आज़ाद पत्रकारिता के टुकड़े-टुकड़े करने पर आमादा भारतीय मीडिया?

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विचार|कार्तिक सागर समाधिया

वैचारिक खाई में गोते लगाता भारतीय मीडिया आखिर किस तरह की जंग में शहीद हो जायेगा यह कोई नहीं जानता। लेकिन अखबार से टीवी, टीवी से वेबसाइट, वेबसाइट से तमाम सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर आ चुके देश के चौथे स्तंम्भ के बीच अनोखी जंग छिड़ गई है। हम बात कर रहे हैं, गोदी मीडिया वर्सेस टुकड़े टुकड़े मीडिया! यह पत्रकारिता का नया दौर है। बांटने और बंटने का दौर है। इस दौर की कहानी 2012 के बाद की कहानी है। भारत के संक्रांति काल से अंधकार काल तक पहुँच चुकी मीडिया और आर्थिक स्थिति के बीच सीएए- एनआरसी की नागरिकता की अहम बहस की कहानी है। जिम्मेदारी पर सवालिया निशान की कहानी है।

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क्या बंट चुकी है जिम्मेदारियां?

अच्छा आपको बताते हैं, कि इस बहस का सिलसिला कहाँ से शुरू हुआ, लेकिन उससे पहले आपको बताता चलता हूँ इतिहास के प्रमुख पड़ावों पर मीडिया की भूमिका के बारे में… अंग्रेजों के साम्राज्यवाद के दौरान भारतीय मीडिया का प्रमुख लक्ष्य था जनता, मजलूमों की आवाज उठाना और अंग्रेजी सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ बोलना। उस समय रेडियो और अखबार , पत्रिका मीडिया के माध्यम हुआ करते थे। अंग्रेजी सरकार के खिलाफ खूब लिखा गया, माखनलाल चतुर्वेदी दादा से लेकर गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे कई पत्रकार जनता की आवाज के नुमाइंदे बनकर संघर्षरत थे। यहाँ पत्रकारिता का एक धर्म था, सरकार की नीतियों के बारे में जनता को बताना, और जनता की परेशानी की आवाज बन जाना। आजादी के बाद सत्ता विस्थापन और नागरिकों का विस्थापन जैसे तमाम पहलू के बाद अपने नियम कायदों ओर यह देश खड़ा हुआ, यहाँ की सरकार आम नागरिकों के लिए एक मुल्क एक राष्ट्र लेकर खड़ी हुई, चुनी गयी।

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सत्ता के शीर्ष पर सिर नवाजती पत्रकारिता का उदय

आजादी के बाद एक ऐसा दौर आया जब पूरे देश में एक अहमनिय प्रधानमंत्री ने आपातकाल लगा दिया। उस समय जनता के सामने बोलने के लिए कुछ था नहीं। तब लोगों के बीच विश्वास था पत्रकारिता के कारखाने से निकलने वाली हेडलाइंस! जिसको गोयनका और प्रभाष जोशी नाम के पत्रकार ने बखूबी निभाया। सरकार को झुकना पड़ा, आपातकाल हटाया गया। चुनाव हुए। नई सरकार बनीं। यहीं से शुरू हुआ सक्रांति काल की ओर प्राथमिक चरण जो 2020 तक आते आते एक अंधकार में बदल चुका है। इस काल का उत्कर्ष हमें 2014 के बाद देखने को मिलता है। खैर जानकारों के मुताबिक भारतीय पत्रकारिता अभी अपने किशोरावस्था में है। यह वह अवस्था है जब एक पीढ़ी एजेंडा और प्रोपेगंडा या विचारग्रसित रहती है। तो हम लोग थे, 80 के दशक के शुरूआती समय में, एक सर्वोदय के हलाल के बाद उपजी दुनिया के बाद की सरकार का दौर, गैरकांग्रेसी सरकार का दौर। सत्ता के आसन से बेदखल आजादी की लड़ाई की सबसे बड़ी पार्टी ने जायज तौर पर अपनी हार की समीक्षा की थी। यह वह समय था, जब कांग्रेस ने तय किया उसकी हार के कारण- शिक्षाविद, पत्रकार, शैक्षिक संस्थान जैसा धड़ा था। बस यहीं से शुरू होता है, शैक्षिक संस्थानों का विघटन, पत्रकारिता में वैचारिक ऊहापोह में विचरण करती एजेंडायुक्त और प्रोपेगंडाग्रस्त जर्नलिज्म। यहाँ से जो लिखावट के सूचनायुक्त खत पाठक तक पहुंचे उसके पीछे एक विचार था।

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पीएम मोदी के दौर में मीडिया के विभाजित रूप की स्पष्टता

जब राजनीती देश के विचार प्रसार से पार्टी के विचार प्रसार की ओर मोड़ दी गयी हो तब यह जायज है इसके प्रसार के लिए मीडिया ही एक माध्यम हो सकता है। राष्ट्रवाद के रथ सवार चढ़कर आई एक पार्टी विपक्ष की भूमिका निभाते निभाते अपने विचार के प्रसार करने के लिए मीडिया के आधुनिक माध्यमों को साधने में कामयाब हो चुकी थी। एक हीरो की तरह एंट्री इस पार्टी के लिए नया रास्ता बनी। अन्ना का आंदोलन और उससे कांग्रेस के खिलाफ सत्ता के चुनाव के लिए बनी खला को खूब भुनाया गया। सिर्फ एक चहेरा और एक निशान बदलाव की परिभाषा बना। इस दौरान स्पष्ट समझ आने लगा कौन सा मीडिया किस विचार की तरफ है। हर लड़ाई को देश बचाने की लड़ाई बताया गया।

