जयपुर IHM मामला: भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच करने के मामले में वसुंधरा सरकार के अधिकारी सुस्त

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जयपुर, 30 अगस्त। जयपुर स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट के प्रिंसिपल के. एस. नारायणन के खिलाफ चल रही भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की फाइल टूरिज्म विभाग के दफ्तर के किसी कोने में धूल खा रही है, शायद यही कारण है कि बीते 8 महीनों से फाइल आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रही है।

इस मामले में जब हमने (ग्राउंड रिपोर्ट की टीम) विभाग के उच्च अधिकारियों से बात की तो उन्होंने हमेशा की तरह बयान देते हुए कहा कि मामले की जांच की जा रही है, लेकिन इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है कि बीते 8 महीनों में जांच कहां तक पहुंची है और क्या जांच की जा रही है।

इन सबके बीच एक सवाल यह भी सामने आता है कि क्या वसुंधरा सरकार के अधिकारी भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मामलों की जांच के लिए बिल्कुल भी गंभीर नहीं है।

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जांच कर रहे जयपुर पर्यटन विभाग के डायरेक्टर प्रदीप कुमार बोरार ने कहा है कि राज्य सरकार का अधिकारी होने के चलते उनके पास यह अधिकार नहीं है इसलिए वे इस मामले में मिनिस्ट्री ऑफ टूरिज्म, भारत सरकार के अधिकारियों को सूचित करेंगे।

वहीं जांच कर रहे एक अन्य अधिकारी ज्वाइंट सेक्रेटरी राजेंद्र विजय से कई बार संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया। बीते कई महीनों से आएचएम जयपुर के प्रिंसिपल के. एस. नारायणन के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के फाइल सचिव राजेन्द्र विजय के पास ही थी, जबकि राज्य सरकार का अधिकारी होने के चलते उनके पास ऐसा कोई अधिकार ही नहीं है कि वे इस मामले की जांच करें।

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बता दें कि ज्वाइंट सेक्रेटरी राजेंद्र विजय खुद भी सवालों के घेरे में हैं, क्योंकि उनके विभाग से शासन-प्रशासन की सबसे अहम 46 फाइलें कुछ इस तरह से गायब हुई हैं कि अब तक उनका कोई अता पता नहीं है।

इस पूरे मामले में जब हमने आएएस अधिकारी और प्रिंसिपल सेक्रेटरी कुलदीप रांका से बात की तो उन्होंने कहा कि फिलहाल उन्हें इस मामले की जानकारी नहीं है। वे जल्द ही मामले में संज्ञान लेंगे और आगे की कार्यवाही करेंगे। वहीं जब इस मामले का पक्ष जानने के हमने भ्रष्टाचार के आरोपी प्रिंसिपल के. एस नारायणन से बात की तो उन्होंने इस मामले में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।

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प्रिंसिपल के एस नारायण पर फर्जी नियुक्ति सहित लगे हैं ये गंभीर आरोप 

1) होटल मैनेजमेंट संस्थान के प्रिंसिपल पर नियमों के विरुद्ध और बिना विज्ञापन दिए हुए ही लोगों की फर्जी नियुक्ति करने का आरोप लगाया गया है। साथ ही उन पर आरोप है कि इस मामले में उन्होंने बोर्ड ऑफ गवर्नेंस को भ्रमित किया है।

2) प्रिंसिपल पर दूसरा आरोप है कि लाभान्वित होने के लिए उन्होंने अपने आप से ही खुदो का दो बार इन्क्रिमेन्ट कर लिया है। यह कौन सा नियम है जो कोई अधिकारी खुद ही वेतनवृद्धी या इन्क्रिमेन्ट कर ले।

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3) 200 किलो वजनी एक फोटो स्टेट मशीन संस्थान से रातों-रात ऐसे गायब हो जाती है जैसे कोई आत्मा गश्त करने शहर आई हो और फिर वापस कब्रिस्तान लौट गई हो। इन आत्मओं को न गार्ड देख सकते हैं न पुलिस। फोटो स्टेट मशीन भी आत्म बनकर ही गायब हुई जो आईएचएम की सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मियों को नजर नहीं आई। बता दें कि इस मशीन की कीमत करीब 3,50,000 रुपये है। खास बात यह है कि इतने दिन बीत जाने के बावजूद भी आईएचएम प्रिंसिपल के.एस. नारायणन ने न तो इसकी जांच की जहमत उठाई न ही कोई कोई एक्शन लेने की जरूरत समझी।

