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क्या किसानों के कर्ज़ माफ़ी के बाद चरमरा जाएगी मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था?

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न्यूज़ डेस्क।। 2019 का सेमीफाईनल हो चुका है, कांग्रेस ने भाजपा के गढ़ जीत लिए हैं। इन चुनावों में जो वादा कांग्रेस ने किया
उसमें सबसे असरकारी साबित हुआ किसानों के कर्ज़ माफी का। राहुल गांधी नें चुनावी सभाओं में कहा कि सरकार बड़े-बड़े कॉरपोरेट्स के कर्ज़ माफ कर सकती है, तो फिर किसानों के क्यों नहीं। कांग्रेस की सरकार बनने के बाद दस दिन में अगर किसानों का कर्ज़ माफ नहीं किया तो, मैं मुख्यमंत्री बदल दूंगा। इस चुनावी वादे ने हाशिए पहुंची कांग्रेस को एक नहीं तीन-तीन राज्यों में जीत का स्वाद चखा दिया।

अब बारी है, इस वादे को पूरा करने की। लेकिन इस कर्ज़ माफी से राज्य के वित्तीय खज़ाने पर भारी बोझ पड़ना तय है। इधर रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर नें कहा कि कर्ज़ माफी को चुनावी वादा बनाने से रोका जाना चाहिए, क्योंकि इससे राज्यों की वित्तीय स्थिति चरमरा जाएगी और उनके पास आर्थिक निवेश के लिए पैसा नहीं बचेगा जिससे रोज़गार पैदा करनें में बाधा उत्पन्न होगी।

अब हम देखते हैं की राज्यों पर कर्ज़ माफी के बाद कितना बोझ पड़ने वाला है। मध्यप्रदेश में किसानों पर करीब 65000 करोड़ का कर्ज़ है। दो लाख से कम कर्ज़ वाले किसानों की संख्या भी अधिक है। वहीं सरकार का खज़ाना पहले ही खाली है। सरकार पौने दो लाख करोड़ के कर्ज़ में डूबी हुई है। ऐसे में नई सरकार कर्ज़ माफी के लिए पूंजी कहां से लाएगी? यह बड़ा सवाल है। कर्ज़ माफी की खबर के बाद से कई जगह पर कर्ज़ वसूली में कमी आने की खबरें आ रही हैं। कहा जा रहा है कि कांग्रेस नेता पी चिदंबरम कर्ज़ माफी का खाका तैयार कर रहे हैं।

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राहुल गांधी नें जीत के बाद हुई प्रेस कांफ्रेंस में यह कहा की कर्ज़ माफी केवल अस्थाई राहत है, कर्ज़ माफी कोई हल नहीं है, हमें और भी उपाय करनें होंगे, जिससे किसानों की समस्या को हल किया जा सके। गौरतलब है कि शिवराज सिंह चौहान ने चुनाव नज़दीक देखते हुए किसानों को बोनस बांटा था, अब कर्ज़ माफी के बाद मध्यप्रदेश के किसानों को थोड़े समय के लिए राहत मिल जाएगी। लेकिन जैसा की पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन नें चेताया है कि कर्ज़ माफी अगर चुनावी हथियार बन गया तो यह अर्थव्यवस्था के लिए घातक साबित हो जाएगा।

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राजनीतिक पार्टियों को किसानों की समस्या का स्थाई हल निकालना चाहिए, क्योंकि कर्ज़ माफी से सरकार की अन्य सामाजिक योजनाओं पर असर पड़ेगा। लेकिन ऐसा लगता है कि भाजपा और कांग्रेस में ऐसा कोई विद्वान नहीं है, जो इस समस्या का हल निकाल सके।