पुलिस पर कब-कब लगे फर्ज़ी एनकाउंटर के आरोप

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इसी घटनाक्रम में सबसे चर्चित एनकाउंटर पुलिस हत्याकांड के मुख्य अपराधी विकास दुबे का रहा। इस एनकाउंटर को फर्ज़ी और बदले की भावना से प्रेरित बताया गया। पुलिस ने जिस फिल्मी स्टाइल से कुख्यात अपराधी विकास दुबे का एनकाउंटर कर घटना की रिपोर्ट सामने रखी, उसको देखते हुए अधिकतर लोगों ने इस एनकाउंटर को फर्ज़ी बताया।

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यह कोई पहला मौक़ा नहीं है जब पुलिस पर फर्ज़ी एनकाउंटर करने के आरोप लगे हों। इससे पहले भी कई ऐसे बहुचर्चित मामले गुज़रे हैं, जब पुलिस द्वारा किए गए एनकाउंटर को फर्ज़ी होने का आरोप लगा। इससे पहले भी कई मामले सामने आए हैं, जिसमें पुलिसिया कार्रवाई सवालों के घेरे में रही हैं।आइए आपको पुलिस के उन बहुचर्चित एनकाउंटरों के बारे में बताते हैं, जिनपर फर्ज़ी होने के आरोप लगे और पुलिसिया कारर्वाई सवालों के घेरे में रही।

हैदराबाद एनकाउंटर मामला

गुज़रे बरस हैदराबाद के चर्चित रेप केस मामले के चारों अभियुक्तों को पुलिस ने एनकाउंटर कर मौत के घाट उतार दिया था। पुलिस की इस कार्रवाई की जमकर तारीफ की गई थी, तो दूसरी ओर लोगों ने इसे मानवाधिकार का उल्लंघन बताते हुए ग़लत एनकाउंटर क़रार दिया था। कुछ लोगों ने इस एनकाउंटर को फेक बताते हुए पुलिस का विरोध भी किया था । इस मामले के बाद पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ उठे सावालों को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मामले में संज्ञान लिया था ।

क्या भोपाल में फर्ज़ी एनकाउंटर हुआ था?

बात लगभग 4 बरस पुरानी है। 30 और 31 अक्टूबर 2016 की रात भोपाल की सेंट्रल जेल में बंद सिमी के 8 सदस्य एक जेल गार्ड की हत्या कर जेल से फरार हो गए थे। बाद में पुलिस ने जेल से करीब 8 किलोमीटर दूर मनीखेड़ी गांव में उन्हें घेर कर मार डाला था। इस एनकाउंटर के बाद पुलिस की कार्रवाई को लेकर अनेक सावाल उठे थे। घटना को लेकर राज्य सरकार पर ऊंगली उठी थी। लोगों ने इसे फर्ज़ी एनकाउंटर बताते हुए पुलिस पर अनेक आरोप लगाए थे।

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बाद में सदस्यीय जांच आयोग ने भोपाल एनकाउंटर को ‘उचित’ माना था। सरकार ने जबलपुर हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायधीश एस. के. पांडे की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच आयोग गठित किया था। आयोग ने 24 अगस्त 2017 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उस समय जो हालात बन गए थे, उनके हिसाब से पुलिस ने उचित कदम उठाया था। पुलिस का यह कदम कानून के दायरे में था।

छोटा राजन के सहयोगी लखन भैया का हुआ फर्ज़ी एनकाउंटर

ये बात करीब 14 साल पुरानी है। मुंबई के गैंगस्टर छोटा राजन का बेहद करीबी और कुख्यात अपराधी लखन को मुंबई पुलिस ने 11 नंवबर 2006 को एनकाउंटर में मार गिराया था।

लेकिन अपराधी लखन के एनकाउंटर के बाद लखन के भाई राम प्रसाद ने मीडिया के सामने आकर कहा कि पुलिस उनके भाई को जबरन उठा कर ले गई थी और बाद में उसे मुठभेड़ बता रही है। लखन के भाई राम प्रसाद ने घटना के बाद मीडिया के सामने इससे जुड़े तथ्य भी रखे, जो पुलिस की कार्रवाई को सावालों के घेरे में लेन के लिए उचित मालूम पड़ रहे थे।

