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एक एकड़ ज़मीन में गेहूं लगाने पर कितना ख़र्च- कितनी बचत !

गेहूं
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गेहूं लगाने के लिए खेत को तैयार करना पड़ता है जिस पर 1300 रुपये खर्च होते हैं। (ट्रैक्टर हेरो की मदद से मिट्टी को खोदकर मुलायम करता है, एक बार हेरो मारने के 500 रुपये फिर सुहागा फेरते हैं जो जिसके 300 रुपये।

गेहूं का बीज 40 किलो 1500 से 2000 के बीच (बीच का रख लेते हैं 1800 रुपये बीज को बायोविटा से ट्रीट करते हैं – 140 रुपये गेहूं बीजने के साथ ही एक बोरी 50 किलो DAP डलती है- 1260 रुपये

72 घंटे में स्प्रे करनी होती है खरपतवार को रोकने के लिए, अवकेश नाम की दवा लगती है कुछ ग्राम पानी में डालकर स्प्रे करते हैं- क़ीमत 2200 रुपये, स्प्रे करने के 150 रुपये = 2350 20-25 दिन गेहूं में पहला पानी लगता है जिसके साथ पहला यूरिया और सल्फ़र लगती है 275 + 300= 575 रुपये

अगले 10 दिन बाद मंडूसी को मारने के लिए एक स्प्रे लगती है- 1650 रुपये अगले 15 दिन बाद दूसरी बार यूरिया 275+ 10 किलो जिंक 500 लगता है= 775 रुपये

फसल के हाल देखकर तीसरे पानी के साथ तीसरा यूरिया लगता है- 275 रुपये तीन महीने बाद पोटाश 50 किलो 900 रुपये, लगवाई 100 रुपये = 1000 रुपये गेहूं की बाली निकलने पर एक स्प्रे होती है प्रोटीकेनाजॉल- 800 रुपयेबीच में गेहूं की जड़ों में बीमारी लगती है उसके लिए एक दो स्प्रे लगती है = 1300 रुपये

इसके बाद फसल कटने के लिए तैयार, कंबाइन वाला 2000 रुपये लेता हैकंबाइन के बाद जो बचता है उसमें किसान आग लगा देता है नहीं लगाता तो उसे कटवाने का 1500 रुपये खर्चा लगता है जिसे वो बचाने की कोशिश करता है। आजकल कुछ कंपनियों वाले आते हैं और इस प्राली को बांधकर ले जाते हैं उसके लिए भी किसानों को उन्हें पैसा देना पड़ता है। सरकार मदद करे तो इसे सुलझाया जा सकता है।

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गेहूं को मंडी में ले जाने का खर्चा= 1000 रुपये कुल जमा हुए = 17725 रुपये एक एकड़ में गेहूं लगाने का खर्च है। इसमे बिजली पानी का खर्चा नहीं जोड़ा गया है।

पैदावार – 20 से 22 क्विंटल के बीच = अगर MSP मिले तो 20 क्विंटल गेंहू के 38500 रुपये बनते हैं

38500-17725 = 20775 रुपये की बचत एक एकड़ से (चार महीने की फसल है, एक सीज़न जिसके बाद खेत ख़ाली भी छोड़ना पड़ता है )

6 महीने में एक किसान को 20775 रुपये बचते हैंप्रति महीना = 3462 रुपये ये पैसा भी तब बचेगा जब जमीन किसान की होगी, अगर नहीं तो फिर तो दिनों को धक्का देनी वाली बात है ।

सरकार-अडानी की मिलीभगत, एक और बड़ा घोटाला !

ज़रूरी बात- नवंबर में किसान गेंहू बोना शुरू करता है। अगले चार महीने तक जेब से पैसा खर्चा करता है फिर जाकर उसे उसकी बचत मिलती है। इस टाइम फ्रेम में किसान को आढ़ती की जरूरत पड़ती है कि फसल लगाने के लिए पैसा मिलता है, दूसरा इस समय कोई बीमारी घेर ले तो पैसा कौन देगा ? आश्वस्तिबोध ओपन मार्केट में खोजना बहुत मुश्किल काम है।

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3462 रुपये प्रति महीना मनरेगा में मिलने वाली मज़दूरी से भी कम है। इतने पैसे को कमाने के लिए सिर्फ़ एक किसान ही नहीं बल्कि पूरे परिवार की मेहनत लगी हुई है। इस पैसे के लिए किसान दिसंबर- जनवरी की ठंड में अपनी फसल की देखरेख करता है, कड़ाके की ठंड में पानी देने जाता है। 5-6 लोगों का परिवार है। इस पैसे में बच्चों की फ़ीस भी देनी है, बीमार होने पर दवा भी लेनी है, पर्व त्यौहार भी करने है।

अगर इसमें MSP पर फसल नहीं बिकी तो प्रति एकड़ किसान को 4500 रुपये का नुक़सान है। दो एकड़ है तो 9000 रुपये का सीधा सीधा नुक़सान। देश में 86 फीसद किसान छोटी जोत का है।

Abhinav Goel की रिपोर्ट

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