Hike Fellowship : डियर प्रधानमंत्री जी, क्या ‘जय अनुसंधान’ एक जुमला है?

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Opinion | कोमल बड़ोदेकर

बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘जय अनुसंधान’ का नारा दिया। बात बीती 3 जनवरी की है। जहां जालंधर में आयोजित 106वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस में ‘भविष्य का भारत: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी’ विषय पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारतीय वैज्ञानिकों का जीवन और कार्य, प्रौद्योगिकी विकास और राष्ट्र निर्माण के साथ गहरी मौलिक अंतर्दृष्टि के एकीकरण का शानदार उदाहरण है।

इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नारे ‘जय जवान-जय किसान’ और अटल बिहारी वाजपेयी के ‘जय विज्ञान’ में ‘जय अनुसंधान’ को भी जोड़ दिया। उन्होंने कॉलेज और राज्य विश्वविद्यालयों में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए कार्ययोजना तैयार किए जाने का आह्वान किया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि नवोन्मेष और स्टार्टअप पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। पहले के 40 साल के मुकाबले पिछले चार साल में प्रौद्योगिकी व्यवसाय के क्षेत्र में काफी काम हुआ है। उन्होंने कहा, ‘आज का नया नारा है- जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान, जय अनुसंधान। मैं इसमें जय अनुसंधान जोडऩा चाहूंगा।’

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत का प्राचीन ज्ञान अनुसंधान पर आधारित रहा और भारतीयों ने गणित, विज्ञान, संस्कृति और कला में अपने योगदान के जरिए विश्व को नई दिशा दिखाई है। कृषि क्षेत्र में, खासकर किसानों की मदद के लिए बड़े डेटा विश्लेषण, कृत्रिम मेधा, ब्लॉकचेन तकनीक का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उन्होंने वैज्ञानिकों से लोगों के जीवन को असान बनाने की दिशा में काम करने का आग्रह भी किया।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह विज्ञान ही है जिसके माध्यम से भारत अपने वर्तमान को बदल रहा है और अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा, ‘भारतीय विज्ञान के लिए 2018 एक अच्छा वर्ष रहा। इस साल हमारी उपलब्धियों में उड्डïयन श्रेणी के जैव ईंधन का उत्पादन, दृष्टिबाधितों को पढऩे में मदद करने वाली मशीन -दिव्य नयन, सर्वाइकल कैंसर, टीबी, डेंगू के निदान के लिए किफायती उपकरणों का निर्माण और भूस्खलन के संबंध में सही समय पर चेतावनी प्रणाली जैसी चीजें शामिल हैं।’

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उन्होंने कहा, ‘हमें अपनी अनुसंधान एवं विकास उपलब्धियों के व्यवसायीकरण के लिए औद्योगिक उत्पादों के जरिए एक सशक्त योजना की आवश्यकता है।’ उन्होंने यह भी कहा कि आगामी भविष्य चीजों को साथ लाने और संयुक्त प्रौद्योगिकियों का है। उन्होंने कहा, ‘अनुसंधान और विकास में हमारी शक्तियां हमारी राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं, केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आईआईटी, आईआईएससी, टीआईएफआर और आईआईएसईआर के आधार पर निर्मित हैं।

डियर प्रधानमंत्री जी जब आपको अनुसंधान के बारे में इतना गहरा ज्ञान है तो आप इस ओर कब ध्यान देंगे कि देश के हजारों शोधार्धी पिछले कई महीनों से फेलोशिप में बढ़ोत्तरी की मांग कर रहे हैं। एक ओर तो आप देश के विकास, तरक्की और प्रगति में अनुसंधान का जिक्र और जय अनुसंधान का नारा दे रहे हैं वहीं दूसरी ओर देश भर के करीब 1 लाख 5 हजार से ज्यादा छात्र टकटकी लगाए बैठे हैं कि आप फेलोशिप बढ़ाने के मुद्दे पर अपनी चुप्पी कब तोड़ेंगें।

सरकारी प्राइमरी शिक्षा पहले ही बदहाल स्थिति में थी ऊपर से हर गली मोहल्ले में खुले प्राइवेट स्कूलों ने उनकी स्थिति को और बदतर करने का काम किया। वहीं जहां हम विश्वगुरू बनने की बात तो कर रहे हैं लेकिन उच्च शिक्षा की अहम जरूरतों पर पर्दा डाल रहे हैं। देश के शोधार्धी प्रयोगशालाओं को छोड़ किसी सरकारी कर्मचारियों की यूनियनों की तरह सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।

