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दम तोड़ती भारतीय अर्थव्यवस्था उधर मीडिया के प्राइम टाइम पर कंगाली की मौत मरता पाकिस्तान

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नेहाल रिज़वी, ग्राउंड रिपोर्ट
प्रधानमंत्री मोदी भारत को 2022 तक 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की बात कर रहे हैं. दूसरी तरफ़ भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी के गहरे पानी में गोता लगा रही है. दम तोड़ती अर्थव्यवस्था को दोबारा पैरों पर खड़ा करना मोदी सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती होगी.भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रहे रघुराम राजन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर अपनी चिंताएं ज़ाहिर करते हुए कहा है कि अर्थव्यवस्था में जारी मंदी बहुत ही चिंता का विषय है. सरकार को उर्जा के क्षेत्र और ग़ैर बैकिंग वित्तीय क्षेत्रों की समस्याओं को तुरंत हल करना ही होगा वरना आने वाले समय में यह मंदी खतरनाक स्तर पर पहुंच सकती है, जिससे उभर पाने में बहुत लम्बा समय लग सकता है.

सरकार जीडीपी के झूठे आंकडों को क्यों पेश करती रही?

समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए रघुराम राजन ने भारत में जीडीपी के आंकडों की गणना को लेकर जो गंभीर सवाल खड़े किए उसे मुख्यधारा की मीडिया ने चर्चा का विषय बनाया ही नहीं. राजन का कहना है कि भारत में जीडीपी के आंकडों की गणना सही तरीक़े से नहीं की गई है, जिस पर सरकार को फिर से विचार करने की ज़रूरत है. राजन ने पीटीआई से बात करते हुए पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम के उस बयान का भी ज़िक्र किया जिसमें उन्होंने जीडीपी के आंकडों को बढ़ा-चढ़ा कर सबके सामने पेश किए जाने की बात कही.

file photo

विकास दर के आकंडों में तेज़ी से आ रही गिरावट

अगर 2016-17 में जीडीपी विकास दर के आंकडों की बात करें तो विकास दर 8.2 थी और 2018-19 में विकास दर 5.8 पर आ गई. भारत के सबसे बड़े बैंक एसबीआई की एक रिसर्च के अनुसार 2019-20 की पहली तिमाही में विकास दर 5.6 पर पहुंचने की आशंका है. निजी उपभोग भारत के विकास की रीढ़ है. जीडीपी में इसका योगदान 60% है. लेकिन इसमें गिरावट दर्ज की जा रही है. 2018-19 की दूसरी तिमाही से इसमें लगातार गिरावट दर्ज हुई है. यह गिरावट आगे चलकर अर्थव्यवस्था को और नीचे ले जाएगी.

सरकार को तेज़ी से गिर रही विकास दर को लेकर जल्द ही कुछ करना होगा वरना गिरती अर्थव्यवस्था के चलते बहुत कुछ चौपट होने की कगार पर है. आर्थिक सर्वे कहता कि वर्ष 2015-16 में कुल बचत, जीडीपी का 31.1% थी जो कि 2017-18 में गिरकर 30.5% हो गई. इसमें पूरी तरह से घरेलू क्षेत्र की बचत का योगदान होता है जो 2011-12 में जीडीपी का 23.6% थी और 2017-18 में घटकर जीडीपी का 17.2% हो गई. बचत में इस गिरावट के चलते निवेश दर भी नीचे चली गई है.

