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IIMC के छात्र का खुला ख़त, प्रशासन का नया नियम वंचित वर्ग को दाख़िले से रोकना

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  • IIMC में उम्मीदवारों का चयन दसवीं, बारहवीं और स्नातक के अंकों के आधार पर होगा
  • स्नातक में कहीं ग्रेडिंग सिस्टम है तो कहीं परसेंटेज सिस्टम फिर अंक मापदंड कैसे हो सकता है ?
  • 10वीं,12वीं या स्नातक का अंक कैसे तय कर सकता है कि कौन ज्यादा काबिल है?
  • बड़ा सवाल ये है कि जब क्लासेज ऑनलाइन होंगी, तो फीस पूरी क्यों ली जा रही है?
  • आईआईएमसी में पत्रकारिता को पूरे तरीक़े से ख़त्म कर देने का काम जारी है

देश में पत्रकारिकता की पढ़ाई का गढ़ कहा जाने वाला इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन (IIMC) इस बार छात्रों का चयन दसवीं, बारहवीं और स्नातक के अंकों के आधार पर करेगा। इससे पहले तक दाखिले के लिए प्रवेश परीक्षा और उसके बाद इंटरव्यू क्वालीफाई करना होता था। दसवीं, बारहवीं और स्नातक के अंक आधार नहीं थे।

आईआईएमसी प्रशासन के इस फैसले का मतलब क्या है और यह किस तरह भेदभाव करने वाला है, इस पर रेडियो एंड टेलीविजन डिपार्टमेंट (2019-20 बैच) के गौतम ने IIMC के पूर्व छात्र-छात्राओं, शिक्षकों और उम्मीदवारों के नाम एक खुला खत लिखा था। उस ख़त को हम यहां हूबहू प्रकाशित कर रहे हैं।

IIMC के छात्र गौतम

इस देश में पत्रकारिता की स्थिति से हम सब वाकिफ हैं। इस स्थिति को देखकर अगर हमें थोड़ी भी शर्मीन्दगी महसूस होती है तो इसका मतलब हम समझते हैं कि पत्रकारिता अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है।

अगर इस देश में पत्रकारिता को बचाना है तो सबसे पहले पत्रकारिता की शिक्षा देने वाले संस्थानों को बचाना होगा। उन्हीं में से एक है भारतीय जनसंचार संस्थान। देश का तथाकथित सर्वोच्च मीडिया संस्थान। पत्रकारिता का मक्का कहे जाने वाले भारतीय जनसंचार संस्थान के प्रशासन को मनमानी करने से रोकना होगा।

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साल 2019-20 में भारतीय जनसंचार संस्थान की महंगी फीस को लेकर बहुत बड़ा आंदोलन हुआ। तत्कालीन छात्रों के अलावा पूर्व छात्रों ने भी इस आंदोलन में हिस्सा लिया। मगर प्रशासन का रवैया कुछ यूं रहा कि छात्रों को दो बार भूख हड़ताल पर जाना पड़ा और तब जाकर कुछ बात बनी। मगर जब पूरे देश में कोरोना की वजह से तालाबंदी थी और छात्र अपने घरों में बंद थे, चालाकी से प्रशासन  कागजी कार्यवाही का खेल खेलकर अपने वादे से मुकर गया।

इस धोखाधड़ी के अलावा इस संस्थान की कई और भेदभावपूर्ण नीति यां रही हैं जिनकी वजह से छात्रों को पुलिस में शिकायत करने के अलावा न्यायालय का भी दरवाजा खटखटाना पड़ा है। फीस का मामला अभी दिल्ली हाईकोर्ट में है, जहां 7 अगस्त 2020 को सुनवाई होनी है।

अब तक इन सब के बावजूद, बचते-बचाते वंचित छात्रों ने यहां से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की है, मगर 2020-21 में कोरोना महामारी की आड़ में जिस तरीके से प्रवेश प्रक्रिया के नियमों में बदलाव किया गया है वो इस संस्थान में पत्रकारिता को पूरे तरीके से खत्म कर देने का काम करेगी। एक एलीट हब बनकर रह जाएगा आईआईएमसी।

दसवीं, बारहवीं और स्नातक के अंको के आधार पर होगा उम्मीदवारों का चयन

मैंने 2019-20 में भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई की है और पहली क्लास में ही हमें बताया गया था कि यहां किसके कितने अंक आते हैं या आए हैं वह तय नहीं करता कि हम कितने काबिल पत्रकार बनेंगे। इसीलिए हमारे अकादमिक इतिहास को परे रख हमारा चयन हुआ है।

निस्संदेह ही नई प्रवेश प्रक्रिया भेदभावपूर्ण है। निम्नलिखित तर्कों के आधार पर मैं यह कह रहा हूं-

  • इस देश की शिक्षा पद्धति में मार्किंग की कोई सेंट्रल स्कीम नहीं है, इसीलिए अगर एक छात्र/छात्रा ने दिल्ली में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई की है और एक ने बिहार में हिंदी माध्यम से तो उनके अंकों में अंतर होगा।

अक्सर देखा जाता है की CBSE में छात्र-छात्राओं का अधिकतम अंक रीजनल बोर्ड के छात्रों से ज्यादा रहता है। यह स्थिति 10वीं और 12वीं दोनों की है। स्नातक के अंकों की बात करें तो यह अंतर समझना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। सेंट्रल यूनिवर्सिटी और स्टेट यूनिवर्सिटी में परीक्षा की जांच प्रक्रिया का मापदंड एक जगह से तय नहीं होता। जब मार्किंग स्कीम ही अलग हैं तो फिर 10वीं,12वीं या स्नातक का अंक कैसे तय कर सकता है कि कौन ज्यादा काबिल है?

