फ़ैज़ की इन पंक्तियों को बताया जा रहा है हिन्दू विरोधी

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ग्राउंड रिपोर्ट | न्यूज़ डेस्क

हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ
रूई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमों के पाँव-तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर

जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

बस नाम रहेगा अल्लाह का…इसी पंक्ति पर है विवाद

पाकिस्तानी शायर फैज़ अहमद फैज़ की नज्म ‘हम देखेंगे’ पर इन दिनों काफी विवाद हो रहा है। नागरिकता संशोधन एक्ट के खिलाफ जारी प्रदर्शनों में इस कविता का इस्तेमाल हो रहा है, इस बीच आईआईटी कानपुर ने एक जांच कमेटी बनाई है। ये कमेटी इस बात को जांचेगी कि क्या फैज़ की ये नज्म हिंदू विरोधी है या नहीं? ये जांच नज्म की ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का…’ की पंक्ति की वजह से हो रही है।

इस नज़्म के पीछे का इतिहास

फैज अहमद फैज की नज्म, शायरी और गजरों में बगावती सुर दिखते हैं। बंटवारे के बाद जब पाकिस्तान में सियासत उभरने लगी तो शुरुआत से ही आम लोगों पर जुल्म होने लगा, तभी से फैज पाकिस्तान की सत्ता के खिलाफ लिखते रहे। लेकिन साल 1977 में जब पाकिस्तान में तख्तापलट हुआ और सेना प्रमुख जियाउल हक ने सत्ता को अपने कब्जे में ले लिया तब फ़ैज़ ने यह मशहूर नज़्म लिखी थी। पाकिस्तान में हर जगह विरोध के लिए इन पंक्तियों के इस्तेमाल होने लगा।

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लाहौर के स्टेडियम में पाकिस्तान की मशहूर गजल गायिका इकबाल बानो ने 50 हजार लोगों की मौजूदगी में ‘हम देखेंगे’ नज्म को गाकर इसे अमर कर दिया था। तब से लेकर आज तक इसे हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों मुल्कों के कई गायक अपनी आवाज दे चुके हैं। अब सत्ता के खिलाफ प्रदर्शनों में इस नज़्म का इस्तेमाल किया जाता है। फ़ैज़ ने क्रांतिकारी विचारों को अपनी नज़्मों में पिरोया। इमरजेंसी के समय भी विरोध प्रदर्शनों में फ़ैज़ के विचार प्रदर्शनकारियों की आवाज़ बने।

अब नागरिकता कानून के विरोध में जब छात्रों ने फ़ैज़ की पंक्तियों को गाया तो बवाल हो गया। फ़ैज़ की पंक्तियों पर विवाद साहित्य की सतही समझ को दर्शाता है। हर दौर में साहित्यकारों ने अपनी कविता से सिंहासन को हिलाने का काम किया है। उर्दू शायरों ने अपनी नज़्मों से कई बार धर्म पर कटाक्ष किया है। ब्रिटिश हुकूमत से लेकर इंदिरा की इमरजेंसी हो या मोदी सरकार, साहित्य और कला को दबाने का काम करती रही है लेकिन हर हुक़ूमत से लड़कर शब्दों की ताकत अमर रही है।