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लॉकडाउन में ग्रामीण भारत को बस एक वक्त की रोटी ही नसीब…

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News Desk, Ground Report:

कोरोनोवायरस(Coronavirus) के लॉकडाउन(Lockdown) के प्रभाव को समझने के लिए कुछ नागरिक समाज संगठनों ने एक सर्वे किया. जिसमें पता लगा कि कोरोनावायरस की वजह से लागू देशव्यापी लॉकडाउन में ग्रामीण परिवारों की ज़िन्दगी और बद्तर होती जा रही है. 12 राज्यों में हुए इस सर्वे के मुताबिक़ ग्रामीण छेत्रों में रहने वाले परिवारों में से 50% लोगों को भोजन का प्रबंध करना मुश्किल हो रहा है. ये 50 प्रतिशत लोग लॉकडाउन और पैसे की तंगी की वजह से कम भोजन का प्रबंध कर पा रहे हैं या दिन में एक ही बार भोजन कर रहे हैं. जबकि सर्वेक्षण में शामिल 84% परिवारों ने कहा कि उन्हें पीडीएस के माध्यम से राशन मिला है, लेकिन फिर भी 16% लोग पीडीएस से अभी भी वंचित है.

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सर्वेक्षण में पाया गया कि लॉकडाउन की वजह से महिलाओं को संकट का सामना ज्यादा करना पड़ रहा है. लगभग 62% परिवारों में महिलाएं पानी लाने के लिए जल स्त्रोत की अधिक यात्राएं करने पर मजबूर हैं और 68% घरों में महिलाएं ईंधन की लकड़ी इकट्ठा करने में अधिक समय बिता रही हैं.

इस नागरिक संगठन के अध्ययन का नाम है “COVID-19 लॉकडाउन में ग्रामीण छेत्र कैसे निपट रहे हैं?”. इसमें 28 अप्रैल से 2 मई के बीच 12 राज्यों के 47 जिलों के 5162 घरों को कवर किया गया था. इन राज्यों में मध्य प्रदेश, झारखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार, असम और कर्नाटक शामिल हैं.

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ये सर्वे PRADAN, एक्शन फॉर सोशल एडवांसमेंट, BAIF, ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया फाउंडेशन, ग्रामीण सहारा, SAATHI-UP और द आगा खान रूरल सपोर्ट प्रोग्राम (इंडिया) आदि संगठनो का एक सहयोगपूर्ण अध्ययन था जिसमें विकास अन्वेषन फाउंडेशन और सम्बोधी (SAMBODHI) के अनुसंधान भी शामिल थे.

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इस सर्वे के अध्ययन में एक तिहाई से अधिक घरों में अनाज की कमी के बारे में भी चेतावनी दी गई है. जिसमें कहा गया है कि इन परिवारों के पास पिछली फसल का बचा अनाज केवल मई के अंत तक ही चल पायेगा. और एक तिहाई परिवारों के पास खरीफ फसल के बीज खरीदने तक के लिए प्रयाप्त पैसे नहीं हैं.

SWAN (स्ट्रैंड्ड वर्कर्स एक्शन नेटवर्क) अलग अलग राज्यों में फसे मज़दूरों का एक संगठन है. इस संगठन के द्वारा मई के पहले सप्ताह में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 50 प्रतिशत फंसे हुए प्रवासी मजदूरों के पास 100 रुपये से कम है और 97% को सरकार द्वारा भेजे बैंक अकाउंट में नगद लाभ नहीं मिला है.

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रिपोर्ट में कहा गया है कि SWAN के पास 17,000 कर्मचारी पहुंचे, लेकिन केवल 6 प्रतिशत को ही उनकी पूरी मजदूरी का भुगतान किया गया है. जबकि 99 प्रतिशत से अधिक का अपना निजी काम होने की वजह से आमदनी एकदम शून्य तक आ गयी है. इन कर्मचारियों में चित्रकार, वेल्डर और इलेक्ट्रीशियन शामिल हैं.