केवड़िया ज़मीन विवाद, मीडिया से गायब आदिवासियों के संघर्ष की कहानी

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Ground Report | News Desk

देश में प्रगति के चिन्ह माने जाने वाले बड़े-बड़े बांध, रेल योजनाएं, एक्सप्रेसवे, पर्यटन स्थल, हवाई अड्डे, इंडस्ट्रीस के पीछे कई लोगों के त्याग की कहानियां छिपी होती हैं। जिस ज़मीन पर ये परियोजनाएं लगाई जाती हैं वहां कभी किसानों, आदिवासियों, के खेत और जंगल हुआ करते थे। कई गरीबों के घर हुआ करते थे। जब ये परियोजनाएं बन कर तैयार हो जाती हैं तो इन गरीब, किसान, आदिवासियों और विस्थापितों को भुला दिया जाता है। उनके समर्पण पर मुआवज़े का लेप लगाकर छिपा दिया जाता है।

आज हम बात कर रहे हैं ऐसे ही एक ज़मीन विवाद की जहां आदिवासियों की ज़मीन पर दुनिया की सबसे उंची मूर्ति तामील की गई। भारत को एक सूत्र में बांधने वाले सरदार पटेल की मूर्ती गुजरात के नर्मदा जिले में केवड़िया नामक गांव में बनाई गई। इस मूर्ति को स्टेच्यु ऑफ युनिटी का नाम दिया गया यानि एकता की मूर्ति। यह विश्व की सबसे उंची प्रतिमा है। जिस ज़मीन पर यह मूर्ति बनाई गई है। वहां के आदिवासियों को विस्थापन का दर्द झेलना पड़ा। इन लोगों को सरदार पटेल की मूर्ती से ऐतराज़ नहीं है। लेकिन ये लोग निराश हैं सरकार के रवैये से। इनका आरोप है कि सरकार ने ज़मीन के बदले जो वादे किये थे उन्हें अमल नहीं किया। सरकार ने आदिवासियों को ज़मीन के बदले ज़मीन और नौकरी का वादा किया था जो अभी तक पूरा नहीं हो सका है। जबकि सरकार का कहना है कि वह अपना वादा पूरा कर चुकी है।

इससे जुड़ा जो एक अहम विवाद है वह यह कि स्टेचू ऑफ यूनिटी के आसपास सरकार पर्यटन स्थल विकसित करना चाहती है। इसके लिए अतिरिक्त ज़मीन की आवश्यकता है। सरकार ने 1962 में सरदार सरोवर के लिए की गई अधिग्रहित ज़मीन को खाली करवाना शुरू कर दिया। 1962 के बाद से अब तक सरकार ने इस जमीन की सुध नहीं ली थी। यहाँ लोगों को रहने दिया गया। सालों से लोग इस जमीन पर बसे हैं। फिर जब सरकार को अब पर्यटन स्थल बनाना है तो 1962 में अधिग्रहित की गई जमीन की याद सरकार को आ गई। और अचानक से यहां बसे लोगों से ज़मीन खाली कराई जाने लगी। इस मामले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी, कोर्ट ने अगले आदेश तक ज़मीन अधिग्रहण पर रोक लगाई है। वहां बसे लोगों का मानना है कि पुराने अधिग्रहण को रद्द कर सरकार नई शर्तों की साथ अधिग्रहण करे और विस्थापितों को मुआवजा दे।

सरदार पटेल की मूर्ति बनाकर सरकार इस जगह को देश के सबसे बड़े पर्यटन स्थल के रुप में विकसित करना चाहती है। सरदार पटेल की मूर्ती के आसपास भव्य ऑडिटोरियम, कई स्टेट हाउस, फूड प्लाजा़, और फूलों की घाटी विकसित की गई है। ताकि लोग जब यहां आएं तो सरदार पटेल की मूर्ती के साथ-साथ यहां आसपास घूम सकें। कई विस्थापित हुए आदिवासी परिवारों को यहां नौकरी भी दी गई है। ऐसा दावा सरकार करती है।

देश इस समय कोरोना वायरस की वजह से लॉकडाउन में है। लॉकडाउन ने सबसे अधिक ट्रेवल और टूरिज्म इंडस्ट्री को बर्बाद किया है। और यह प्रभाव लंबे समय तक दिखाई देगा। WHO ने कहा है कि यह वायरस कभी खत्म नहीं होगा ऐसे में टूरिज्म इंडस्ट्री को दोबारा खोलना एक चुनौती होगा। सरकार ने केवडिया को पर्यटन स्थल बनाने के लिए भारी निवेश किया है। ऐसे में कोरोना की मार का सामना इस जगह को भी करना होगा।

सरदार पटेल की मूर्ति और पर्यटन स्थल बनाने के लिए जिस ज़मीन का अधिग्रहण हुआ है उससे आसपास के 72 गांव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए है। 6 गांव के 5 हज़ार आदिवासियों से सरकार ने उनकी जमीन खाली करवाई है। यह 6 गांव हैं केवड़िया, वगाडिया, नवागम, लिमडी, कोठी और गोरा।

जब 31 अक्टूबर 2018 को प्रधानमंत्री मोदी ने इस ऐतिहासिक मूर्ति का लोकार्पण किया तब इस मूर्ति से प्रभावित हुए 72 गांवों ने अपने घर खाना न पका कर इसका शांतिपूर्ण रूप से विरोध किया। आसमान में काले गुब्बारे उड़ाए ताकि उनका विरोध विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा के सामने दर्ज हो सके। लेकिन यह सब मीडिया और सत्ता ने नज़रंदाज़ कर दिया।

स्थानीय आदिवासी नेता इसे महज़ पैसों की बर्बादी मानते हैं। सरकार यहां सरदार सरोवर से पानी छोड़ कर बोट क्लब बनाना चाहती है, ग्रामीणों को उनके घर डूबने के डर सता रहा है। इस योजना में सरकार पर पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन का भी आरोप है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार नेशनल पार्क या अभ्यारण से 10 किलोमीटर की दूरी पर इस तरह की परियोजना को मंजूरी नही है। लेकिन स्टेचू ऑफ यूनिटी से महज 3 किलोमीटर की दूरी पर शूलपनेश्वर वन अभ्यारण स्थित है।

देश में ऐसी तमाम विकास परियोजनाएं हैं जिससे कई लोग विस्थापित हुए हैं। बड़े बड़े बांधों की वजह से कई गांव डूब चुके हैं। और विस्थापित हुए लोग आज भी मुआवज़े के लिए संघर्षरत हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन इसी का सबूत है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने जन्मदिन के दिन सरदार सरोवर बांध को ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंचाया तो मध्यप्रदेश के धार में लोगों के घरों में पानी घुसने लगा। लोग अपने घरों को छोड़ने को तैयार नहीं। जाएं भी कहाँ सरकार अब तक विस्थापितों को बसाने में नाकामयाब रही है।

मीडिया के स्क्रीन से विस्थापितों की कहानियां नदारद हैं। न कोई रिपोर्टर ज़मीनी हकीकत दिखाने इन आदिवासियों के घरों में जाना चाहता है क्योंकि ये मुद्दे TRP नहीं बटोरते और शायद सत्ता से टकराने का दम हमारा मीडिया खो चुका है। उसे सरदार पटेल की मूर्ति की ऊंचाई के आगे देश का आदिवासी अदना दिखाई पड़ता है। सरदार सरोवर में भरा लबालब पानी उसे ज़्यादा आकर्षित करता है किसी गरीब के डूबे हुए घर में उसे अब कोई खबर नहीं दिखाई देती।

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