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फाइनेंशिल एक्सप्रेस के संपादक सुनील जैन की जारी एक रिपोर्ट

रिपोर्ट के अनुसार 2010 से भारत का मोबाइल निर्यात तेज़ी से गिरता ही चला गया और वियतनाम का 21 गुना बढ़ गया है. दुनिया में स्मार्ट फोन का कारोबार 300 बिलियन डॉलर का है. इसका 60 प्रतिशत हिस्सा चीन के पास है. वियतनाम की हिस्सेदारी इस ग्लोबल निर्यात में 10 प्रतिशत हो गई है. जबकि भारत की हिस्सेदारी नगण्य है. 2010 में भारत जितना मोबाइल फोन का उत्पादन करता था उसका मात्र 4 फीसदी वियतनाम उत्पादित करता था. आज वियतनाम कहां है और भारत कहां है। भारत में इस वक्त मोबाइल फोन का अधिकांश असेंबल होता है, उत्पादन नहीं होता है. कल पुर्ज़े का आयात होता है और फिर यहां जोड़-जाड़ कर फोन बनता है. मोबाइल के कल-पुर्ज़ों का आयात ख़तरनाक रूप से बढ़ता जा रहा है. वियतनाम में कारपोरेट टैक्स 10 से 20 प्रतिशत है जबकि भारत में 43.68 प्रतिशत।

आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह से विफल रही मोदी सरकार


पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने वाली बात सुनने में ही महज़ अच्छी लगती है. मोदी सरकार की आर्थिक मोर्चे पर नाकामी साफ ज़ाहिर है. मोदी सरकार का यह छटा साल है और 6 सालों में एक भी सेक्टर ऐसा नहीं है जिसे सरकार ने कामयाबी के शिखर पर पहुंचा दिया हो. हर सेक्टर का बुरा हाल है. टेक्सटाईल पूरी तरह से बर्बाद हो चुका है. मोबाईल औऱ आटो-मोबाईल भी पूरी तरह से ठप्प हो चुका है. बैंकिग सेक्टर का भी दम निकल चुका है.

नौकरियों में लगातार आती कमी के चलते बेरोज़गारी चर्म पर पहुच चुकी है.

1929 में स्थापित हुई पारले में लगभग दस हज़ार लोगों की नौकरी पर तलवार लटक रही है. कंपनी के हेड़ मयंक शाह ने बताया कि 2017 में जीएसटी लागू होने के बाद से हम लगातार घाटे की मार झेल रहें हैं. भारतीय मीडिया को देश में आर्थिक मंदी पर कोई चर्चा नहीं करनी है. भारतीय मीडिया के प्राइम टाइम में रोज़ाना कंगाल पाकिस्तान, मंदिर पर रोज़ सुनवाई जैसे मुद्दों पर बहस जारी है.मोदी सरकार ने राजनैतिक तौर पर भले ही कामयाबी हासिल की हो, मगर आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह से विपल रही है.

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पीएलएफएस की 2017-18 की रिपोर्ट में में 2011-12 के बाद बेरोजगारी को मापा गया. पहले तो सरकार ने इसे सार्वजनिक करने में देर की और बाद में इसे नजरअंदाज कर दिया. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बेराजगारी अपने 45 वर्षों के न्यूनतम स्तर पर है और कामगार कर सकने की उम्र वाली करीब आधी आबादी (49.5%) लेबर मार्केट से बाहर है क्योंकि नौकरियां नहीं हैं.

मीडिया को माध्यम बनाकर सरकार कब तक अपनी नाकामियों को छिपाती रहेगी?

अब मोदी सरकार की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के पास कौन सी ऐसी जादू की झड़ी है जिसको निकाल कर वो एक ही बार में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 5 ट्रिलियन डॉलर का कर देंगी. सभी सेक्टर में लगातार जा रहीं नौकरियों को बचाने के लिए सरकार क्या महत्वपूर्ण कदम उठाएगी. किन-किन सेक्टर को बचा पाएगी मोदी सरकार. सभी सेक्टर डूबने की कगार पर खड़े हैं.

मीडिया में आर्थिक मंदी की कोई चर्चा ही नहीं है. कश्मीर,पाकिस्तान और राम मंदिर के अलावा कोई और प्राइम टाइम का हिस्सा बन ही नहीं पा रहा है। सरकार कब तक मीडिया का सहारा लेकर अपनी नाकामियों को छिपाने का प्रयास करती रहेगी…