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लंबी बहस के बाद राम प्रसाद ने अदालत का रुख किया। अदालत में मामला पहुचा, मामले की जांच हुई और लखन का एनकाउंटर फर्ज़ी पाया गया। साल 2013 में मामले में मुंबई की सेशन कोर्ट ने 21 लोगों को दोषी पाया और उम्र क़ैद की सजा सुनाई, जिनमें कई पुलिस वाले भी थे।

सोहराबुद्दीन शेख़ का फर्ज़ी एनकाउंटर हुआ

बात लगभग 14 बरस पुरानी है। ये अंडरवर्ल्ड वाला समय था। चर्चित एनकाउंटर सोहराबुद्दीन शेख़ की हत्या के बाद यह मामला बेहद सुर्खियों में रहा। उस समय मीडिया में बस यही चर्चा थी कि अंडरवर्ल्ड का अपराधी सोहराबुद्दीन शेख़ पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। मीडिया रिपोर्टों में सोहराबुद्दीन शेख़ को अंडरवर्ल्ड का अपराधी बताया गया था।

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सोहराब अपनी पत्नी कौसर बी के साथ हैदराबाद से महाराष्ट्र जा रहे थे। गुजरात पुलिस की एटीएस शाख़ा ने बस को बीच में रोका और दोनो को पकड़ कर ले गई। तीन दिन बाद ये ख़बर आई कि सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी को अहमदाबाद के बाहर मुठभेड़ में मार दिया गया है।

हत्या के बाद मामला चर्चा में आया और इस एनकाउंटर को फर्ज़ी क़रार दिया जाने लगा। मीडिया में इस मामले के उठने के बाद सीबीआई ने इसकी जांच की और एनकाउंटर को फर्ज़ी पाया। इस संबंध में कई पुलिस अफ़सरों को गिरफ़्तार किया गया।गुजरात सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफ़नामे में इस बात को स्वीकार किया था कि ये फ़र्ज़ी एनकाउंटर था।

तुलसीराम प्रजापति एनकाउंटर मामला

ये मामला भी सोहराबुद्दीन से जुड़ा हुआ था। 14 बरस पुराना। तुलसीराम प्रजापति सोहराबुद्दीन के सहयोगी थे और पुलिस ने इनको हिरासत में लेकर एनकाउंटर में मार दिया था। प्रजापति को 28 दिसंबर 2006 में हिरासत में लेकर मारा गया और बाद में दावा किया गया कि यह एनकाउंटर फ़र्जी था, जिसे गुजरात पुलिस ने अंजाम दिया।

सीबीआई की विशेष अदालत ने तुलसीराम प्रजापति का एनकाउंटर को सही था। अभियोजन पक्ष के अनुसार तुलसीराम प्रजापित को एक एनकाउंटर में 28 दिसंबर, 2006 को मारा गया था। इस मामले में गोली चलाने वाले पुलिस अधिकारी आशीष पांड्या ने कहा कि वे शुरू से ही कहते आ रहे थे कि उन्होंने सेल्फ डिफेंस में गोली चलाई थी।

चर्चित इशरत जहां का एनकाउंटर मामला

बात लगभग आज से 16 बरस पुरानी है। वो समय जब अंडरवर्ल्ड और बम ब्लास्ट खौफ हुआ करता था। 15 जून 2004 को गुजरात पुलिस ने इशरत जहां और उनके 3 साथियों को मुठभेड़ में मार गिराया था। एनकाउंटर करने वाली टीम की अगुवाई अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के उपायुक्त डीजी वंजारा कर रहे थे।

बाद में गुजरात पुलिस और अहमदाबाद के स्थानीय इंटेलिजेंस ब्यूरो पर खालसा कॉलेज मुंबई की इशरत जहां और उनके तीन साथियों को फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मारने के आरोप लगे थे। ये हत्याकांड काफी चर्चित हत्याकांडों में से एक रहा।

