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मुसलमानों का वो महान लीडर, जिसे नमाज़ पढ़ते वक़्त ज़हर में डूबी हुई तलवार से किया गया क़त्ल

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Hazrat Ali : मुसलमानों के चौथे खलीफा और शिया मुसलमानों के पहले इमाम के रूप में जाने जाते हैं हजरत अली, इनका असली नाम है अली इंबे अबी तालिब अली इब्ने अबी तालिब का जन्‍म 17 March 601 (13 रजब 24 हिजरी पूर्व) मुसलमानों के तीर्थ स्थल काबा के अन्दर हुआ था. वे पैगम्बर मुहम्मद (स.) के चचाजाद भाई और दामाद थे और उनका चर्चित नाम हज़रत अली है. वे मुसलमानों के ख़लीफ़ा के रूप में जाने जाते हैं. उन्होंने 656 से 661 तक राशिदून ख़िलाफ़त के चौथे ख़लीफ़ा के रूप में शासन किया, और शियों के अनुसार वे 632 से 661 तक पहले इमाम थे.

पैगंबर-ए-अकरम के चचेरे भाई और इमाम हजरत अली अ. का जन्म मक्का-ए-मुअज्जमा में काबे के अंदर 13 रजब को हुआ था. दीवार फटी और उसमें बने दर से फातमा बिंत-ए-असद काबे में दाखिल हुई थीं. तीन दिन बाद हजरत अली अ. ने पैगंबर-ए-अकरम हजरत मोहम्मद मुस्तफा स. की गोद में आंख खोल कर सबसे पहले रसूल-ए-अकरम की ज्यारत की. रसूल स. की गोद में हजरत अली ने आसमानी किताबें तौरेत, जुबूर, इंजील और कुरआन की तिलावत की थी. इमाम अली अ.स. की शख़्सियत इतिहास की ऐसी शख़्सियत हैं जिनके बारे में बड़े बड़े उलमा और विद्वानों ने अनमोल बातें कही हैं, यहां तक वह लोग जो आपको इमाम और आपकी इमामत को भी नहीं मानते उन्होंने भी आपको इतिहास की बे मिसाल शख़्सियत बताया है.

ग़ैर मुस्लिम विद्वानों की निगाह में अली

ब्रिटेन के इस मशहूर विद्वान का कहना है कि इमाम अली अ.स. (Hazrat Ali) सभी ख़ुल्फ़ा के बीच सबसे शरीफ़, नर्म दिल और ग़रीबों का ख़्याल रखने वाले थे, आपकी अमानतदारी और अदालत की गंभीरता ने उन अरबवासियों जिन्होंने बड़े बड़े बादशाहों के साम्राज्य को बर्बाद कर दिया था उन सबको परेशान और दुखी कर रखा था, लेकिन आपकी सच्चाई, नर्मी, इबादत, नैतिकता और दूसरे बहुत से नेक सिफ़ात ने आपको इस क़ाबिल बनाया था कि आपकी तारीफ़ की जाए.

फ़्रांस के इस मशहूर का कहना है कि इमाम अली अ.स. न केवल ख़ुद हालात के धारे में नहीं बहे बल्कि हालात के धारे को भी मोड़ दिया, उनके कामों को देख कर उनकी सोंच और उनके विचारों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है, जंग के मैदान में पहलवान थे लेकिन दिल नर्मी और मोहब्बत से भरा रहता था, दुनिया की किसी भी चीज़ की कोई लालाच उनकी ज़िंदगी में नहीं दिखाई देती, हक़ीक़त में उन्होंने अपनी जान को इस्लाम पर क़ुर्बान कर दिया, उनके पूरे वुजूद को ख़ुदा के ख़ौफ़ ने घेर रखा था.

इमाम अली की ज़िंदगी

इमाम अली अ.स. (Hazrat Ali) की ज़िंदगी की एक और अहम बात यह थी कि आप हमेशा बे सहारा लोगों की मदद करते थे, ज़ाहिर है समाज में बे सहारा और ग़रीब लोगों को और कुचल दिया जाता है न उनकी फ़रियाद कोई सुनता है न उनके साथ अदालत और ईमानदारी के साथ सुलूक होता है, लेकिन आपने अदालत को जारी करते हुए न केवल ऐसे लोगों की मदद की बल्कि अपनी करामत और शराफ़त की मिसाल भी पेश की, पैग़म्बर स.अ. आपकी इस सिफ़त के बारे में फ़रमाते थे कि यह अल्लाह का दिया हुआ तोहफ़ा है और ऐ अली (अ.स.) अल्लाह ने आपको बनाया ही इस तरह है कि आप बे सहारा और ग़रीब लोगों की मदद करते रहें और उनके साथ समय बिताएं, और आप उनको अपनी पैरवी करने वाले समझ कर उनसे मोहब्बत करें और वह आपको अपना इमाम समझ कर।

