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Dr. Kafeel Khan Letter: मथुरा जेल से डॉ. कफील ने लिखा खत, जहन्नुम में हूं…

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नारकीय हालात में यूपी का सबसे चर्चित डॉक्टर

अगर बदल न दिया आदमी ने दुनिया को,
तो जान लो के यहां आदमी की खैर नहीं

-फिराक गोरखपुरी

लखनऊ. एक तबका उन्हें उपद्रवी, देश-विरोधी गतिविधियों में लिप्त और अराजकतावादी मानता है तो दूसरा तबका उन्हें नायक। नायक, जिसके पास आरामदेह जिंदगी का विकल्प था लेकिन उसने मुश्किल रास्ता चुना व्यवस्थागत नासूर के इलाज का; या कहें व्यवस्था ने ही उसे धकियाकर खुद के खिलाफ खड़ा कर लिया।

Priyanshu | Lucknow/New Delhi

गोरखपुर अस्पताल के ‘ऑक्सीजन कांड’ ने उन्हें उत्तर प्रदेश का सबसे चर्चित डॉक्टर बना दिया। जो इस वक्त अपनी क्लीनिक में नहीं बल्कि सलाखों के पीछे है। वह कितना खतरनाक मुजरिम है, उसे छोड़ा जाए या नहीं इस पर आज इलाहाबाद में यूपी की सबसे बड़ी अदालत फैसला करेगी। डॉ. कफील खान को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में कथित भड़काऊ भाषण देने के आरोप में इसी साल 29 जनवरी को यूपी एसटीएफ ने मुंबई से गिरफ्तार किया था। उन पर दो बार राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) लगाई जा चुकी है। यह कानून सरकारों को किसी भी संदिग्ध नागरिक को हिरासत में लेने की शक्ति देता है।

इस वक्त डॉ. कफील मथुरा कारागार में बंद हैं। जहां से उन्होंने जेल की नारकीय हालात के बारे में पत्र लिखा है कि वह जेल नहीं जहन्नुम है। डॉ. कफील की पत्नी डॉ. शाबिस्ता खान ने इस पत्र की पुष्टि की है।

डॉ. कफील लिखते हैं-

ठीक पांच बजे सुबह सिपाहियों की आवाज से नींद टूटती है। उठ जाओ और सारे चल दो…जोड़े में..गिनती के लिए। जैसे ही गिनती पूरी होती है सब दौड़ते हैं टॉयलेट/वॉशरूम। 534 (लोगों की) कैपेसिटी की जेल में 1600 बंदी बंद हैं।

एक-एक बैरक में 125-150 कैदी और 4-6 टॉयलेट। फ्रेश होने के लिए लाइन में लगना होता है। अक्सर तीसरे से चौथे नंबर पर रहता हूं फिर इंतजार करिए दूसरा कब निकले। जैसे-जैसे अपना नंबर करीब आता है पेट में दर्द बढ़ता जाता है आखिर में जब टॉयलेट में इंटर करते हैं इतनी मक्खियां और मच्छर, इतनी गंदी बदबू कि कभी कभी शिट करने से पहले ही मुझे उल्टी हो जाती है। मक्खियां मच्छर भगाते रहो और किसी तरह शिट कर बाहर भागो।

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फिर हाथ अच्छी तरह धो कर ब्रश करता हूं और नहाने के लिए लाइन में लग जाता हूं। अक्सर आधे घेरे में नंबर आ जाता है। खुले में ही 3-4 टेप हैं। फर्श धोकर पहले कपड़े धोता हूं, फिर नहाता हूं। 7:30 से 8:00 बजे के करीब दलिया या चना आता है उसके लिए फिर से लाइन। वही नाश्ता होता है। फिर टहलता हूं। आजकल इतनी कड़ी धूप और गर्मी से 10-15 मिनट में ही पसीने से भीगा तो बनियान और शर्ट में ही टेप के नीचे बैठ जाता हूं और अपने फटे कंबल पर चादर बिछाकर; छोटी जगह जो आपको मिली है झाड़-पोंछ कर बेड बनाया जाता है; पर बैठ जाता हूं क्योंकि बहुत भीड़ होती है तो लोग सट-सट कर सोते हैं सोशल डिस्टेंसिंग तो भूल ही जाओ। लाइट अक्सर चली जाती तो मैं हर आधे या एक घण्टे पर अपने को भिगाकर आ जाता हूं। पूरे बदन में घमौरियों से बदन जलता है। फिर लाखों मक्खियां अपने ऊपर मंडराती रहती हैं। आप भगाते रहो और 5-10 मिनट के लिए रुक जाओ तो हजारों आपके बदन से चिपक जाएंगी।

