किसी प्रकार के विशेष अधिकारों का तो सवाल ही नहीं है उन्हें नागरिकों के अधिकार भी प्राप्त नहीं होने चाहिए : गोलवलकर

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विचार। नेहाल रिज़वी

गोलवलकर द्वारा 1939 में छपवाई गई किताब ‘वी ऑर अवर नेशनहुड डिफ़ाइंड’ में जर्मनी के तानाशाह हिटलर द्वारा प्रतिपादित नाज़ी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को महिमामंडित किया गया है। साथ ही इस देश के अल्पसंख्यकों के बारे में जो योजना बतायी गयी है, वह इस देश का विखण्डन चाह रहे किसी भी संगठन को बहुत ही प्रिय लगेगी।

गोलवलकर  के मुताबिक़ मुसलमान किसी भी सुविधा के हक़दार नहीं हैं

अपने मस्तिष्क में इस बात को बिठाना ज़रूरी है कि कैसे प्राचीन राष्ट्रों ने अपनी अल्पसंख्यक समस्या का निपटारा किया । वे अपने राज्य में किसी भी भिन्न त्तव को स्वीकारने के लिय तैयार नहीं रहे। प्रवासियों ( इससे गोलवलकर का तात्पर्य मुसलमान और ईसाई हैं) को प्राकृतिक तौर पर जनसंख्या के मुख्य भाग को अर्थात राष्ट्रीय नस्ल में अपने आपको मिलाना होता है, उनकी संस्कृति, भाषा और महात्वाकांक्षा को स्वीकारते हुए, अपने अलग अस्तित्व की हर भावना को त्यागते हुए अपने विदेशी मूल के होने को भूलते हुए। अगर वे ऐसा नहीं करते तो वे केवल विदेशियों की तरह रह सकते हैं, राष्ट्र के तमाम बंधनों और नियमों से बंधे हुए, राष्ट्र को सहन करते हुए, किसी भी विशेष सुरक्षा के ही नहीं बल्कि किसी भी अधिकार, सुविधा के हक़दार न होकर।

ऐसे विदेशी तत्वों के लिय सिर्फ़ दो रास्ते ख़ुले हैं। या तो राष्ट्रीय नस्ल पूरी तरह से घुल मिल जाएं, इसकी सस्कृति को स्वीकार लें, या राष्ट्रीय नस्ल के रहमोंकरम पर देश में रहें जब तक राष्ट्रीय नस्ल इजाज़त देती है और अगर राष्ट्रीय नस्ल की इच्छा हो तो देश छोड़कर चले जाएं। यही एक मात्र तार्किक और उचित समाधान है। केवल इसी तरह राष्ट्रीय जीवन स्वस्थ और बिना परेशानी के चल सकता है। केवल ऐसा करके राष्ट्र की राजनीति में कैंसर की तरह पनप रहे एक राज्य के भीतर दूसरे राज्य के पैदा होने वाले ख़तरे से बचा जा सकता है।

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गोलवलकर  के अनुसार मुसलमान नागरिक ख़तरा नम्बर 1 हैं

स्वतंत्रता के बाद गुरू गोलवलकर  ने अपने लेख ‘आंतरिक संकट’ में राष्ट्र के तीन दुश्मन गिनवाए जिनमें पहला मुसलमान, दूसरा ईसाइ और तीसरा कम्युनिस्ट।

पुराने समझदार देशों के अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हिंदुस्तान में ग़ैर हिंदू जनता को या तो हिंदू संस्कृति और भाषा अपना लेनी चाहिए, हिंदू धर्म का आदर औऱ सम्मान करना सीखना चाहिए तथा हिंदू नस्ल और संस्कृति अर्थात हिंदू राष्ट्र का गुणगान करने के अवाला और कुछ नहीं करना चाहिए। उन्हें अपना अलग अस्तित्व समाप्त तक देना चाहिए ताकि वे हिंदू नस्ल  में विलीन हो जाएं। अन्यथा वे देश में तभी रह सकते हैं जब वे पूरे तौर पर हिंदू राष्ट्र के मातहत रहें, बिना किसी दावे के, किसी भी प्रकार के विषेष अधिकारों के हक़दार बने बिना। तरजीही बर्ताव का तो सवाल ही नहीं है उन्हें नागरिकों के अधिकार भी प्राप्त नहीं होंगे।

मुसलमानों के बारे में अपने फ़ासीवादी विचार प्रकट करते हुए गोलवलकर  ने लिखा कि :

संसार में अनेकों देशों के इतिहास का यह दुखद सबक रहा है कि राष्ट्र की सुरक्षा को बाहरी आक्रंताओं की अपेक्षा आंतरिक विरोधी तत्व अधिक बड़ा संकट उपस्थित करते है। दुर्भाग्यवश, जब से अंग्रेज़ों ने इस देश को छोड़ों, हमारे देश में राष्ट्र की सुरक्षा का यह प्रथम पाठ सतत अपेक्षित रहा है।आजतक यह कहने वाले लोग मौजूद हैं कि अब मुस्लमान समस्या बिल्कुल नहीं रही है। पाकिस्तान को प्रश्न देने वाले वह सब दंगाई तत्व सदा के लिय चले गए हैं। शेष मुसलमान हमारे देश के भक्त हैं। इस प्रकार के विश्वास के धोखे में रहना आत्मघाती होगा। इसके विपरीत पाकिसतान के निर्माण ही हमारे देश पर भावी आक्रमण की योजनाओं के आधार के रूप में हुआ है।

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गोलवलकर  का निष्कर्ष यह था कि :

हर स्थान में ऐसे मुसलमान हैं जो ट्रांसमीटर के द्वारा पाकिसतान से सतत सम्पर्क स्थापित किए हैं और अल्पसंख्यक होने के नाते, सामान्य नागरिक के ही नहीं अपितु कुछ विशेष अधिकारों तथा विषेष अनुग्रहों का भी उपयोग करते हैं। कम से कम अब हम जागें, चारों ओर देखें, और बड़े-बड़े प्रमुख मुसलमानों के भी शब्द तथा कृतियों के सही तात्पर्य को समझें उनके अपने ही वक्त्वयों ने आज तथाकथित राष्ट्रीय मुसलमानों के महानतम व्यकतियों को भी उनके सच्चे नग्न रूप में प्रकट कर दिया है। आज भी मुसलमान चाहे वह सरकारी उच्च पदों पर हों अथवा उसके भाषणों में भी ख़ुला विद्रोह की झंकार रहती है।

आज़ाद भारत में जो व्यक्ति या संगठन देश के नागरिकों के बारे में इस तरह का ज़हर उगलता है वो केवल देश को तोड़ने की ही मदद क रहा होता है। आरएसएस मुसलमानों और ईसाइयों को तो विदेशी मानता है, लेकिन सिख, बौद्ध, जैन जैसे धर्मों के रूप में ही नहीं स्वीकरता। आरएसएस के अनुसार यह स्थानीय धर्म अलग धर्म न होकर हिंदू धर्म का ही हिस्सा हैं।

लेखक के निजी विचार…