इन बच्चों के चेहरे की चमक बयां करती है दिल्ली के सरकारी स्कूलों की बेहतरी की कहानी..

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न्यूज़ डेस्क । ग्राउंड रिपोर्ट

सरकारी स्कूल का नाम सुनकर जो दृश्य हमारे सामने उभरता है वो होता है खराब व्यवस्था, बदहाल क्लासरूम, नाम मात्र के शिक्षक, गिनती के बच्चे जो हिंदी तक ढंग से नहीं पढ़ पाते। शिक्षकों का सारा ज़ोर और पसीना मिड डे मील पर ही निकल जाता है।

Govt. school of Sehore, Madhya Pradesh

दिल्ली के सरकारी स्कूलों का प्रदर्शन प्राइवेट स्कूलों से भी बेहतर –
खराब रिज़ल्ट और उसके बाद भी बच्चों को अगली कक्षा में भेज देने की मजबूरी। देश के 80 फीसदी बच्चे इन्ही सरकारी स्कूलों में पढ़कर स्वर्णिम भविष्य का सपना देखते हैं। लेकिन ये हालात बदलने का जिम्मा उठाया दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने। सरकार ने अपना पूरा फोकस केवल शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था पर लगा दिया। जिसका असर दिखाई दिया 2018 के नतीजों में जब सरकारी स्कूलों का प्रदर्शन प्राइवेट स्कूलों से भी बेहतर हो गया।

देश की तरक्की की अहम ज़िम्मेदारी सरकारी स्कूलों पर –
देश की तरक्की की बुनियाद एक शिक्षित आबादी पर ही टिकी होती है। इस बुनियाद को मजबूत करने की अहम ज़िम्मेदारी हमारे सरकारी स्कूलों पर है। आज़ादी के 73 साल बाद भी हमारे सरकारी स्कूल मूल भूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। बदहाल अवस्था में स्कूलों के आवास हैं। बच्चों को बैठने के लिए फर्नीचर मुहैया नहीं है। बच्चों को क्लासरूम तक लाने में शिक्षकों का पसीना बह रहा है।

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टाट पट्टियों पर बैठा देश का भविष्य –
टाट पट्टियों पर बैठा देश का भविष्य शिक्षक के क्लासरूम में आने के इंतज़ार में ही समय बिता देता है। उसे खुद नहीं पता होता कि उसे अगली कक्षा में कैसे पास कर दिया गया। उसने क्या सीखा क्या जाना इसकी किसी को परवाह नहीं होती। कागज़ों पर चलने वाले स्कूल कागज़ी पत्थरों की नींव खड़ी करने में लगे हुए हैं।

दिल्ली में शिक्षा पर हो रहे प्रयास उम्मीद की एक किरण –
ऐसे में दिल्ली में हो रहे शिक्षा को लेकर प्रयास उम्मीद की एक किरण लेकर आते हैं। 2015 के बाद से दिल्ली के सरकारी स्कूलों का कायाकल्प हो गया। पहले जहां एक ही कमरे में कई कक्षा के बच्चे टाट पट्टी पर बैठ कर पढ़ा करते थे, अब उनके लिए प्राइवेट स्कूल से बेहतर क्लासरूम खड़े किए जा रहे हैं। बैठने के लिए बेहतर फर्नीचर मंगाए गए। जिन स्कूलों में ब्लैकबोर्ड कभी सफेद हो गए थे वहां प्रोजेक्टर से पढ़ाया जाने लगा है।

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महज़ 4 सालों में पेश की दुनियाभर में मिसाल
शिक्षा को मज़ेदार बनाने के लिए कई प्रयास किये जा रहे हैं। एयरकंडीशन लैब बनाई गई हैं जहाँ बच्चे प्रैक्टिकल कर चीज़ों को समझ रहे हैं। शिक्षकों को प्रोत्साहित करने के लिए नए नए प्रयोग करने को कहा जा रहा है। उन्हें शिक्षण के बेहतर गुण सीखने के लिए विदेश तक भेजा गया। यह कोई सपना नहीं हकीकत है। इस यह सब महज़ 4 सालों में किया गया।

Delhi Govt. School

सरकार का दृढ़ संकल्प-विज़न –
इसके पीछे है एक सरकार का दृढ़ संकल्प और एक साफ विज़न। अगर देश के दूसरे राज्य की सरकारें भी 5 साल केवल सरकारी स्कूलों को दे दें तो फिर भारत की तस्वीर वाकई बदल जाएगी।

प्राइवेट स्कूलों से बेहतर रिज़ल्ट

Govt.School Of Delhi

2018 में दिल्ली के सरकारी स्कूलों का 12वी कक्षा का रिजल्ट 90.68 प्रतिशत रहा वहीं प्राइवेट स्कूलों का रिजल्ट 88 फीसदी रहा।

Parents Teacher Meeting At Delhi Govt.School

21000 नए क्लासरूम बनाने का लक्ष्य –
दिल्ली सरकार 21000 नए क्लासरूम बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही जिसमें 13000 पहले ही बन कर तैयार हैं। आधुनिक क्लासरूम, लैब्स, प्लेग्राउंड और मल्टीपर्पस हॉल देखते ही बनते हैं। कई स्कूलों में लिफ्ट, स्वीमिंग पूल जैसी सुविधाएं भी हैं।

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Classroom of Govt. school Delhi

दिल्ली के सरकारी स्कूलों के कायाकल्प के पीछे शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का विज़न है जिसमें उनका साथ आतिशी मार्लेन बखूबी निभा रही हैं।

Atishi Marlena at Govt. school

हैप्पीनेस क्लास और पेरेंट्स मीटिंग जैसी गतिविधियों से बच्चों के माता पिता भी खुश हैं। बच्चों को अब स्कूल आना बोझ नहीं लगता।

Manish sisodiya Education Minister of Delhi at govt. school

मध्य प्रदेश के एक सरकारी स्कूल की ताज़ा तस्वीर –
ये है मध्यप्रदेश के सीहोर शहर में स्थित सरकारी स्कूल जहां बच्चों के पास ज़रूरी सुविधाएं नहीं है। बाढ़ आ जाने के बाद यहां बच्चों से सफाई करवाई गई।

Govt. school of Sehore Madhya Pradesh

बदहाल अवस्था में ये सरकारी स्कूल दिल्ली के सरकारी स्कूलों से बहुत पीछे हैं। देश के तमाम राज्यों की सरकारों को दिल्ली से सीखना होगा कि अगर इच्छा शक्ति हो तो कुछ भी मुमकिन है। सरकारी स्कूलों की बदहाली के आगे बाकी राज्य बेबस क्यों दिखाई देते हैं? यह बड़ा सवाल है।