Mon. Oct 14th, 2019

जलवायु परिवर्तन: जहां कभी उगाते थे कपास वहां धान बोवने को मजबूर किसान

जो इलाके कभी सूखे की मार झेलते थे वहां खूब बारिश हो रही है। और जहां अच्छी बारिश होती थी वहां सूखे जैसे हालात पैदा हो रहे हैं। असमय और असमान बारिश के संकट से किसान जूझ रहा है। लेकिन ऐसी स्थित में उन्हे राह दिखाने वाला कोई नहीं है।

किसान डेस्क।। जलवायु परिवर्तन का असर अब व्यापक रुप से दिखने लगा है। मौसम चक्र में परिवर्तन से किसानों को भी पुराने समय से चले आ रहे तौर तरीकों में बदलाव करना पड़ रहा है। पहले देश में मॉनसून जून के मध्य तक दस्तक दे देता था और किसान बोवनी कर देता था, लेकिन अब जुलाई के मध्य में किसान को गरमी की मार झेलनी पड़ रही है। जो इलाके कभी सूखे की मार झेलते थे वहां खूब बारिश हो रही है। और जहां अच्छी बारिश होती थी वहां सूखे जैसे हालात पैदा हो रहे हैं। असमय और असमान बारिश के संकट से किसान जूझ रहा है। लेकिन ऐसी स्थित में उन्हे राह दिखाने वाला कोई नहीं है।

पंजाब के मुक्तसर में कपास की जगह धान बो रहे किसान

पंजाब के मुक्तसर और आसपास के जिलों में खरीफ के सीज़न में कपास की बोवनी की जाती थी, यह इलाका कपास की अच्छी पैदावार के लिए जाना जाता था। लेकिन 2009 में आई बाढ़ ने इस क्षेत्र की ज़मीन की तासीर ही बदल कर रख दी। तीन चार दिन लगातार हुई बारिश से खेतों में 4 से 5 फीट पानी भर गया जिसकी निकासी में करीब महीने भर का समय लगा। इस जलभराव से खेतों को इतना नुकसान हुआ के वे 2010 में कोई भी फसल उगाने योग्य नहीं बचे। बाद में किसानों ने नुकसान से बचने के लिए धान की खेती शुरु कर दी क्योंकि धान की फसल ऐसे जलभराव में टिक सकती है। अब जिले के 75 फीसदी खेतों में कपास की जगह धान की खेती की जा रही है।

किसान की आय दोगुनी कैसे होगी?

जलवायु परिवर्तन का असर केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में देखा जा रहा है। तापमान में बढ़ोतरी और असमान बारिश से पूरा विश्व चिंतित है। भारत में असमान बारिश की वजह से किसान को खरीफ और रबी दोनों ही सीज़न मे आर्थिक नुकसान उठाना पढ़ रहा है। किसान की कमाई खरीफ के सीज़न में 13.7 प्रतिशत और रबी में 5.5 प्रतिशत की दर से गिरी है। यह गिरावट सरकार के किसान की आय दुगनी करने की उम्मीदों पर भी पानी फेर रही है। अगर सरकार किसान की आय दोगुनी करना चाहती है, तो उसे जलवायु परिवर्तन से हो रहे बदलाव के लिए किसान को तैयार करना होगा। ज़्यादा उन्नत बीज जो मौसम की मार झेल सकें और उन्नत तकनीक किसानों को मुहैया करानी होगी। फसलों की ऐसी किस्में तैयार करनी होगी जो ज़्यादा तापमान में भी फल-फूल सकें, जिनमें कीट और बीमारियों से लड़ने की क्षमता हो। किसानों को हर पल मौसम और बोवनी के सही समय की जानकारी उपलब्ध करवानी होगी।

कृषि में विकास के दावे खोखले

भारत में अब तक कृषि क्षेत्र में विकास के दावे खोखले ही साबित हुए हैं। पंजाब और हरियाणा को छोड़ दें तो देश के अधिकतर राज्य अभी भी सिंचाई के लिए बारिश पर ही निर्भर हैं। पंजाब का 97 फीसदी कृषि क्षेत्र सिंचित है तो वहीं मध्यप्रदेश का मात्र 40 फीसदी लेकिन दोनों ही राज्य अलग-अलग तरीके से जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे हैं।

मध्यप्रदेश में जलवायु परिवर्तन का असर

मध्यप्रदेश में खरीफ के सीज़न में 45 प्रतिशत कृषि क्षेत्र में सोयाबीन की खेती की जाती है। सोयाबीन की फसल 50-90 दिन में तैयार हो जाती है, इसी खासियत की वजह से सोयाबीन किसानों की प्रिय फसल बन गई और बदले में मुनाफा भी तगड़ा। लेकिन 2015 के बाद से राज्य में सोयाबीन की उपज में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। इसका एक कारण जलवायु परिवर्तन भी है। होशंगाबाद और रायसेन जैसे जिलों में पिछले कुछ वर्षों में सामान्य से अधिक वर्षा होने की वजह से जलभराव की स्थिति पैदा हो रही है, जो सोयाबीन की फसल के लिए अनुकूल नहीं है, ऐसे में किसानों को धान की खेती करनी पड़ रही है। किसानों को ऐसी स्थिति से निपटने के गुर सिखाने की कोशिश यहां सरकार कर रही है, लेकिन उनकी पहुंच अभी सीमित है।

कैसे निपटें इस समस्या से किसान..

हमने देखा की कैसे देश के दो राज्य एक जैसी समस्या से जूझ रहे हैं। पंजाब जहां का किसान सपन्न और तकनीक से लैस है और दूसरा कृषि कर्मण राज्य मध्यप्रदेश, जहां का किसान तकनीकि रुप से सपन्न नहीं है लेकिन पिछले कुछ सालों से कृषि के क्षेत्र में काफी तरक्की कर रहा है। जलवायू परिवर्तन एक नई समस्या है, जिससे आर्थिक रुप से कमज़ोर किसान को लड़ना होगा। उसे मौसम के मिजाज़ को समझकर खेती करनी होगी। सरकार जो किसान की आय दोगुनी करने के सपने दिखा रही है, उसे कर्ज़ माफी और न्यूनतम समर्थन मूल्य से आगे बढ़कर किसान को मज़बूत बनाना होगा। एक कार्ययोजना पर सरकार को काम करना होगा जिसका लक्ष्य किसान को आने वाली समस्याओं से निपटने के लिए तैयार करना हो, उन्नत बीज और तकनीक को किसान के दरवाज़े तक पहुंचाना होगा। ग्राम सेवक और कृषि सहायकों को तलब करना होगा की वे सरकारी योजनाओं को देश के दूर दराजों में बसे किसानों तक पहुंचाए। कर्ज़ा माफ करने से किसानों को फौरी राहत तो मिल जाती है, लेकिन उसका कोई दूरगामी असर नहीं होता। सरकार कर्ज़ माफ कर किसान हितेशी बन जाती हैं और मूल समस्या धरी की धरी रह जाती है। जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिेए किसान और सरकार दोनों को तैयार रहना होगा। वरना स्थिति बिगड़ने पर देश में खाद्यान्न संकट भी पैदा हो सकता है।

DATA SOURCE- INDIASPEND.COM

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