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Farmers Death: आंदोलन के 23 दिन, अब तक 20 किसानों की मौत

किसान आंदोलन में अब तक 20 किसानों की मौत
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कोरोना और कड़ाके की ठंड के बीच किसान पिछले 23 दिन से दिल्ली की सीमा पर केंद्र सरकार के कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं। इस आंदोलन में अब तक 20 किसानों की मौत (Farmers Death) हो चुकी है। लेकिन सरकार कृषि कानूनों को वापस लेने को तैयार नहीं है तो वहीं किसान भी अपनी मांग पर अड़े हुए हैं।

सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले की सुनवाई कर रहा है। जब तक इस मामले में का कोई हल नहीं निकलता तब तक किसान दिल्ली की सरहद पर डटे रहेंगे।

(Farmers Death) किसानों की मौत का कारण

  • 38 वर्षीय भीम सिंह की मौत सिंघू बॉर्डर पर ठंड की वजह से हो गई तो वहीं टिकरी बॉर्डर पर आंदोलन में शामिल हुए जय सिंह की हार्ट अटैक से गुरुवार को मौत हो गई।
  • एक और किसान कुलविंदर सिंह की मौत गुरुवार को ट्रैक्टर ट्रॉली से गिरने की वजह से हो गई। वो आंदोलन के लिए टिकरी बॉर्डर जा रहे थे।
  • बुधवार को करनाल के एक संत ने किसान आंदोलन के लिए खुद को कुर्बान कर दिया। अपने सुसाईड नोट में उन्होंने कहा कि वह किसानों के आंदोलन के लिए अपनी जान की आहुती दे रहे हैं।
  • दिसंबर 15 को पटियाला से आए दो किसान गुरप्रीत सिंह और लाभ सिंह की ट्रैक्टर ट्रॉली का हरियाणा के करनाल जिले में एक्सीडेंट हो गया जिसमें इन दो किसानों की मौत और 8 अन्य लोग घायल हो गए। ये लोग दिल्ली बॉर्डर से पटियाला लौट रहे थे।
  • ऐसी ही एक घटना में किसान दीप सिंह और सुखदेव सिंह की मौत हो गई। इनके ट्रैक्टर का भी एक्सीडेंट हो गया था।
  • उसी दिन 67 साल के गुरमीत सिंह की मौत हो गई। वो मोहाली से दिल्ली आई थे। सिंघू बॉर्डर पर बीमार पड़ने की वजह से उनकी मौत हुई। पंजाब के मोगा से आए एक और किसान मख्खन खान की मौत हार्ट अटैक से हो गई।
  • आंदोलन के शुरुवात में ही 57 साल के जनक राज जिंदा जल गए। वो जिस कार में सो रहे थे उसमें आग लग गई थी। जनक राज दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर किसानों के 6 ट्रैक्टर ठीक करने गए थे।
  • पटियाला से आई 62 वर्षीय पाला सिंह की मौत दिसंबर 16 को हार्ट अटैक से हो गई वो सिंघू बार्डर पर आंदोलन कर रहे थे।
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विश्लेषण: मरता किसान सोता प्रशासन

किसान पिछले 23 दिन से कड़ाके की ठंड में आंदोलन कर रहे हैं। दिल्ली में न्यूनतम पारा 5 डिग्री तक जा रहा है। कोरोना का डर अलग से। किसान और सरकार के बीच बातचीत बंद हो चुकी है। संसद का शीत कालीन सत्र बुलाने से सरकार ने मना कर दिया है। ऐसे में किसान आंदोलन को अंदेखा करने की कोशिश में सरकार लगी हुई ।

बातचीत करने की अपेक्षा सरकार अपने मुख्यमंत्रियों से नए कृषि कानून के फायदे गिनाने के लिए नुक्कड़ सभा करवा रही है। संसद में कोरोना का डर सता रहा है लेकिन देश में नेता रैलियां और चुनाव करवा रहे हैं। अगर संसद का सत्र होता तो शायद कृषि कानूनों पर फिर से बहस या चर्चा हो सकती थी। सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई कर रहा है लेकिन अगली सनवाई अब जनवरी में होगी, तब तक किसान ठंड में अपनी जान गंवाता रहेगा (Farmers Death) और प्रशासन अपने कमरों में हीटर लगा कर सोता रहेगा।

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