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वनवासी महिलाओं को मुख्यधारा से जोड़ने की ज़रूरत

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Ground Report | News Desk | महिलाओं के जीवन और उनके अधिकारों के संबंध में आज भी भारतीय समाज दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ जहां उसके बिना समाज का अस्तित्व मुमकिन नहीं माना जाता है वहीं दूसरी ओर उसे उसके सभी अधिकारों से भी वंचित रखने का प्रयास किया जाता है। हालांकि पितृसत्तात्मक समाज की बहुलता होने के बावजूद देश के ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां समाज के संचालन की ज़िम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर होती है। विशेषकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में महिलाओं की सबसे बड़ी भूमिका देखने को मिलती है। जो परिवार को बढ़ाने से लेकर समाज से जुड़े सभी फ़ैसलों में महत्वपूर्ण किरदार अदा करती हैं।

पर्वतों की शान कहे जाने वाले हिमालय पर्वत की तरह पहाड़ी महिलाएं भी यहां की शान हैं। समाज के विकास में इनका भी अमूल्य योगदान है। घर से लेकर बाहर तक सभी क्षेत्रों में इनकी भूमिका प्रभावी होती है। स्कूली शिक्षा नगण्य होने के बावजूद पारिवारिक ज़िम्मेदारियों को बखूबी निभाती हैं। बच्चों की परवरिश से लेकर खेत-खलियानों तक की ज़िम्मेदारी इन्हीं महिलाओं की होती है। लेकिन इसके बावजूद इन महिलाओं को समाज में आजतक बराबरी का हक़ नहीं मिला है। जबकि सबसे अधिक इन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की ज़रूरत है। इन्हें शिक्षित करने और रोज़गार से जोड़ने की आवश्यकता है। विशेषकर राज्य की पिछड़ी और आदिवासी समुदाय की महिलाओं को सशक्त बनाना अहम है।

2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड की कुल जनसंख्या में 51 प्रतिशत पुरूष और 49 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी है। सुखद बात यह है कि इस राज्य में महिलाओं की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। देश में जहां महिला साक्षरता की दर लगभग 66% है वहीं उत्तराखंड में लगभग 70% है, जो शिक्षा के प्रति महिलाओं के जज़्बे और जुनून को दर्शाता है। हालांकि इसके बावजूद राज्य की केवल 30% महिलाएं ही नौकरी के माध्यम से अपने सपनों को पूरा कर पाने में सक्षम हैं। यानि आधे से ज़्यादा राज्य की आधी आबादी को अपने अस्तित्व की जंग लड़नी पड़ रही है।

वर्ष 2008 में सामाजिक कार्यकर्ता धीरज कुमार जोशी द्वारा उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ जनपद में डीडीहाट, कनालीछीना एवं धारचूला विकासखंड के सुदूरवर्ती एवं दुर्गम ग्रामों में एक महत्वपूर्ण सर्वे किया गया था। सर्वे के अनुसार राज्य के अनुसूचित जनजातियों में एक वनवासी जिन्हें रजवार, वनराजि आदि नामों से भी जाना जाता है, यह जनजाति हिमालयी क्षेत्र की सबसे छोटी जनजाति समूह है। जिनकी आबादी उस समय मात्र 135 परिवार थी। इस समुदाय की आजीविका मुख्यतः वन संसाधन और स्थानान्तरित खेती रही है। यह जनजाति मुख्य धारा से कोसों दूर होने व आजीविका आधारित संसाधनों की कमी और कठिनाई पूर्ण जीवनयापन के कारण इनकी संख्या में निरंतर कमी देखने को मिल रही थी। यह समुदाय आम समाज से सीमित मेलजोल रखता था। आधुनिक जीवन से बिल्कुल अलग यह लोग पहाड़ों की कंदराओं में ज़िंदगी गुज़ार रहे थे। हालांकि शांत प्रवृति होने के कारण इन्होंने सामान्य लोगों को कभी नुकसान नहीं पहुंचाया, परंतु उनसे किसी प्रकार का संबंध भी नहीं रखते थे।

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वर्ष 2011 में राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के वित्तीय सहयोग व सेंट्रल हिमालयन इन्वायरमेन्ट एसोसियेशन (चिया) के प्रयास से मुझे और मेरी टीम को इन्हीं वनराजि परिवारों के साथ काम करने का मौका मिला। आलम ऐसा था कि शुरू के दिनों में इन वनराजि परिवारों के मुखिया के साथ बैठकों के आयोजन करने पर दो-चार लोगों का मिलना भी बहुत मुश्किल हो पा रहा था। दरअसल यह वनराजि मुख्य सड़क से 10-12 किमी दूर घने जंगलों में रहा करते थे। मोटर गाड़ियों की आवाज़ सुनकर ही ये लोग जंगलों में भाग जाया करते थे। कई हफ़्तों तक लगातार इनसे संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया जाता रहा। लेकिन शांत और अंतर्मुखी स्वभाव होने के कारण इन्हें हमसे बात करने में भी झिझक महसूस होती थी। धीरे धीरे हमारी टीम ने इस समुदाय की महिलाओं से बातचीत करनी शुरू की। लेकिन हमने पाया कि 18-19 साल की लड़कियों जो खुद बच्ची थी, उनके स्वयं के बच्चे थे। अधिकांश महिलाएं एवं बच्चे कई प्रकार की बिमारियों से ग्रसित थे। पूछने पर पता चला कि महिलाएं स्थानीय बाजारों तक नहीं जाती हैं। वह घर के कार्यो तक ही सीमित रहती हैं। हमारी टीम के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती इस समुदाय की महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाना था। इसके लिए ग्राम स्तर पर डाक्टरों की टीम के साथ स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन किया गया। इसके साथ साथ इनमें स्वास्थ्य और उचित खानपान संबंधी जागरूकता अभियान भी चलाया गया। इसका बहुत सकारात्मक परिणाम देखने को मिला। बहुत जल्द यह समुदाय न केवल साफ सफाई पर ध्यान देने लगा बल्कि अपने बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण संबंधी इनमें जागरूकता भी इनमें आने लगी।

