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इतिहास अटल बिहारी वाजपेयी को किस नजरिए से देखेगा ?

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लेखक- अविनीश कुमार मिश्रा

एक बार वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर से जब पूछा गया कि, इतिहास अटल बिहारी वाजपेयी को किस रूप में देखेगा? तो उनका जवाब था… “देखिए इतिहास शायद उनको उतना तवज्जो न दे, लेकिन देगा भी तो उन्हें सिर्फ विपक्ष के एक ऐसे नेता के तौर पर देखेगा। जो संसद में हमेशा अपनी वाक पटुता से सरकार को घेरता था और सरकार के लोग भी उनकी इज्जत करते थे” ये हुई पत्रकार कुलदीप नैयर की बात, लेकिन क्या इतिहास सिर्फ वाजपेयी के जीवन और राजनैतिक जीवन के इतने ही हिस्से का अवलोकन करेगी? नहीं!

लगभग 60 सालों तक संसदीय पत्रकारिता कर चुके और अटल बिहारी वाजपेयी के मित्र रहे वरिष्ठ पत्रकार मनमोहन शर्मा कहते हैं। “शुरुआती दिनों को अगर छोड़ दिया जाए। तो बाद के दिनों में वाजपेयी के पास जैसे जैसे पद मिलता गया उनपर संघ का दबाव बढ़ता गया। संघ के दबाव में कभी वो झुके भी और कभी नहीं भी झुके। दोनों स्थिति में वाजपेयी की छवि का ही छीछालेदर हुआ।” ऐसे कौन से मामले थे जिस पर उनके और संघ के बीच सीधे तकरार हुई थी?

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इस पर श्री शर्मा कहते हैं। “पहला तो राममंदिर आंदोलन का मामला था। इसमें निकल रही यात्रा का वाजपेयी ने काफी विरोध किया था, लेकिन संघ के दबाव में उन्हें झुकना पड़ा। जिसके बाद उन्होंने लखनऊ में एक विवादित भाषण भी दिया था। यही नहीं आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद वी पी सिंह सरकार से समर्थन वापस लेने के लिए भी खुद राष्ट्रपति भवन गये। ये सब घटना अटल के जीवन पर एक धब्बे के समान लग गई। इससे उनकी एक सेकुलर छवि पर सवालिया निशान खड़ा हो गया।”

बाद के दिनों में जब ‘विवादित ढांचा’ गिराया गया तो उस वक्त वाजपेयी राज्यसभा के सदस्य थे और उन्होंने सदन में अपने ही लोगों का विरोध किया।
राम मंदिर आंदोलन भाजपा के लिए संजीवनी का काम कर गया। इसकी फसल काटने का मौका अटल बिहारी वाजपेयी को मिला। देश में पहली बार पूरी तरह से ग़ैर कांग्रेसी व्यक्ति प्रधानमंत्री बना। इस पद के लिए वो तीन बार चुने गए। एक बार 13 दिन के लिए, एकबार 13 महीनों के लिए और एक बार पूरे पांच साल के लिए।

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बहरहाल, वाजपेयी का संघ से दूसरा टकराव पाकिस्तान की विदेश नीति पर हुआ। पत्रकार मनमोहन शर्मा बताते हैं। “वाजपेयी की पाकिस्तान नीति से संघ परिवार खफा था। संघ परिवार ने पाकिस्तान के किसी भी अस्तित्व को सिरे से नकार दिया था। वह पाकिस्तान बनने का जिम्मेदार नेहरु को ठहराया करता था, लेकिन जब वाजपेयी ने पाकिस्तान को एक पड़ोसी बताकर उससे सुलह करने की पहल की तो संघ और वाजपेयी के बीच मतभेद उभर कर सामने आए।

बाद के दिनों में उस समय के संघ के बड़े नेता दत्तापंत टेंकरी ने तो खुलेआम वाजपेयी को अमेरिका का मोहरा तक कह दिया था। इससे भी संघ और वाजपेयी की छवि पर नकरात्मक असर पड़ा। जो गुजरात दंगे के बाद मोदी और अटल के मामले में देखने को मिला।”

अटल बिहारी वाजपेयी की जीवनी ‘अटल बिहारी वाजपेयी अ मैन ऑफ ऑल सेशन’ में पत्रकार किंगशुक नाग लिखते हैं। वाजपेयी गुजरात दंगे के बाद मोदी का इस्तीफा लेना चाहते थे, लेकिन संघ ने इसकी हामी नहीं दी। इसके बाद वाजपेयी खुद के इस्तीफे पर अड़ गये, लेकिन उस वक्त पार्टी और संघ परिवार के भरोसेमंद प्रमोद महाजन ने उनको मना लिया।

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अगर गुजरात दंगे के बाद अटल बिहारी वाजपेयी इस्तीफा दे देते तो क्या होता? इस सवाल के जवाब में पत्रकार मनमोहन शर्मा कहते हैं। “ये पॉसिबल ही नहीं था। क्योंकि वाजपेयी ये जानते थे कि अगर मैने इस्तीफा दे दिया तो राजनीतिक करियर खत्म हो जाएगा।” साल 2005 में वाजपेयी ने राजनीति को अलविदा कह दिया।

पत्रकार श्री शर्मा कहते हैं इतिहास को इतिहास पर ही छोड़ देना चाहिए कि वो वाजपेयी को सदन में पिछली बैंच पर बैठकर अपने भाषण से नेहरू को प्रभावित करने वाले युवा नेता के रूप में देखेगा या बाबरी विध्वंस के वक्त नुकीले पत्थर को सीधा करने वाले जैसे बयान देने वाले वाजपेयी या अपने मुख्यमंत्री को राजधर्म निभाने की सलाह देने वाले एक प्रधानमंत्री के रूप में देखेगा?

बता दें कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का लंबी बीमारी के बाद बीती 16 अगस्त को 93 साल की उम्र दिल्ली स्थित एम्स अस्पताल में निधन हो गया था। उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

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