स्वतंत्रता दिवस: आओ ज़रा पीछे मुड़कर देखें

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विचार, कार्तिक सागर समाधिया

सालों पहले पनपी सभ्यता आज अपने कानून के सहारे भविष्य की ओर अग्रसर होती हुई कुछ यूं डोलती चली आ रही है, जैसे उसे मालूम है, असल में हम कहाँ से चले थे और कहाँ आ गए और उस समर का मोल क्या है।

विज्ञान पुनर्जन्म को नहीं मानता, लेकिन इतिहास में मिली कुछ कब्रें बताती है कि मनुष्य से मनुष्य का रिश्ता फिलहाल दक्षिणी देशों में, खासकर भारत में जन्मान्तरों का है और यही विश्वास ही अपने इतिहास , संस्कृति और वर्तमान जीवन से जोड़े रखता है।

दरअसल मैं इतिहास के पन्नों में खंगाले जाने वाले कालखंडों को और सभ्यताओं को चन्द शब्दों में इसलिए बटोरने की कोशिश कर रहा हूँ क्योंकि हमें पता होना चाहिए कि हमारी आज़ादी का मोल क्या है।

पश्चिमी देशों के आक्रमण और साइंस के बढ़ते वर्चस्व से कई देश और कई सभ्यताएं मिट गई लेकिन इकलौता भारतवर्ष ऐसा है जिसने अपनी साख बचाई और साथ में उन लोगों को भी अपने साथ कर लिया जिन्होंने हमें मिटाने के कयामती ख्वाब देखे थे।

भारत दरअसल सिंधु घाटी से चला वो देश है जिसने हिन्द हिन्द होते होते अपने सामाजिक राजनैतिक आर्थिक मूल्यों को इकट्ठा कर लिया था। हिन्द हुए तो हमने इमारतों की शक्लें ली तो इंडिया होते होते रेल लाइनों के सहारे और हाइवे से होता हुआ मॉर्डन इंडिया तक आ पहुंचा।

आज भारत सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में ज़रूर शामिल हो चुका है, लेकिन रुपये के ऐतिहासिक कमजोर होने वाली खबरों के बीच बहुत कुछ ऐसे सवाल भी हैं जो प्राचीन खण्डरों में चीखते चिल्लाते नजर आ रहे हैं। शायद जिन्हें अब खत्म हो जाना था।

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अगर उन्हीं बुनियादी सवालों पर नज़र डाली जाए तो समझ आएगा कि हम कहाँ से चले थे और कहाँ आ गए। आज़ादी के बाद सत्ता हस्तांतरण हुई तो हम हिंदुस्तान बनाने में जुट गए। विश्व की निगाहें थी कि यह देश संसाधनों के अभाव में कैसे ज़िंदा रह पाएगा, लेकिन हम संभलें और आगे बढ़े।

एक समय तो ऐसा लगा हम सब भूलकर चल दिये स्वर्णिम भारत बनाने। हम यह नहीं भूले कि जातियों और धार्मिक बेड़ियों में जकड़े लोगों से किनारा कर हमें कैसे चलना है। अल्पसंख्यको को अल्पसंख्यक दर्जा दिया तो खो चुकी धार्मिक आस्थाओं को पोषित होने के लिए मानसिक बल। आदिवासियों और मैला ढोती प्रथाओं को सामान्य के समतल करने के लिए आरक्षण । जनता खुश थी हम बढ़ चले हैं लेकिन मुल्क का बंटवारा धर्मिक आसन्तुष्टियों को गहरा कर गया।

लेकिन यह क्या हुआ अचानक आज़ादी और देश के संप्रभुता के लिए लड़ने वाला राजनैतिक वर्ग सत्ता की कुर्सियां हथियाने के लिए धर्म मंदिर मस्जिद की मारकाट में शामिल हो गया और हिंदुस्तान फिर छोटी-छोटी जातियों में बंट गया। मंदिरों में भगवान अचानक प्रकट हो गए तो चलती ट्रेनों में श्रद्धालुओं को ज़िंदा जला दिया। कभी सुअर काटकर दंगे भड़का दिए तो कभी गाय के नाम पर मनुष्य हत्या का पाप ले लिया। हम इन बातों में भूल गए कि इन्हीं दरबारी खिलवाड़ और राजकोषों की लूट ने उन बड़े पूंजीपती देशों के सामने हाथ फैलाने पर मजबूर कर दिया। मुल्क में राष्ट्रपिता मारा गया, तो प्रधानमंत्री गोलियों से छलनी भी हुए। मानवबम ने देश के शीर्ष सिंहासन को भी नहीं बख्शा।

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आज वैश्विक स्तर पर बढ़े आकायी मुल्कों ने भारत को आर्थिक गुलामी की जंजीरों में कसना शुरू कर दिया। मौका देख मौका परस्ती के साथ। उन्होंने बाज़ार मुल्क पर इतना हावी कर दिया कि घर में कतने वाले करघे सूत कातना भूल गए। आज कल राजनीति गर्व से कहती है कि भारत विश्व के देशों के लिए बड़ा आर्थिक बाजार बन गया है लेकिन सवाल वहीं घूमकर आता है कि हम 71 सालों में ऐसा समाज क्यों नहीं बना पाए जो खुद की अर्थिकताओं में अपना बाजार तलाश सके।

आखिर में सिर्फ इतना ही कि हमने दरअसल सत्ता के शीर्ष पर सही लोगों को नहीं पहुंचाया। हमने उन लोगो को नहीं पहुंचाया जिन्होंने देशहित पहले रखा।

जबतक सत्ता के गलियारों तक मौजूदा राजनीतिओं से अलहदा वैकल्पिक विकल्प नहीं तलाश लिए जाएंगे तब तक हम पूर्ण स्वराज से वंचित रहेंगे। हमें समझना होगा पुरानी सभ्यता होने के नाते इन भटकते कदमों की आहट को।

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