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गुजरात पुलिस ने दावा किया कि इन कथित चरमपंथियों का संबंध लश्कर-ए-तैयबा से था और ये लोग गोधरा दंगों का बदला लेने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की योजना बना रहे थे। सीबीआई ने जांच के बाद इस मुठभेड़ को इंटेलिजेंस ब्यूरो और गुजरात पुलिस के आला अफ़सरों की मिली भगत बताया था।

इस मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दिया था। इसमें गुजरात पुलिस के कई पुलिस अधिकारी जांच के घेरे में आए थे। एनकाउंटर का नेतृत्व करने वाले वाले पुलिस अधिकारी डीजी वंजारा को 17 साल बाद साल 2019 में मामले से राहत दी गई थी। इस मामले में अहमदाबाद में सीबीआई अदालत में अभी भी मुकदमा चल रहा है।

गुजरात पुलिस ने इशरत जहां और उसके दोस्तों को आंतकवादी करार देते हुए कहा था कि वे नरेंद्र मोदी की हत्या करने की साजिश रच रहे थे। हालांकि, बाद में सीबीआई ने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा था कि यह मुठभेड़ फर्जी थी।

वारंगल एनकाउंटर

ये मामला 12 बरस पुराना है। साल 2008 का यह ऐसा मामला था जिसमें जनता ने भावनात्मक रूप से इस पुलिसिया कार्रवाई का समर्थन किया था। इसमें आंध्र प्रदेश पुलिस ने एसिड अटैक के तीन आरोपियों को मार दिया था। तीनों पर एक इंजीनियरिंग कॉलेज की दो छात्राओं पर एसिड फेंकने का आरोप था।

पुलिस ने कहा था कि उन्होंने यह कार्रवाई आत्मरक्षा में की थी, लेकिन कई लोगों ने कहा था पुलिस ने यह लोगों की उद्वेलित होती भावनाओं को शांत करने के लिए जानबूझकर किया था। इस एनकाउंटर के बाद पुलिस पर तमाम सवाल उठे थे।

आंध्र प्रदेश स्मगलर एनकाउंटर

ये मामला 5 बरस पुराना ही है। 7 अप्रैल 2015 को आंध्र प्रदेश की पुलिस ने राज्य के चित्तूर जंगल में 20 कथित चंदन तस्करों को गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया था। इस एनकाउंटर के बाद पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठे थे।

पुलिस ने अपने बचाव में कहा था कि पुलिसकर्मियों पर हंसियों, छड़ों, कुल्हाड़ियों से हमला किया गया और बार बार चेतावनी देने के बावजूद हमले जारी रहे। मजबूरन हमने आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मामले पर ध्यान दिया और इसकी जांच की। आयोग ने आंध्र प्रदेश सरकार पर सहयोग नहीं करने का आरोप लगाया और इसकी सीबीआई जांच कराने की बात कही थी। पुलिस की इस कार्रवाई को बेहद ही बर्बर भी माना गया था।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जारी एक रिपोर्ट

गुज़रे साल 2019 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने एक रिपोर्ट जारी की थी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुताबिक 01 जनवरी 2015 से 20 मार्च 2019 के बीच उसे देशभर में फेक एनकाउंटर से जुड़ी 211 शिकायतें मिली हैं।

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रिपोर्ट में बता गया कि सबसे ज़्यादा फ़ेक एनकाउंटर की शिकायतें आंध्र प्रदेश में दर्ज की गई हैं। कुल 57 मामले दर्ज किए गए हैं। वहीं इस सूची में उत्तर प्रदेश दूसरे नंबर पर रहा है। यहां इस अवधि में 39 मामले दर्ज हुए हैं।

आयोग ने कहा था कि देश भर में कथित फेक एनकाउंटर के 25 मामलों में इसने विभिन्न राज्य सरकारों को पीड़ितों के परिवारों को 1.7 करोड़ रुपए का मुआवज़ा देने की सिफारिश की है थी। आयोग ने माना है कि इन मामलों में पीड़ितों के मानवाधिकारों के उल्लंघन हुए थे।

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