समाज से दूर होता गया मीडिया

मीडिया के इस दौर में कई आयाम आये, गये और कुछ स्थापित हो गए। स्थापित से सीधा जुड़ाव बड़े संस्थानों का रहा। इस दौर में देखा कि कैसे सरकार विरोधी बातों को अनसुना किया जाने लगा। किसी ने आवाज फाड़कर चिल्लाना शुरू किया तो उसे संस्था ने बेदखल कर दिया। जनता की आवाज को अनसुना करना शायद इस बात का सबूत है कि समाज कभी न कभी इस मीडिया का विरोध करता। विचार की बढ़ती खाई और संस्थानों का संस्थानों से आपस में लड़ना यह दिखाने लगा कि कैसे राजनीती के दलदल में मीडिया भी एक दूसरे के ऊपर कीचड़ उछालने लगी। प्रोपेगंडा कंटेंट लोगों पर थोपा जाने लगा। थोपी जाने लगी विचारों की पोटली है। इस लड़ाई और विघटन के बीच गोदी मीडिया और टुकड़े टुकड़े मीडिया के विभाजित किये गए भाग जनता से कटने लगे। स्टूडियों से देश प्रमुख मुद्दे तय किये जाने लगे। लोगों को समझ नहीं आया कि क्या देखें क्या सुने क्या समझे, इस बीच एक बाढ़ आई ओपिनियन वीडियो, मीम, जैसे कंटेंट की। जिसने इस आग में तेल डालने का काम किया।

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समाज में बढ़ता रोष और मीडिया पर हमले ?

कह सकते हैं , मौजूदा सरकार सत्ता में आयी तो दाभोलकर, गौरी लंकेश सरी के पत्रकारों को मार दिया गया। विदेश में राजदीप सरदेसाई को पीटा गया। सड़कों पर घेरकर नागरिकों को मारा जाने लगा। विविध विचारों में बंटी मीडिया ने इस पर संज्ञान नहीं लिया। हर आवाज में सत्ता का अहम नजर आने लगा। जनता अपनी सरकार की तरफ देखने लगी। मीडिया सरकार का नुमाइंदा बनने में खुश रहने लगी। बात ट्रिपल तलाक, धारा 370, जेएनयू की फीस बढ़ोतरी, बेरोजगारी जैसे तमाम मुद्दे तक पहुंची लेकिन एक वर्ग पूरी तरह सरकार की चरणवंदना में लगा रहा। एक वर्ग जो आवाज उठाता रहा उसे टुकड़े टुकड़े बताया जाने लगा। सब अपना अपना लोकतंत्र झाड़ने लगे। उसके उल्ट जनता बेचारी! लेकिन जब सरकार की तरफ से नागरिक कानून लाया गया, और जनता के अस्तित्व पर सवाल उठाया गया तो यह तय हुआ कि नहीं जनता को खुद की आवाज खुद बनना पड़ेगा। जेएनयू विवाद, कश्मीर विवाद और नागरिक संशोधन पर जब मीडिया का वर्ग खामोश रहा तो जनता ने तय कर लिया, उस मीडिया का सामाजिक बहिष्कार करना जिसने एक तरह से अपने आप को सरकार का नुमाइंदा घोषित कर दिया था। शाहीन बाग़ में सुधीर चौधरी और दीपक चौरसिया (इससे पहले उन्हें रिपोर्ट करने से रोका गया था) जैसे पत्रकारों से बात करने से मनाही और रवीश कुमार को शाहीन बाग़ के बीच घंटो इंटरव्यू से तय हो गया कि जब जनता के सामने चुनने का वक़्त आता है तो वह अपनी आवाज सुनने वालों को पसंद करती है। खैर सीएए के खिलाफ विरोध ने बताया कि तबतक बात नहीं होगी जब तक सरकार का नुमाइंदा स्पष्टीकरण रखने नहीं पहुंचेगा। आखिर में कुछ सवाल करने से पहले स्पष्ट कर दूँ नागरिकों को बात करना चाहिए। किसी को रोकना नहीं चाहिए। स्वास्थ्य लोकतंत्र की यही परम्परा है।

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परम्परा से याद आया जब कश्मीर में लोगों नेताओं को बंधक बनाया गया, और पत्रकारों को जाने से रोका गया तो क्या उस मीडिया ने सवाल उठाया था जिसने अब संविधान का झोला उठा रखा है ? क्या अब भी कुछ बोल रहा है, जब बेरोजगारी और नागरिकता पर सवाल उठाया जाने लगा है ? क्या इतने बुरे आर्थिक दौर में एनआरसी लाना बेवकूफी नहीं होगी? यह भी छोड़िये आखिरी सवाल किसी धर्म को एक कानून के जरिये यतीम किया जा रहा हो उसपर सवाल उठाया गया ? क्या गरीबों से पूछा गया कि उनके पास दिखाने के लिए जरुरी कागज हैं ? क्या सरकार से पूछा गया, कि सीएए और एनआरसी को लेकर सर्वदलीय बैठक बुलाई गई ? क्या सरकार से पूछा गया कि इसके पीछे सरकार की नीयत क्या है ? पूछने को पूछा जाना था, मीडिया द्वारा लेकिन मीडिया तो आपस में सवाल करने में उलझी है। जो एक किशोरावस्था से प्रौढ़ होती नजर आती है, लेकिन यह घमासान लम्बा होगा।

इस लेख में व्यक्त किये गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। ग्राउंड रिपोर्ट ने इस लेख को जस का तस प्रकाशित किया है।

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