जन्मदिन विशेषः हम देखेंगे.. नज़्म लिखने वाले मशहूर शायर फै़ज़ का आज जन्मदिन है

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पिछले दिनों भारत में जिनकी नज़्म को लेकर जंग छिड़ी हुई थी उसी शायर का आज जन्म दिन है। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के लेखन में एक रवानी थी। ग़म और मोहब्बत जैसे एक ही सांचे में ढलते और ग़ज़ल की शक्ल में बह निकलते। जन्म 13 फ़रवरी, 1911 को लाहौर के पास सियालकोट शहर में हुआ था। पिता सुल्तान मुहम्मद खां बैरिस्टर थे, पर परिवार प्रगतिशील न होकर बेहद रूढ़िवादी था। उनकी पांच बहनें और चार भाई थे।उनकी आरंभिक शिक्षा उर्दू, अरबी तथा फ़ारसी में हुई। उन्होंने आगे की पढ़ाई स्कॉटिश मिशन स्कूल तथा लाहौर विश्वविद्यालय में की जिनमें अंग्रेजी तथा अरबी से एमए की डिग्री शामिल है।

फ़ैज़ की वो नज़्म जिसको लेकर विवाद पनपा था

फैज ऐसे शायर थे, जो लिखते थे, जेल में डाल दिए जाते थे। फिर लिखते थे, फिर जेल जाते थे। वे फिर जेल में ही लिखते थे। आज भी सत्ता तानाशाही विकसित करती है, फैज के दौर में भी ऐसा होता था। भारत में भी आजादी की आमद के वक्त लोगों को उसका चेहरा नजर ही नहीं आ रहा था, कहीं लोग एक-दूसरे की जान के दुश्मन थे, तो कहीं आवाजों का दम घोंटा जा रहा था। फैज ने इसे शिद्दत से महसूस किया, और उनकी कलम बोल उठी।आज इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में भले ही फैशन के तौर पर आप-हम फैज के चंद शे’र और चंद नज्मों को शेयर करें, लेकिन फैज वह शायर थे, जिसने सोती अंतरात्माओँ को , जमीरों को जगाने का काम किया था।

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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है

लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

पढ़ाई पूरी करने के बाद वह अमृतसर के एमएओ कालेज में लेक्चरर हो गए।वहीं वह मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में आए।साल 1936 वह ‘प्रगतिवादी लेखक संघ’ से वह जुड़े और उसके बाद सज्जाद ज़हीर के साथ मिलकर पंजाब शाखा की स्थापना की।उन्होंने लगभग नौ साल तक उर्दू साहित्यिक मासिक ‘अदब-ए-लतीफ़’ का संपादन किया। साल 1941 में उनके छंदो का पहला संकलन ‘नक़्श-ए-फ़रियादी’ नाम से छपा, जिसने उनकी शोहरत को एक मकबूल ऊंचाई दी।इसी दौर में उन्हें एक अंग्रेज़ समाजवादी महिला एलिस जॉर्ज से मोहब्बत हुई और उनसे शादी कर वह दिल्ली में आ बसे।ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती हुए और 1942 से लेकर 1947 तक सेना में रह। सेना में वह कर्नल के पद तक पहुंचे।

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गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले

चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

फैज का जन्मस्थान बंटवारे का बाद पाकिस्तान के हिस्से में आया और उन्हें पाकिस्तान का नागरिक बनना पड़ा, लेकिन उनकी शायरी सरहदों की बंदिशों से आजाद रही। आजाद ही नहीं रही, उसने तो और भी सीमाओँ को तोड़ दिया। एक तरफ पाकिस्तान में नूर जहां उनकी गजल ‘मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग’ तो भारत में जगजीत सिंह ‘चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले’ को अपने सुर दे रहे थे। इस गजल को मेंहदी हसन ने सबसे खूबसूरत अंदाज में पेश किया है।

फैज को आमतौर पर लोग कम्यूनिस्ट कहते थे। उन्हें इस्लाम विरोधी भी कहा जाता था, और वह खुद कहते थे, ये इलजाम नहीं हकीकत है। फैज के किस्से भी बहुत हैं और हकीकत भी। फैज आजादी से पहले भी मकबूल थे और आजादी के बाद भी। फैज रोमांस की शिद्दत याद दिलाते थे, तो लोकतंत्र की मजबूती की भी।

इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन

देखे हैं हम ने हौसले परवरदिगार के

1978 में एशियाई-अफ़्रीकी लेखक संघ के प्रकाशन अध्यक्ष बने और 1982 तक बेरुत में कार्यरत रहे।1982 में वापस लाहौर लौटे।उनकी प्रकाशित चर्चित पुस्तकों में कविता-संग्रह- नक़्शे-फ़रियादी, दस्ते-सबा, ज़िन्दाँनामा, दस्ते-तहे-संग, सरे-वादिए-सीना, शामे-शह्रे-याराँ, मेरे दिल मेरे मुसाफ़िर); लेख-संग्रह- मीजान; पत्नी के नाम पत्र – सलीबें मेरे दरीचे में और मताए-लौहो-क़लम शामिल है।20, नवंबर 1984 को उनका देहांत हुआ।उनका आखिरी संग्रह ‘ग़ुबार-ए-अय्याम’ मरणोपरांत छपा।

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