गांधी के सिद्धांत और मेरी अंतरात्मा RCEP में शामिल होने की इजाज़त नहीं देती

RCEP DEAL CALLED OFF
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ग्राउंड रिपोर्ट। पल्लव जैन

लंबे समय से भारत के RCEP( रीजनल कॉम्प्रीहैन्सिव इकोनॉमिक पार्टनर्शिप) में शामिल होने की चल रही अटकलों पर कल प्रधानमंत्री मोदी ने विराम लगा दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने अंतर्ऱाष्ट्रीय दबाव के बावजूद इस संधी पर सहमति नहीं दी जो कि एक सराहनीय कदम है।

दुनिया का सबसे बड़ा व्यापार समझौता है आरसीईपी

आपको बता दें की आरसीईपी चीन की अगुवाई में बना 15 देशों का समूह है, जो एक दूसरे के साथ मुक्त व्यापार के लिए प्रतिबद्ध होंगे। इसे यूरोपीय यूनियन की तर्ज पर बनाया गया है,

एशिया के 15 देशों के शामिल होने के बाद यह दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार क्षेत्र बन जाएगा। शामिल होने वाले देशों की कुल आबादी 3.6 अरब के करीब है जो दुनिया की आधी आबादी के बराबर है। भारत के इस समूह में शामिल न होने से इस समूह को बड़ा झटका लगा है। चीन की ओर से भारत द्वारा इस समझौते पर हस्ताक्षर के लिए दबाव बनाया जा रहा था। लेकिन भारत के इसमें शामिल न होने की एक सबसे बड़ी वजह चीन ही बन गया।

भारत क्यों नहीं हुआ शामिल ?

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि गांधीजी के सिद्धांत और मेरी अपनी अंतरात्मा मुझे आरसीईपी में शामिल होने की इजाज़त नहीं देती।

आरसीईपी समझौते के तहत सदस्य देशों को एक दूसरे के साथ मुक्त व्यापार के अधिकार प्राप्त हो जाएंगे जिससे वे अपने उत्पाद आसानी से एक दूसरे के बाज़ारों को दे पाएंगे। इस समझौते के बाद यह आशंका जताई जा रही थी कि चीनी उत्पादों की संख्या भारतीय बाज़ार में बढ़ जाएगी जिससे हमारे घरेलू उत्पादों को बिक्री घट जाएगी। डेयरी और खेती क्षेत्र इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित हो सकता था। क्योंकि आरसीईपी समझौते के बाद चीनी एग्रीकल्चर प्रोडक्ट भारतीय बज़ारों पर कब्ज़ा कर सकते थे, जिससे मंदी की मार झेल रही हमारी अर्थव्यवस्था और चरमरा सकती थी। इस संधी पर हस्ताक्षर न करने की सबसे अहम वजह 15 में से 11 देशों के साथ हो रहा व्यापार घाटा भी है। 2018-19 में भारत का व्यापार घाटा 184 अरब डॉलर के करीब रहा है, इसका मतलब है कि भारत में दूसरे देशों से जितना आयात होता है उतना निर्यात भारत इन देशों को नहीं कर पाता। चीन के प्रोडक्ट भारत में धड़ल्ले से बिकते हैं लेकिन भारतीय प्रोडक्ट चीनी बाज़ार में अपनी जगह नहीं बना पाते।

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आरसीईपी से दूरी क्यों है फिलहाल ठीक?

पिछले सात सालों से आरसीईपी को लेकर बातचीत जारी है, लेकिन मौजूदा हालात में यह संधी भारत के लिए बिल्कुल ठीक नहीं दिखाई देती। भारत की अर्थव्यवस्था सुस्ती की मार झेल रही है, मेक इन इंडिया का असर दिखाई नहीं देता, नोटबंदी और जीएसटी से अर्थव्यवस्था अभी उभर नहीं पाई है, ऐसे में आरसीईपी भारत के लिए तीसरा झटका साबित हो सकती थी। छोटे और मंझोले उद्योग विदेशी उत्पादों के आगे दम नहीं टेक सकते और भारतीय बाज़ार चरमरा सकता था। एसबीआई ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारत अगर आरसीईपी में शामिल हुआ तो घरेलू उत्पाद बुरी तरह प्रभावित होंगे। यह भारत के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा। सुरक्षा कारणों से भी यह हमारे लिए ठीक नहीं है। विपक्ष ने भी सरकार को इसे लेकर चेताया था। जयराम रमेश ने कहा था कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था को तीसरा झटका होगा।

क्या कहा चीन ने?

चीन को भारत के इस फैसले से सबसे ज़्यादा झटका लगा है क्योंकि भारत इस समय सबसे बड़ा बाज़ार है, चीन इस समझौते के बाद भारतीय बाज़ार पर कब्ज़ा कर सकता था। भारत द्वारा बार बार कहने पर भी चीन और भारत के बीच हो रहे व्यापार घाटे को लेकर चीन ने कुछ नहीं किया। भारत की असहमती के बाद चीन ने कहा की आरसीईपी में सभी की उम्मीदों को पूरा करना मुश्किल है।

क्या एशियाई बाज़ार में अलग थलग पड़ जाएगा भारत?

एशिया के तमाम देश इस समूह का हिस्सा बने हैं भारत एक इकलौता बड़ा देश है जो इसमें शामिल नहीं होगा ऐसे में भारत अलग-थलग पड़ सकता है। लेकिन भारत को हो रहे व्यापार घाटे को देखते हुए फिल्हाल भारतीय बाज़ार को न खोलना ही ठीक प्रतीत होता है। आरसीईपी से अलग होने के बाद पश्चिमीं देशों के साथ भारत के व्यापार समझौतों में इज़ाफा भी हो सकता है।

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