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ख़ास बात यह है कि पुरुषों की अपेक्षा इस समुदाय की महिलाओं ने आगे आकर न केवल हमारी टीम से बातचीत की बल्कि समुदाय में स्वास्थ्य की ख़राब स्थिति पर भी चिंतित दिखीं। वह अपने और अपने बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य और पौष्टिक भोजन संबंधी समस्याओं को भी दूर करना चाहती थीं। यही कारण है कि यह महिलाएं टीम के स्वास्थ्य कर्मियों के साथ लगातार सहयोग कर रही थी और इनके बताये सलाह पर लगातार अमल कर रही थीं। इन महिलाओं के उत्साह और सहयोगात्मक रवैये को देखते हुए टीम द्वारा उन्हें परियोजना गतिविधियों से जोड़ने की शुरुआत भी की गई। ताकि वह भी समाज की मुख्यघारा से जुड़ सकें। आज यह वनराजि महिलाएं न केवल आत्मनिर्भर हो रही हैं बल्कि अपनी बातों को बड़े अधिकारियों के सामने भी रखती हैं। जो हमारी टीम के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है।

स्वास्थ्य के साथ साथ इस समुदाय की रीति रिवाजों में भी बहुत बड़ा परिवर्तन देखने को मिला। पौराणिक प्रथा के अनुसार जब इनके परिवार का कोई सदस्य मर जाता था, तो यह लोग मृतक के शरीर को जलाते नहीं थे बल्कि मृत्यु उपरान्त उसी गुफा में शरीर को छोड़ देते थे और परिवार समेत किसी और गुफा में रहने चले जाते थे। जिसके बाद इन्हें भारतीय रीति रिवाज़ों के प्रति जागरूक किया गया। जिसके पश्चात् जो परिवर्तन सामने आया वह यह कि अब इस समुदाय के अधिकांश परिवार घर बनाकर रह रहे हैं। परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु के पश्चात् घरों को छोड़ा नहीं जाता बल्कि मृत शरीर को जलाया जाने लगा है। यह समुदाय आधुनिकता से कितनी दूर है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है जब 2013 में इसके किसी सदस्य ने पहली बार रेलगाड़ी का सफर किया था। मदनपुरी गांव के राजी परिवार की 62 वर्षीय कलावती देवी बताती हैं उम्र के इस आखिरी पड़ाव में उन्होंने जाना कि ट्रेन क्या है, जब स्थानीय संस्था द्वारा उत्तराखंड से गुजरात के दाहोद तक का सफर करने का अवसर प्राप्त हुआ। सोचिए, इस देश में एक ऐसा भी वर्ग है, जिसके लोगों ने 2013 में पहली बार रेलगाड़ी देखा है। ऐसा समुदाय आधुनिक और विकसित भारत से कितने वर्ष पीछे होगा?

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शिक्षा के मामले में भी वनराजि समुदाय लगभग शून्य हैं। जो इनके अस्तित्व के लिए ज्वलंत विषय है। हालांकि अब वनराजि परिवारों में सुधार देखने को मिला। यह अब अपने स्वास्थ्य के प्रति काफी जागरूक हो चुके हैं। यही कारण है कि अब इनके परिवारों की संख्या बढ़कर 225 हो गई है। यानि जन्म की अपेक्षा मृत्यु दर में तेज़ी से कमी आई है। जो सकारात्मक सोच की ओर इशारा करती है। लेकिन अब भी मुख्य समस्या इनका भविष्य है। जिस पर सरकार को कोई ठोस योजना बनाने और उसे धरातल पर मूर्त रूप देने की आवश्यकता है। इसके लिए ज़रूरी है इस समुदाय की महिलाओं को जोड़ना। जो इस समाज के विकास की सबसे मज़बूत कड़ी भी हैं। इन्हें मुख्यधारा से जोड़े बिना इस समुदाय का विकास अधूरा है।
(यह आलेख संजॉय घोष मीडिया अवार्ड 2019 के अंतर्गत लिखा गया है)

नरेन्द्र सिंह बिष्ट | नैनीताल, उत्तराखंड

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