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Gulabo Sitabo Review: अमिताभ से ज्यादा नजर आई उनकी नाक!

Gulabo Sitabo Review: Amitabh Bachchan Ayushmann Khurrana Vijay Raaz
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Gulabo Sitabo Review: बड़े सितारों से सजी फिल्म का सिनेमाहाल की जगह अमेजन प्राइम वीडियो पर रिलीज होने से लेकर कहानी की बुनावट तक, ‘गुलाबो सिताबो’ अनूठेपन का फुल डोज है। यह फिल्म आपको पुराने लखनऊ की नब्ज पकड़ा देगी और याद रह जाएगी मिर्जा चुन्नन नवाब की लंबी नाक जो अटपटी लगती है लेकिन उतनी ही आकर्षक भी है

Priyanshu | New Delhi

कहानी के केंद्र में है मिर्जा (अमिताभ बच्चन) की अपनी खंडहर हवेली ‘फतिमा महल’ से सनकपन की हद तक मोहब्बत और वहां डेरा जमाए सबसे अड़ियल किरायेदार बांके रस्तोगी (आयुष्मान खुराना) की उसे न खाली करने की जिद। महीने के महज 70 से 30 रुपए तक की किराया देने वालों को भगाने के लिए मिर्जा उनके बल्ब चोरी कर लेता है, साइकिल की घंटियां बेच आता है लेकिन विवाद हमेशा बकबक-झकझक पर आकर खत्म हो जाता है।

क्या करोगे हवेली का मिर्जा
खुद कब्र में पैर लटकाए मिर्जा को इंतजार है कब उनकी बेगम इंतकाल करें, कब हवेली उनके नाम हो लेकिन अंत में सारी दौड़-भाग बेकार जाती है। मिर्जा को मिलता है फत्तो का एक खत जो पूरी कहानी को पलट देता है। फत्तो ‘फतिमा महल’ को एक रुपए में बेचकर निकल लेती है पर किसे और कहां, इसके लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।

लेकिन कहानी कमजोर
फिल्म जरूरत से ज्यादा खींच दी गई है। कहानी ताजा है लेकिन कमजोर है। पता नहीं, बड़े कलाकर न होते तो ‘गुलाबो सिताबो’ क्या इतनी चर्चा बटोर पाती? फिल्म पुराने दिनों की बात करती है लेकिन साल कौन सा है, इसे लेकर अटकी हुई दिखी। कहीं लिख देते तो ठीक था। साल की तरह कई और सवालों के भी जवाब नहीं मिले…फिल्म का नाम ‘गुलाबो सिताबो’ क्यों रखा…मिर्जा की नाक इतनी लंबी क्यों थी…और फत्तो की देखरेख करने वाली, नौकरानी थी या कौन।

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का हुआ दद्दा, घूर काहे रहे हो
अमिताभ बच्चन मिर्जा के किरदार में इतने रच-बस गए हैं कि वह खुद कहीं नहीं दिखते। दिखता है सिर्फ उनका बेजोड़ अभिनय, झुकी हुई कमर और उनकी नाक। बिना नाक वाले बांके (आयुष्मान खुराना) उन्हें बराबर की टक्कर देते दिखे लेकिन बाजी हाथ में आई बांके की बहन गुड्डू यानी सृष्टि श्रीवास्तव के। छोटे से किरदार ने वह अपने अभिनय से मिर्जा की नाक जितना ही ध्यान खींचती हैं। उनके डॉयलाग बोलने के अंदाज पर आंखें सहसा टिक जाती हैं जो हटाए नहीं हटती। एक जगह वह अपने छठी तक पढ़े बड़े भाई बांके को पुरातत्व विभाग वालों का काम समझा रही हैं।

“ऐसा है जैसे मोहनजोदाड़ो…हड़प्पा थे…वहां खुदाई हुई…समान निकला…जो भी गिलास-कटोरी-चम्मच निकला आर्किलोजी वाले धर लेते हैं…म्यूजियम में लगा देते हैं..वह जगह भी सरकार की हो जाती है..उसे संग्रहालय बना देते हैं…का हुआ दद्दा, घूर काहे रहे हो।”

बांके मासूमियत से जवाब देता है, “न तो हमारे घर में ऐसी कोई कटोरी-चम्मच है न तो मोहनजोदारो नखलऊ जिले में है। सोच रहे हैं…घूरेंगे काहे।”

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नवाबी ठाठ के बिकते अवशेष
गुलाबो-सिताबो पुराने लखनऊ की बारीक पड़ताल है। फिल्म अपने अंत में कभी लखनऊ में ठाठ से रहे कई नवाबों के वशंजों की दयनीय स्थित को मार्मिक ढंगे से उकेरती है। फत्तो मिर्जा की पसंदीदा कुर्सी छोड़ जाती है, जिसे मिर्जा ढाई सौ रुपए में बेच देता है। बाद में वही कुर्सी ऐतिहासिक चीजें सेल करने वाली एक शॉप में नजर आती है…1 लाख 35 हजार रुपए में बिकने को तैयार।

डायरेक्टरः शूजित सरकार
कलाकारः अमिताभ बच्चन, आयुष्मान खुराना, फारूक जफर, बिजेंद्र काला, विजय राज और सृष्टि श्रीवास्तव
समयावधि: 2 घण्टा, 4 मिनट
रेटिंगः 2.5/5 स्टार

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