सरकार मीडिया संस्थानों की तरह शिक्षण संस्थानों पर भी अपना नियंत्रण चाहती है ?

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ग्राउंड रिपोर्ट । विचार

दुनिया भर में मीडिया को लोकतंत्र के चौथे पिलर के रूप में देखा जाता रहा है। वर्तमान समय में सबसे अधिक चर्चा मीडिया की स्वतंत्रता को ही लेकर चल रही है। भारत ख़ुद को विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहता आया है। मगर वर्तमान समय में मीडिया की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता पर सवाल इन्हीं लोकतांत्रिक देशों में खड़े किय जा रहे हैं।

बीते कुछ वर्षों से पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में मीडिया की भूमिका पर बहुत तेज़ी से सवाल खड़े किए जाने लगे हैं। मीडिया को लोकतंत्र में सूचना का माध्यम या सरकारी नीतियों की आलोचनात्मक विवेचना का वाहक समझने के बदले राजनीतिक दलों और राजनीतिज्ञों के समर्थन या विरोध का मंच समझा जाने लगा है।

वर्तमान समय में भारतीय मीडिया ने बहुत तेज़ी से लोगों के बीच अपनी एक ऐसी छवि बना ली जिसके कारण देश के लोगों ने मीडिया के प्रति भरोसे में बहुत तेज़ी से एक गहरी खाई बनती नज़र आने लगी है। । प्रेस स्वतंत्रता इंडेक्स में 180 देशों की सूची में भारतीय मीडिया का स्थान 140वां है। भारत ने इससे पहले मीडिया का इतना साम्प्रदायिक और ज़हरीला रूप कब अपनाया होगा इसका मुझे तो अनुमान नहीं है मगर ये ज़रूर कहा जा सकता है कि भारत में मीडिया की इतनी बुरी दुर्दशा कभी नहीं हुई होगी। मीडिया को प्रेस्टिच्यूट और गोदी मीडिया जैसे नाम देकर पुकारा जाने लगा है।

क्या मीडिया पर सरकार का नियंत्रण हो चुका है ?

भारत में लोकतंत्र का ढ़ोलक तो बहुत तेज़ी से बजाया जाता है मगर उसकी आवाज़ अब सुनाई नहीं देती है। लोकतंत्र का चौथा पिलर कहे जाने वाले मीडिया की जिम्मेदारी मुद्दों को सामने लाने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में योगदान देने और लोगों की भागीदारी को सुनिश्चित करने और सवाल पूछने की है मगर भारतीय मीडिया ने पिछले कुछ वर्षों में इन सब बातों को नकारते हुए सत्तापक्ष से उसकी नीतियों पर सवाल पूछने के बजाए सरकार की ब्रांडिग करना शुरू कर दी। कोई भी मीडिया संस्थान धर्म और जाति के आधार पर सरकार की आलोचना नहीं करता बल्कि सरकार द्वारा लागू की गई नीतियों और कामों पर सवाल खड़े करता है। मगर वर्तमान समय में मीडिया ने सरकार में धर्म और जाति को लताश कर उसके कामों पर सवाल उठाने के बजाए तारीफ़ों के पुल बांधना शुरू कर दिए।

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हमारा लोकतंत्र सिर्फ पांच साल के लिए नए राजा या शासक का चुनाव नहीं होता है। लोकतंत्र लोगों की भागीदारी के साथ उनके अपने जीवन के आयोजन की व्यवस्था है। यह भागीदारी सिर्फ चुनाव के समय नहीं बल्कि सारे समय सुनिश्चित करना हर सरकार, हर संसद और हर न्यायपालिका का जिम्मेदारी है। इसमें मीडिया की भूमिका को नकारना लोकतंत्र को कमजोर ही करेगा। इसलिए मीडिया पर आलोचना की निगाह रखते हुए उसकी आजादी को सुनिश्चित करना हर लोकतांत्रिक नागरिक की जिम्मेदारी है। और नागरिकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए मीडिया और मीडियाकर्मियों को भी अपनी प्रतिबद्धता बढ़ानी होगी। अगर भारतीय मीडिया ने इन बातों को नहीं समझा तो मीडिया के पतन का भी दौर बहुत जल्द शुरू हो जाएगा।

मुझे ये कहते हुए ज़रा भी संकोच नहीं है कि भारत के मीडिया ने देश को हिंदू-मुस्लिम के नाम पर इतने शातिराना तरीके से बांटा की आज देशभर में नफ़रतों का दौर अपने चर्म पर है। मीडिया का हिस्सा होने के नाते मुझे यह भी कहने में बिल्कुल भी संकोच नहीं की वर्तमान समय में भारतीय मीडिया मौजूदा सरकार के इशारों पर नाच रहा है। मीडिया पर सरकार ने पूरी तरह से नियंत्रण कर रखा है। जो संस्थान सरकार के विरोध में बोलेगा तो सरकार उसे ख़त्म करने के पीछे लग जाएगी।