  • आपने 12वीं और स्नातक में क्या विषय चुना है यह भी आपके अंकों को प्रभावित करता है। एक ही स्कूल में कॉमर्स, आर्ट्स और साइंस के छात्र-छात्राओं के अधिकतम अंकों में अंतर देखने को मिल जाएगा। स्नातक में कहीं ग्रेडिंग सिस्टम है तो कहीं परसेंटेज सिस्टम फिर अंक मापदंड कैसे हो सकता है?

अकादमिक स्तर पर अलग-अलग विषयों की जटिलता और कठिनता की छवि छात्र-छात्राओं के प्राप्त अंको में दिखाई देती है। सभी को एक पंक्ति में खड़ा करके काबिलयत नापने की ऐसी कौन सी मशीन विकसित की है आईआईएमसी ने? ऐसे बहुत शिक्षण संस्थान हैं जहां अगर आप अपने गुरु के प्रिय हैं तो हल्लाबोल अंक से पास होंगे वरना पास और फेल के बीच में कहीं लटके हुए होंगे। इसी प्रणाली को तो चुनौती देने का एक माध्यम होती है प्रवेश परीक्षा।

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अगर मापदंड यही रहा तो प्रवेश प्रक्रिया में निस्संदेह उम्मीदवारों के क्षेत्र, उनकी भाषा/माध्यम, उनके स्नातक और 12वीं के विषयों के आधार पर भेदभाव होगा।

  • प्रवेश प्रक्रिया में इसके अलावा 200 शब्दों/1-2 मिनट के वीडियो में स्टेटमेंट ऑफ पर्पस (SOP) बताना होगा।

एक वंचित छात्र को अपनी काबिलियत दिखाने के लिए 200 शब्दों में या 1-2 मिनट की वीडियो में अपना जुनून बयां करना होगा, वहीं एक प्रिविलेजेड छात्र के पास वो सबकुछ होगा जो उसे 10वीं से लेकर उसके ग्रेजुएशन तक के दौरान चम्मच से पिलाया गया है।

साक्षात्कार भी ऑनलाइन होगा। तो जो दूर-दराज के गावों में भारतीय जनसंचार संस्थान का सपना देख रहे, उनके लिए एक और चुनौती। असम और बिहार के कई हिस्से बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हैं।

  • अगर कुछ बचे-कुचे वंचित छात्र-छात्राएं इस परिस्थिति में भी किसी तरह यहां पहुंच भी जाते हैं, तो उनके लिए भेदभावपूर्ण नीतियों की लंबी सूची है। नोटिफिकेशन में साफ-साफ लिखा है कि पहले सेमेस्टर की पढ़ाई ऑनलाइन होगी। एक ‘गुड क्वालिटी’ कंप्यूटर या लैपटॉप के साथ ‘स्ट्रांग इंटरनेट कनेक्शन’ होना चाहिए। कश्मीर के छात्र-छात्राओं की तो बात ही नहीं हो सकती, वहां तो 2G/3G में ही संघर्ष हो रहा। यह भी उल्लेख करना चाहिए था कि कैमरा होना चाहिए। कैमरे के बिना रेडियो एंड टेलेविजन पत्रकारिता के छात्र क्या पढ़ेंगे?

लीजिए उधार, बेचिए ज़मीन

लीजिए किससे उधार लेते हैं और बेचिए कितना जमीन/गाय/भैंस बेच सकते हैं। अगर यह सब करके भी यहां तक का सफर तय कर लिए तो ये भी समझ लीजिए जो बताकर भी नहीं बताया गया है।

बस एक 20-25 हजार के लैपटॉप/कंप्यूटर से काम नहीं चलने वाला। क्योंकि उसी लैपटॉप/कंप्यूटर में हैवी सॉफ्टवेयर्स रखने होंगे, वीडियो एडिटिंग के, ऑडियो एडिटिंग के, पेजमेकिंग के, ग्राफिक्स डिजाइनिंग के जिसकी सुविधा सस्ते और काम चलाऊ लैपटॉप/कंप्यूटर में नहीं मिलेगी। तो अगर एक वंचित अकांक्षी कहीं से कंप्यूटर का जुगाड़ कर भी लेता है तो वो उसके काम नहीं आएगा। जब संस्थान के एप्पल वाले कंप्यूटर में ढंग से 10 मिनट का वीडियो एडिट नहीं हो पाता तो इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्थिति क्या होनी है।

