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फानी बदायुनी की यौम-ए-पैदाईश पर उनके कुछ चुंनिंदा शेर: पढ़ें

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यूं तो उर्दू अदब के बाग़ में तमाम ऐसे फ़ूल खिले, जिन्होंने अपनी शायरी से इस बाग़ को हमेशा गुलज़ार किया. मीर-ओ-ग़ालिब हों या जौक़-ओ- मोमिन सभी ने अपनी शायरी का एक ऐसा गहरा असर छोड़ा है जो सैकड़ों साल गुज़र जाने के बाद भी ताज़ा लगता है.

हर मुसीबत का दिया एक तबस्सुम से जवाब

इस तरह गर्दिश-ए-दौराँ को रुलाया मैं ने

आज 18वीं सदी के एक बेहद मायानाज़ शायर का आज जन्म दिन है. जो ‘फानी’ के लक़ब से जाने जाते हैं. उनका असल नाम  मुहम्मद शौकत अली ख़ान था. जो 13 Sep 1879, यूपी के बदायूँ में पैदा हुए थे. अपनी शायरी से सबके दिलों पर राज करने वाला ये शायर 26 Aug 1941 दुनिया को अलविदा कह गया.

अपनी जन्नत मुझे दिखला न सका तू वाइज़

कूचा-ए-यार में चल देख ले जन्नत मेरी

‘मीर’ उर्दू-शायरी के ख़ुदाये-सुखन समझे जाते हैं और ‘फ़ानी’ असफल और निराश लोगों के ऐसे नेता कि जिन्हें जीवन में एक क्षण को भी सफलता और आशा की एक भी किरण दिखाई नहीं देती. तमाम उम्र अथक परिश्रम और उद्योग करते रहे लेकिन विफलता और निराशा के अतिरिक्त कुछ भी हाथ न लगा.

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ज़िंदगी जब्र है और जब्र के आसार नहीं

हाए इस क़ैद को ज़ंजीर भी दरकार नहीं

इतना हाथ-पांव मारने के बाद भी अगर किनारा नहीं मिला तो डूब जाना ही अच्छा था. डूबकर उतराए तो शायरी करने लगे,  उनके जीवन का अक्स उनकी शायरी में बखूबी नजर आता है.

फ़ानी बदायूनी की रुबाई

कितनों को जिगर का ज़ख़्म सीते देखा

देखा जिसे ख़ून-ए-दिल ही पीते देखा

अब तक रोते थे मरने वालों को और अब

हम रो दिए जब किसी को जीते देखा

अब ये भी नहीं कि नाम तो लेते हैं

दामन फ़क़त अश्कों से भिगो लेते हैं

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अब हम तिरा नाम ले के रोते भी नहीं

सुनते हैं तिरा नाम तो रो लेते हैं