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अपनी ही लड़ाई को तरसता मीडिया

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विचार,कार्तिक सागर समाधिया

हमने सुना था हमारा जन्म लोकतंत्र में हुआ है। दरअसल हम कभी आजाद ही नहीं हुए। कभी अशिक्षित होने की वजह से चुप रहे, कभी जाति के बंधन ने बांध लिया। थोड़े पढ़े लिखे तो धर्म के लिए दो – दो हाथ करते सड़क पर नंगे नजर आए। जब सत्ता की बेदखली ने कानून अपने ढंग से मोड़ा तो इंडियन एक्सप्रेस के दफ्तर से लेकर सभी जुबानी जज्बों को कलम करने लगे। आज वक़्त बदल गया। सरकार ने हर कानून अपने हिसाब से अपने लिए बना लिया है। कोई कितना ही सत्ता की नाकामियों से लड़ता रहे लेकिन आखिर में सत्ता जीत रही है। मसला यह नहीं है कि चौथा खम्बा बिकाऊ हो गया है। दरअसल चौथा खम्बा इतनी लंबन्दियों का शिकार हो गया।

मौजूदा सरकार के कार्यकाल में हो रही कुछ घटनाओं का जिक्र छेड़ा जाए तो कहीं न कहीं उसकी पूर्ण झलक हमें इमरजेंसी के दौर में मीडिया से की गई ज्यादती की याद दिलाती है। अगर हम चुप हैं तो उसके भी कई कारण हैं। हम न बोल पा रहे हैं और न ही किसी से इसकी उम्मीद कर सकते हैं। आंदोलन छिड़ा तो सड़क पर कई नौजवान थे। जो अपनी पढ़ाई छोड़ कर भारत का लोकतंत्र बचाने निकले। कई वरिष्ठ नेता उसी इमेरजेंसी के दौर से निकले जिनकी गठित संघटनात्मक राजनीतिक पार्टी अब लोकतंत्र की हत्या करने पर उतारू है।

मीडिया के दो नामी चैनल इस बात के सबूत हैं कि अगर सरकार खिलाफ बोलोगे तो तुम्हें आर्थिक रूप से इतना पंगु कर देंगे कि फिर तुम लिखने के रहोगे न बोलने के…. याद करिए एनडीटीवी का ब्लैकआऊट गनीमत है इस संस्था का मैनेजमेंट इतना बिकाऊ नहीं जो अपने वरिष्ठ पत्रकार से दुर्व्यवहार करे। कहते हैं रविश कुमार चैनल और संस्था की तरफ से सहयोग है कि वो न चाहकर भी एक निजी चैनल के कार्यक्रम में कह गए कि आज चैनल चलाना मुश्किल है। पुण्यप्रसुन वाजपेयी सरकार की नाकामियों के खिलाफ बगावत छेड़ने वाला पत्रकार। जिसे सरकार के नुमाइंदे बर्दाश्त नहीं कर पाए तो उसकी रोजी रोटी छीन ली। पहले आजतक से बेदखल किया गया तो दूसरा एबीपी। यह दोनों चैनल राष्ट्रीय हैं। आप माने न माने लेकिन ये दौर वहीं घूमकर आ गया जहाँ कभी इंदिरा के कदमों में पढ़ा हुआ कांप रहा था। आज इंदिरा नहीं है। आज मोदी है। आजादी की लड़ाई में शरीक मीडिया आज अपनी लड़ाई के लिए तरस रहा है।

यह तो नहीं पता कि मीडिया फिर उठ खड़ा होगा। लेकिन यह पता है अगर लोकतंत्र का यही तबका खामोश रहा तो मीडिया से भरोसा उठ जाएगा जो कि हर सत्ताधीश चाहता है।
पलकों पर बिठाओ सर आंखों पर जगह दो,
इन सत्ता नशीं को गर्दन चाक न करने दो…

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