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आप बाग़ों में काम करके इतनी रक़म हासिल कर लेते थे कि आपकी ज़िंदगी आराम से गुज़रे लेकिन आप उस सभी रक़म को अल्लाह की राह में ख़र्च कर देते थे, आपका हक़ छीनने के समय की ज़िंदगी हो या ज़ाहिरी ख़िलाफ़त पर आने के बाद की दोनों में आपने साधारण जीवन बिताया है, जबकि उस समय मुसलमानों की ताक़त के हर तरफ़ चर्चे थे और मुसलमान अच्छी ज़िंदगी गुज़ार रहे थे लेकिन आपने अपने लिए सादी ज़िंदगी ही को चुन रखा था, आप ख़ुद ही फ़रमाते थे कि ख़ुदा की क़सम मेरे कपड़ों पर इतना रफ़ू हो चुका है कि अब रफ़ू करने वाले को देने से शर्म आने लगी है, आपने लगभग पांच साल हुकूमत की लेकिन इस दौरान ना ही एक ईंट अपने घर में लगाई ना ही कोई ज़मीन अपने नाम की, बल्कि जैसे ज़ाहिरी हुकूमत से पहले एक साधाराण इंसान की तरह ज़िंदगी गुज़ार रहे थे बिल्कुल उसी तरह हुकूमत के आने बाद भी एक सादा ज़िंदगी गुज़ार रहे थे.

कैसे क़त्ल किया गया अली को ?

18 रमज़ान (इस्लामिक कैलंडर का नौवां महीना) की रात अली (Hazrat Ali) ने नमक और रोटी से रोज़ा इफ्तार किया. रिवायतों में उनकी बेटी ज़ैनब के हवाले से मिलता है कि रातभर बाबा (अली) बेचैन रहे. इबादत करते रहे. बार-बार आंगन में जाते और आसमान को देखते. 19 रमज़ान को सुबह की नमाज़ पढ़ाने के लिए अली मस्जिद पहुंचे. मस्जिद में मुंह के बल अब्दुर्रहमान इब्ने मुलजिम नाम का शख्स सोया हुआ था. उसको अली ने नमाज़ के लिए जगाया. और खुद नमाज़ पढ़ाने के लिए खड़े हो गए. इब्ने मुल्जिम मस्जिद के एक ख़म्भे के पीछे ज़हर में डूबी तलवार लेकर छिप गया. अली ने नमाज़ पढ़ानी शुरू की. जैसे ही सजदे के लिए अली ने अपना सिर ज़मीन पर टेका, इब्ने मुलजिम ने ज़हर में डूबी हुई तलवार से अली के सिर पर वार कर दिया. तलवार की धार दिमाग़ तक उतर गई. ज़हर जिस्म में उतर गया.

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19 रमज़ान को हजरत अली अ. पर इराक में कूफा शहर की मस्जिद में सुबह की नमाज में एक अब्दुर्रहमान इब्ने मुलजिम नामक दुनिया के पहले आतंकवादी ने तलवार से हमला किया जिससे 21 रमजान सन 40 हिजरी (29 जनवरी 661) को हजरत अली अ. की शहादत हो हजरत अली अ. का एजाज मोजिज़ा) ये है कि वो काबे में पैदा हुए और शहादत मस्जिद में पाई. अब्दुर्रहमान इब्ने मुल्जिम की तलवार सर पर लगते ही मौला ने दोनों हाथों से अपना सर पकड़ कर एलान किया- काबे के रब की कसम मैं कामयाब हो गया.

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अब्दुर्रहमान इब्ने मुलजिम के बारे में कहा जाता है कि उसने ये अटैक मुआविया के उकसावे में आकर किया. मुआविया अली के खलीफा बनाए जाने के खिलाफ था. अली के जिस्म में ज़हर फैल गया हकीमों ने हाथ खड़े कर दिए और फिर 21 रमजान को वो घड़ी आई, जब शियाओं के पहले इमाम और सुन्नियों के चौथे खलीफा अली इस दुनिया से रुखसत हो गए. मुआविया की दुश्मनी अली की मौत के बाद रुकी नहीं. उनके बाद अली के बड़े बेटे हसन को ज़हर देकर मारा गया और फिर कर्बला (इराक) में अली के छोटे बेटे हुसैन को शहीद किया गया.

आज के दौर मे हज़रत अली (Hazrat Ali) की जीवन दर्शन प्रसांगिक है. उन्होंने अमन और शान्ति का पैगाम दिया और बता दिया कि इस्लाम कत्ल और गारतगिरी के पक्ष में नही है. जानबूझ कर किसी का कत्ल करने पर इस्लाम मे अदबी आज़ाब मुर्कर है. उन्होंने कहा कि इस्लाम तमाम मुसलमानों का मज़हब है .अल्फाज़ और नारों से हट कर अदल और इंसाफ की हकीकी तस्वीर पेश की. उन्होंने राष्ट्रप्रेम और समाज मे बराबरी की पैरोकारी की.वह कहा करते थे कि अपने शत्रु से भी प्रेम किया करो तो वह एक दिन तुम्हारा दोस्त बन जायेगा. उनका कहना है कि अत्याचार करने वाला ,उसमे सहायता करने वाला और अत्याचार से खुश होने वाला भी अत्याचारी ही है.

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