4) माननीय जयपुर सेशन कोर्ट गायब हुई फोटो स्टेट मशीन के मामले में जांच के निर्देश दे चुका है लेकिन प्रिंसिपल साहब का रुतबा इतना ज्यादा है कि उन्हें माननीय कोर्ट के आदेशों की अवमानना का डर नहीं है। न तो उन्होंने कोर्ट के निर्देशों को गंभीरता से लेने की जरूरत समझी और न ही इस पर कोई एक्शन लिया।

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5) प्राचार्या के एस नारायणन पर एक आरोप यह भी है कि उन्होंने अनियमित रूप से अपने चहेतें की नियुक्ति लेखाकार के पद पर की है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक लेखाकार के पद पर नियुक्त किए गए उनके ‘चहेते’ इस पद के लिए ओवर एज हैं। इस मामले में उन्होंने विभागीय पदोन्ती कमेटी को भी अंधेरे में रखा है।

6) प्रिंसिपल नारायणन पर यह भी आरोप है कि मिनिस्ट्री ऑफ टूरिज्म, भारत सरकार द्वारा जारी कैन्टीन के लिए 7 लाख रुपये का फंड आईएचएम के लिए आवंटित किया गया। इन पैसों से संस्थान में पढ़ाई करने वाले बच्चों के लिए कैंटिन बनवाई जानी थी लेकिन प्रिंसिपल साहब ने यह फंड खुद के उपयोग में ही ले लिया। खास बात यह है कि उन्होंने भारत सरकार को यूटिलिटी सर्टिफिकेट (UC) जारी करते हुए बताया कि कैंटिन बन गई है, बच्चें चाय-समोसा खा रहे हैं चिन्ता की बात नहीं है।

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7) इसके अलावा संस्थान में पढ़ने वाले छात्रों के लिए कैंटिन के निर्माण कार्य सहित कई अन्य चीजों में हेर-फेर और घोटाले के आरोप हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इतने गंभीर आरोप लगने के बावजूद भी प्रशासन कब इस मामले की जांच करेगा?

8) नियमों के मुताबिक, जिला अदालत, हाई कोर्ट और सेंट्रल एडमिन्स्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल के सरकारी वकील की फीस 5,500 रुपये से 11,000 रुपये के बीच तय की गई है, लेकिन आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक प्रिंसिपल केएस नारायणन ने एडवोकेट पारस कुहाड की फर्म को एक मामले की सुनवाई के लिए 1 लाख रुपये अदा किए हैं।

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9) प्रिंसिपल पर एक आरोप यह भी है कि घोर वित्तीय अनियमितताएं की हैं जैसे M/S मेसर्स राठौड़ इक्विपमेंट प्राइवेट लिमिटेड जयपुर से खराब और निम्न गुणवत्ता वाले किचन इक्विपमेंट (Kitchen equipment) खरीदें हैं। इन इक्विपमेंट की कीमत करीब 15 लाख रुपये है। होटल मैनेजमेंट में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए उपयोग में आने वाला रसोई का ये सामान इतनी घटिया क्वालिटी है कि साल दर साल खराब होता है जिससे हर बार इन इक्विपमेंट की रिपेयरिंग पर सरकार की जेब काट ली जाती है।

बहरहाल, जयपुर स्थित आईएचएम के प्रिंसिपल का कार्यकाल जितना लंबा है उससे ज्यादा लंबी फेहरिस्त उनके ऊपर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों की है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इतने गंभीर आरोप लगने के बावजूद भी उनके खिलाफ जांच की फाइल बीते 8 महीनों से टूरिज्म विभाग की एक ही छत के नीचे घूम रही है। इस मामले में इतना ज्यादा घालमेल समझ में आता है कि आप इस सोच में उलझ कर रह जाएंगे कि दाल में कुछ काला है या पूरी की पूरी दाल ही काली है।

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