पिछले चार वर्षों से समान फेलोशिप पर शोधकार्य
CSIR (विज्ञान तथा औद्योगिक अनुसन्धान परिषद), UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग), DBT (डिपार्टमेंट ऑफ़ बायोटेक्नोलॉजी) आदि द्वारा JRF (जूनियर रिसर्च फ़ेलोशिप), SRF (सीनियर रिसर्च फ़ेलोशिप), PDF (पोस्ट डॉक्टरल फेलोशिप), GATE (ग्रेजुएट एप्टीट्यूट टेस्ट इन इंजीनियरिंग), NON-NET (नॉन-नेट फेलोशिप) सहित खई अन्य सरकारी विभाग शोधार्थियों को फेलोशिप देतें हैं, लेकिन पीछले चार वर्षों से ये समान छात्रवृत्ति पर काम कर रहे हैं।

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क्या शोधार्थियों को रेलवे की तरह कोई यूनियन बनाना चाहिये?
क्या शोधार्थियों को बैंक या रेलवे के कर्मचारियों की तरह अपना यूनियन बना लेना चाहिए। जो अपना लाइब्रेरी का काम-धाम छोड़ हर बात पर बंद का आह्वान कर दें। जैसे देश में कभी रेल रोक दी जाती है या कभी अचानक बैंको की हड़ताल हो जाती है। जब पानी सर से ऊपर होता है तो सरकार की कान पर जूं रेंगती है कि फलां रेलवे या बैंक यूनियन हड़ताल पर है। तब सरकार को समझ आता है कि स्थिति कितनी गंभीर है।

क्या सरकार कंगाल हो चुकी है?
केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से लेकर केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन, पृथ्वी विज्ञान मंत्री और भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार समेत तमाम आला अधिकारीयों के साथ बैठक, मुलाकातें, ज्ञापन भी सौंपने के बावजूद भी अब तक कोई ठोस परिणाम नहीं मिले। सरकार मिले तो सिर्फ आश्वासन। क्या सरकार कंगाल हो चुकी है या सरकार के पास ऐसी कोई योजना या नहीं है या ऐसी क्या मजबूरी है जो तीन-तीन डेडलाइन दिए जाने के बावजूद भी आश्वासन ही मिल रहा है। अब ये छात्र आगामी 16 जनवरी से राष्ट्रव्यापी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं।

क्या सवर्ण आरक्षण की तरह इसमें वैसा राजनीतिक फायदा नहीं ?
आखिर सरकार क्यों नहीं बताती कि, ज्ञापनों के दौर से लेकर आज तक शोधार्थियों की फेलोशिप बढ़ाने के संबंध में सरकार ने क्या पहल की है और ये काम कहां तक पहुंचा है। क्या वाकई इस संबंध में सरकार ने अब तक कोई ठोस कदम उठाए या इन शोधार्थियों से लोकसभा चुनाव में सवर्णों के आरक्षण जितना कोई राजनीति फायदा नजर नहीं आ रहा है। ऐसे कई सवाल हैं जिनका ये शोधार्थी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

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नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट (NET), ग्रेजुएट एप्टीट्यूट टेस्ट इन इंजीनियरिंग (गेट) उत्तीर्ण युवाओं को यूजीसी की ओर से दिए जाने वाली फेलोशिप में पिछली बार करीब 55 फीसदी वृद्धी की गई थी। यूजीसी ने उच्च शिक्षा के लिए मिलने वाली करीब 15 फेलोशिप और स्कॉलरशिप की राशि को 55 प्रतिशत तक बढ़ाया और इसे 1 दिसंबर 2014 से लागू किया था।

अभी इतनी मिलती है फेलोशिप
2014 में लागू किए गए नए नियम के मुताबिक जहां जेआरएफ और एसआरएफ छात्रों को क्रमश: 16 हजार और 18000 रुपये प्रतिमाह मिलते थे वहीं अब इन्हें क्रमश: 25000 और 28000 रुपये मिल रहे हैं। इसके साथ ही 20 फीसदी आवास भत्ता इसके अतिरिक्त सुनिश्चित है। जबकि बेसिक साइंटिफिक रिसर्च (बीएसआर) के लिए पहले और दूसरे साल में 16,000 रुपये को बढ़ाकर 24,800 रुपए प्रतिमाह किया गया है। जबकी तीसरे, चौथे और पांचवे साल में मिलने वाली 18,000 रुपये प्रतिमाह फेलोशिप की जगह 27,900 रुपए प्रति माह सुनिश्चित है।

रिसर्च फेलो की प्रमुख मांग-
1) जेआरएफ, एसआरएफ, पीएचडी कर रहे लोगों की फेलोशिप की रकम 20 फीसदी प्रतिवर्ष के हिसाब से 80 फीसदी बढ़ाई जाए। क्योंकि यह हर चार वर्ष में एक बार बढ़ती है। 2) फेलोशिप के तहत मिलने वाली यह रकम हर महीने समय पर आए, क्योंकि अब तक यह रकम कभी तीन महीने, छह महीने या कभी 8 महीने गुजर जाने के बाद मिलती है। 3) सरकार वेतन आयोग के तहत ऐसी गाइडलाइन बनाए जिससे यह तय हो कि फेलोशिप के तहत करने वाले रिसर्चर्स को हर महीने समय पर फेलोशिप की रकम मिले।

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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