारा बोली जाती है, भोजपुरी को हिंदी के वर्ग में गिना गया है। राजस्थान और मध्य प्रदेश की कई भाषाओँ को हिंदी के वर्ग में गिना गया है। भाषाओ के इस जनगणना में कहा गया की 52,83,47,193 लोग हिंदी बोलते हैं। उसी प्रकार से जिन लोगो की दूसरी भाषा संस्कृत थी, उन्हें संस्कृत की सूची में रखा गया।

जबकि जिन लोगो की पहली भाषा अंग्रेजी थी, उनको अंग्रेजी के वर्ग में नहीं डाला गया। इस जनगणना अनुसार 2,59,678 लोगो की मात्रभाषा अंग्रेजी है। और अंग्रेजी कई भाषाओ को आपस में जोड़ती भी है।

हर भाषा का होना अपने आप एक बड़ा महत्व है। हाल ही में आये जनगणना के आंकड़ों से जिस तरह भाषाओं को सूचिबद्ध किया गया है, उससे कहीं बेहतर होता कि भाषाओं का चयन एक सही रूप में किया जाता जिसमें सभी भाषाओं को एक समान दर्जा मिलता।

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