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अगर कैमरे की बात करें तो बस फोटो खींचने वाले कैमरे से काम नहीं चलने वाला। एक वीडियो कैमरा भी होना चाहिए। पब्लिक सर्विस अनाउंसमेंट, डॉक्यूमेंट्रीक के साथ-साथ और भी बहुत कुछ बनाना सिलेबस का हिस्सा है। फोटो खींचने वाले कैमरे में यह सब करना मुश्किल होता है। होने को तो स्मार्टफोन से भी हो सकता है, मगर लाखों खर्च करने के बाद भी यही करना पड़ा तो इंसान भारतीय जनसंचार संस्थान जाए ही क्यों? एक 4K वीडियो कैमरे की कीमत 2-4 लाख तक की होती है। आईआईएमसी में तो हमें यही बताया गया था।

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पूर्व छात्रों को पता होगा की भारतीय जनसंचार संस्थान एक कम्युनिटी रेडियो भी चलाता है और रेडियो की पढ़ाई यहां पढ़ने वाले छात्रों के सिलेबस का हिस्सा है। वो तो इस नोटिफिकेशन में यह नही लिखा गया की एक रेडियो लैब भी होना चाहिए घर पे।

अगर क्लासेज ऑनलाइन, फीस पूरी क्यों ?

एक और सवाल खड़ा होता है, जब क्लासेज ऑनलाइन होंगी, तो फीस पूरी क्यों ली जा रही है? संस्थान के संसाधनों का बिना इस्तेमाल किए छात्र/छात्रा उसकी फीस क्यों दे? न लाइब्रेरी, न लैब, न इक्विपमेंट्स, न स्टूडियो, न क्लासेज। भ्रमित करने के लिए पूरी फीस का भी जिक्र नहीं है। वेबसाइट पर जितनी भी फीस का उल्लेख है उससे 8,500 ज्यादा वसूला जाएगा। इसमें से कुछ रिफंड हो जाएगा मगर जब पूरी फीस देनी है तो इस तरह का दिखावा क्यों?

अब तक की स्थिति कुछ ऐसी थी कि किसी तरह संघर्ष करके वंचित छात्र-छात्राएं यहां पढ़ाई कर लेते थे। हालांकि यह भी बहस का मुद्दा है क्योंकि मेरे कई जानने वाले बस पैसों की वजह से यहां दाखिला नहीं ले पाए थे। इसी ‘भारतीय’ संस्थान में 2019-20 के सत्र में ST/SC की 28 सीटें खाली रह गई थीं। मगर जो अब हो रहा है वो वंचितों को पूरी तरह निचोड़ देगा।

असम में 10वीं का छात्र बस इसीलिए आत्महत्या कर लेता है क्योंकि उसके पिता ऑनलाइन क्लासेज के लिए स्मार्टफोन खरीदकर नहीं दे सके। हम अत्यधिक असमान अवस्था में जी रहे हैं और ऐसे में यह प्रवेश प्रक्रिया डिजिटल और सामाजिक विभाजन का काम करेगी। अब यहां बस प्रिविलेजेड छात्र-छात्राएं पहुंचेंगे। जिन्होंने संसाधनों के मामले में कभी संघर्ष नहीं किया, वो दूसरों का संघर्ष देख भी नहीं पाएंगे क्योंकि वंचितों का दरवाजा बंद हो चुका होगा।

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हल्लाबोल तरक्की करेंगे और सब अच्छा रहा (रहेगा ही) तो एक दिन यहीं वापस DG/ADG बन कर आ जाएंगे और कहेंगे- ’10 लाख तो अफोर्डेबल है, हमने भी भारी भरकम फीस दी थी और तुम्हे भी देना होगा।’ (जिस गति से फीस बढ़ी है तब तक यहां पढ़ने के लिए फीस 10 लाख से भी ज्यादा हो सकती है।)

ऐसे रीढ़विहीन शिक्षक और ADG/DG को IIMC पहुंचने से रोकना है तो आज के छात्र-छात्राओं को सशक्त करना होगा और ये निश्चित करना होगा की वंचितों के साथ भेदभाव और अन्याय न हो। इसके लिए हमें मिलकर इस प्रवेश प्रक्रिया के खिलाफ अपनी आवाज उठानी होगी।

सवाल पूछिए, नहीं तो आपसे पूछा जाएगा सवाल

मैं भारतीय जनसंचार संस्थान में दाखिल पाने के लिए संघर्ष कर रहे अकांक्षियों से भी अनुरोध करता हूं कि आप संस्थान से सवाल पूछें कि उनके साथ ऐसा भेदभाव क्यों? क्योंकि अगर आप अभी सवाल नहीं पूछेंगे तो दाखिले के बाद आपसे सवाल पूछा जाएगा कि आपने यह सवाल पहले क्यों नहीं उठाया। जैसा कि हमसे पूछा गया था, जब हमने सवाल किया था कि शिक्षा इतनी महंगी क्यों?

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