गोपालदास नीरज

पुण्यतिथि विशेष : बुझते दीपों को ज़रा सूर्य बना लूँ तो चलूँ…

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गोपालदास नीरज एक ऐसा नाम है जो बीसवीं सदी से इक्कीसवीं सदी तक जनमानस पर छाया हुआ है। इनके द्वारा रचित गीतों ने वह ऊर्जा प्रवाहित की है कि मनुष्य जीवन से जुड़कर, यथार्थ को पहचानता हुआ, हर स्थिति में अपनी राहों का निर्माण कर लेता है।

बात 70 के दशक की है, जब साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, कैफी आज़मी, निदा फाज़ली जैसे नामों का दबदबा हुआ करता था। तब उस समय कवि सम्मेलनों को ज़िंदा रखने के साथ ही फिल्मी गीतों के जरिए लोगों के दिलों में उतरे वाले गोपालदास नीरज ही थे ।

1960 के दशक में रेडियो पर पहली बार कारवां गुजर गया… गीत प्रसारित हुआ। इस गीत ने गोपालदास नीरज के लिए रातोंरात प्रसिद्धि का नया आसमान तैयार किया। इसके बाद ही उनका फिल्मी गीतों का सफर शुरू हुआ। 1960 में ही उन्होंने फिल्म नई उमर की नई फसल में गीत लिखा, नई उमर की नई फसल का क्या होगा? इसके बाद तो उनके चाहने वालों का कारवां बढ़ता चला गया।

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अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए, जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए…, नीरज के गीतों, गजलों और कविताओं में न सिर्फ प्यार और भाईचारे की सोच थी, बल्कि समाज को आईना दिखाती तस्वीर भी छिपी रहती थी। पद्मभूषण से सम्मानित साहित्यकार गीतकार, लेखक कवि गोपाल दास नीरज भले ही दूर चले गए हैं पर वो अपने पीछे अपनी अनमोल यादों को छोड़ गए हैं।

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।

जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।

जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर

फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए।

आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी

कोई बतलाए कहाँ जाके नहाया जाए।

प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए

हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए।

मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा

मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।

जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे

मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाए।

गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी

ऐसे माहौल में ‘नीरज’ को बुलाया जाए।

कहा जाता है कि हरिवंश राय बच्चन के बाद युवा पीढ़ी पर अगर दूसरे किसी कवि ने राज किया, तो वो थे गोपालदास ‘नीरज’! उनका नाम गोपालदास सक्सेना था और ‘नीरज’ उनका उपनाम। उनका जन्म 4 जनवरी, 1925 को उत्तरप्रदेश में इटावा के ‘पुरावली’ गाँव में एक साधारण कायस्थ-परिवार में हुआ था। बहुत कम उम्र में ही पिता का साया सिर से उठ गया, तो उन्हें एटा जाकर अपनी बुआ के यहाँ निर्वाह करना पड़ा।

गोपालदास नीरज कवि नहीं, चलता-फिरता महाकाव्य कहा जाए तो गलत नहीं होगा। उम्र के 93 बरसों में उन्होंने अपनी लेखनी से साहित्यजगत, फिल्मजगत और काव्यमंचों पर एक अलग मिसाल बनाई।

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ज़िंदगी में बचपन से ही चुनौतियों की कोई कमी नहीं रही। साल 1942 में जैसे-तैसे हाई स्कूल पास किया और फिर दिल्ली जाकर एक जगह टाइपिस्ट की नौकरी करने लगे। पर पढ़ाई के प्रति उनकी लगन कभी भी कम ना हुई। इसीलिए उन्होंने चाहे दिल्ली में कोई नौकरी की या फिर बाद में कानपुर आकर, साथ में उनकी पढ़ाई भी जारी रही। ये उनका जुनून ही था कि साल 1953 तक उन्होंने अपना एम. ए पूरा कर लिया।

उनके काव्य लेखन के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने हाई स्कूल के दिनों में ही लिखना शुरू किया था। वहाँ किसी लड़की से उनका प्रणय-संबंध जुड़ गया। पर वह रिश्ता ज्यादा चला नहीं और वह लड़की उनसे दूर हो गयी।

हालांकि, अपने लेखन के बारे में गोपालदास नीरज ने एक बार कहा,

“मैंने कविता लिखना किससे सीखा, यह तो मुझे याद नहीं। कब लिखना आरम्भ किया, शायद यह भी नहीं मालूम। हाँ इतना ज़रूर, याद है कि गर्मी के दिन थे, स्कूल की छुटियाँ हो चुकी थीं, शायद मई का या जून का महीना था। मेरे एक मित्र मेरे घर आए। उनके हाथ में ‘निशा निमंत्रण’ पुस्तक की एक प्रति थी। मैंने लेकर उसे खोला। उसके पहले गीत ने ही मुझे प्रभावित किया और पढ़ने के लिए उनसे उसे मांग लिया। मुझे उसके पढ़ने में बहुत आनन्द आया और उस दिन ही मैंने उसे दो-तीन बार पढ़ा। उसे पढ़कर मुझे भी कुछ लिखने की सनक सवार हुई….”

गोपालदास नीरज साहित्य के आसमान के ऐसे सितारे हैं जिनसे गीतों की रौशनी बहती है। नीरज और उनका काव्य भी उसी अधिकार के साथ साहित्यांबर में यात्रा करते हैं। इसीलिए लोग उन्हें गीत-ऋषि कहते हैं। यूं तो नीरज को गुजरे एक साल बीत चुका है लेकिन कवि की दैहिक यात्रा ही समाप्त हो सकती है। उनकी कलम से निकले शब्द तो अनंत काल तक लोक में भ्रमण करते हुए लोगों को तृप्त करते हैं। सरल शब्दों में अपनी बात को किसी पानी की धार की तरह छोड़ देना नीरज बखूबी जानते हैं।

पढ़ें उनकी सबसे मशहूर कविता

कारवाँ गुज़र गया ग़ुबार देखते रहे
स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई
चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा
क्या जमाल था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ़ जमीन और आसमाँ उधर उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा

एक दिन मगर यहाँ ऐसी कुछ हवा चली
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली
और हम लुटे-लुटे वक्त से पिटे-पिटे
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे

हिंदी साहित्य में उनके योगदान के लिए समय-समय पर उन्हें कई सम्मानों से नवाज़ा गया। वे पहले कवि हैं जिन्हें भारत सरकार ने शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में दो बार सम्मानित किया। साल 1991 में उन्हें ‘पद्मश्री’ मिला तो साल 2007 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ से नवाज़ा गया। उन्हें ‘यश भारती’ और ‘विश्व उर्दू परिषद् पुरस्कार’ भी मिला।

संघर्ष से सफलता के अपने इस सफर में वो हर क़दम सक्रिय और रचनात्मक रहे। वो बीमारियों से भी जूझते रहे, फिर 19 जुलाई 2018 को स्वर्ग में गीत-कविताएं सुनाने के लिए चले गए।

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