लोग अब पत्रकारों को मारने और गाली तक देने लगे हैं

हालात तो ये है कि लोग अब पत्रकारों को मारने और गाली तक देने लगे हैं। देश में आए दिन पत्रकारों और जनता की झड़प होती दिख रही है। पत्रकारिता के पेशें में अब अपना पेट पालना भी बहुत मुश्किल काम होता जा रहा है। जनता का मीडिया के प्रति भरोसा बहुत तेज़ी से गिर रहा है जोकि अच्छी बात नहीं है। हालही में सरकार के खिलाफ़ खुलकर बोलने वाले एक बेहद ही वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसुन बाजपाई को कैसे सरकार ने किसी भी मीडिया संस्थानों में टिकने नहीं दिया।

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पत्रकार अब ख़ुद ही जनता से कहने लगा है कि आप न्यूज़ चैनल देखना छोड़ दें। हालही में देश के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने न्यूज़ न देखो जैसा एक अभियान चला रखा था। रवीश कुमार ने मीडिया की भूमिका को लेकर एक लेख लिखा था जिसमें उन्होने कुछ अहम बातों का ज़िक्र किया था जिसको मैं दोराना चाहूंगा।

रवीश कुमार लिखते हैं

“क्या आप समझ पाते हैं कि यह सब क्यों हो रहा है? क्या आप पब्लिक के तौर पर इन चैनलों में पब्लिक को देख पाते हैं? इन चैनलों ने आप पब्लिक को हटा दिया है। कुचल दिया है। पब्लिक के सवाल नहीं हैं। चैनलों के सवाल पब्लिक के सवाल बनाए जा रहे हैं। यह इतनी भी बारीक बात नहीं है कि आप समझ नहीं सकते। लोग परेशान हैं। वे चैनल-चैनल घूम कर लौट जाते हैं मगर उनकी जगह नहीं होती। नौजावनों के तमाम सवालों को जगह नहीं होती मगर चैनल अपना सवाल पकड़ा कर उन्हें मूर्ख बना रहे हैं। और चैनलों को ये सवाल कहां से आते हैं, आपको पता होना चाहिए। ये अब जब भी करते हैं, जो कुछ भी करते हैं उसी तनाव के लिए करते हैं जो एक नेता के लिए रास्ता बनाता है। जिनका नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी है।”

“चैनल आपकी नागरिकता पर हमला कर रहे हैं। लोकतंत्र में नागरिक हवा में नहीं होता है। सिर्फ किसी भौगोलिक प्रदेश में पैदा हो जाने से आप नागरिक नहीं होते। सही सूचना और सही सवाल आपकी नागरिकता के लिए ज़रूरी है। इन न्यूज़ चैनलों के पास दोनों नहीं हैं। प्रधानमंत्री मोदी पत्रकारिता के इस पतन के अभिभावक हैं। संरक्षक हैं। उनकी भक्ति में चैनलों ने ख़ुद को भांड बना दिया है। वे पहले भी भांड थे मगर अब वे आपको भांड बना रहे हैं। आपका भांड बन जाना लोकतंत्र का मिट जाना होगा।”

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शिक्षण संस्थानों पर अपना नियंत्रण चाहती है सरकार !

अब बात करता हूं देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों पर हो रहे जानलेवा हमलों की। सवाल केवल जेएनयू-जामिया और एएमयू का नहीं है। सवाल देश के सभी उच्च शिक्षण संस्थानो का है। जेएनयू और जामिय जैसे संस्थान मीडिया की सही भूमिका निभा रहे हैं। जो काम मीडिया को करना था वो जेएनयू और जामिया जैसे संस्थान कर रहे हैं। ये सांप्रदायिक और तानाशाह सरकार मीडिया की तरह देश के उच्च शिक्षण संस्थानों पर भी अपना पूरा नियंत्रण चाहती है।

जो सरंथान भी सरकार से सवाल कर रहा सरकार उसको मिटाने पर तुली हुई है। वर्तमान में जिस तरह से जेएनयू और जामियां पर सरकार के संरक्षण में जानलेवा हमले हुए इससे ये साफ़ पता चलता है कि सरकार शिक्षण संस्थानों को भी अपने कंट्रोल में करना चाहती है।

अब सवाल ये है कि हम कब तक हिंदू-मुस्लिम के नाम पर राष्ट्र को बिखरते हुए देखते रहेंगे । सवाल ये है कि जब देश की जनता धर्म के आधार पर सरकार का आंकलन कर उसके लिय सारे फैसलों को सही मानने लगे तो देश में तानाशाही का दौर आना शुरू होने लगता है? आप वक़्त रहते नहीं जागे तो आपके लोकतंत्र का ढ़ोलक ज़मीन पर किसी कांच के टूटे हुए टुंकडों की तरह बिख़र जाएगा।

लेखक के निजी विचार हैं।

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