11:00 बजे के करीब लंच/परेडी खाना आ जाता है फिर लाइन में लग बर्तन/थाली धोकर पानी जैसी दाल और फूलगोभी, लौकी, मूली की उबली सब्जी रोटी के लिए अलग लाइन में लगो। निगलो क्योंकि जीना है पानी के साथ दो-तीन रोटी ही निगली जाती हैं। कोरोना की वजह से मुलाकात बंद है वरना फल फ्रूट्स आ जाते थे, उसी से पेट भर लेता था।

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मिनट-मिनट गिनता हूं

12:00 बजे बैरक फिर बंद हो जाता है। बैरक में एक ही टॉयलेट है। 125-150 बंदी, लाइट गायब, पसीने से भीगते लोगों की गर्म सांसे और पेशाब पसीनों की बदबू वो तीन घण्टे जहन्नम/नरक से बदतर लगते हैं। पढ़ने की कोशिश करता हूं पर इतना सफोकेशन होता है कि लगता है कब गर्श खाकर गिर जाऊंगा। पानी पीता हूं खूब। 3:00 बजे बैरक ही खुलते सब बाहर भागते हैं पर 45 डिग्री तापमान आपको बाहर ठहरने नहीं देती। दीवार के पास जहां छाया मिलती है वहीं खड़ा होकर मिनट-मिनट गिनता हूं। जोहर की नमाज फिर से नहाने के बाद ही पढ़ता हूं। 5:00 बजे के करीब डिनर आ जाता है। लगभग वही कच्ची-पक्की रोटी और सब्जी-दाल बस निगल कर पेट की भूख किसी तरह शांत कर लो। 6:00 बजे फिर बैरक बंद हो जाता है। बैरक बंद होने के बाद फिर वही सफोकेशन सोने के लिए फिर से जद्दोजहद।

किस बात की मिल रही सजा

मगरिब पढ़ने के बाद नॉवेल लेकर बैठ जाता हूं लेकिन वहां इतनी घुटन महसूस होती है जिसे बयां नहीं कर सकता। कीड़े/मच्छर आपके जिस्म पर पूरी रात हमला करते हैं। पूरा बैरक मछली बाजार की तरह लगता है। घुटन इतनी बदबू से, कोई खांस रहा कोई खर्राटे ले रहा कोई हवा खारिज कर रहा। कुछ लोग लड़ रहे तो कोई बार-बार पेशाब करने जा रहा। अक्सर पूरी रात बैठकर ही गुजारनी होती है। अगर नींद लगी तो पता चला किसी का हाथ-पैर लगने से खुल जाती है, फिर बस 5:00 बजे सुबह का इंतजार रहता है कैसे बाहर निकलें इस जहन्नुम से। किस बात की सजा मिल रही है मुझे। कब अपने बच्चों, बीवी, मां, भाई, बहनों के पास जा पाऊंगा। कब कोरोना की लड़ाई में अपना योगदान दे पाऊंगा?

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-डॉ. कफील खान, मथुरा कारागार

व्यवस्था खुद पर लगा ले रासुका: रवीश

मैग्सेसे पुरस्कार विजेता पत्रकार रवीश ने डॉ. कफील खान की गिरफ्तारी पर फेसबुक पोस्ट लिखी है। इसमें उन्होंने डॉ. कफील के खिलाफ कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। रवीश ने लिखा, ‘डॉ. कफील ने राजनीतिक भाषण ही तो दिया था। क्या वो इतना बड़ा गुनाह था कि एक डॉक्टर को जेल की सड़ांध में धकेल दिया जाए। क्या सिस्टम ऐसे होना चाहिए? दो बार रासुका लगाई गई ताकि जमानत न मिले। क्या ये डॉक्टर कानून व्यवस्था के लिए इतना बड़ा खतरा हो सकता है? तो फिर कानून-व्यवस्था को खुद पर रासुका लगा देना चाहिए।’

उन्होंने आगे लिखा, ‘कहां ले जाएंगे इतना अपराध बोध। गलत को गलत तो बोलिए। आप फैसला नहीं कर पा रहे हैं तो डॉ. कफील पर कई रिपोर्ट छपी है। वही पढ़ लें। आखिर किस बात की आप खुद को चुप रहने की सजा दे रहे हैं। सिस्टम को इस तरह ध्वस्त करते चले जाने से आपको मिला क्या, इसी की सूची बना लीजिए।’

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