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‘हिन्दू धर्म में स्वतंत्र सोच के विकास की कोई गुंजाइश नहीं’, डॉ. भीम राव अंबेडकर के 11 अनमोल विचार

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संविधान निर्माता और भारत रत्न डॉक्टर बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव महु में हुआ था। महार जाति में जन्मे दलितों के मसीहा ने दलितों को सामाजिक और आर्थिक समानता दिलाने के लिए लिए आजीवन संघर्ष किया। हिन्दू धर्म में फैली कुरीतियों, छुआछूत और भेदवाद से तंग आकर डॉ. भीम राव ने अपने लाखों समर्थकों के साथ 14 अक्टूबर 1956 को नागपूर स्थित दीक्षा भूमि में बौद्ध धर्म अपना लिया।

पढ़ें समाज को जागरुक करने वाले उनके 11 अनमोल विचार-

1) कानून और व्यवस्था राजनीतिक शरीर की दवा है और जब राजनीतिक शरीर बीमार पड़े तो दवा जरूर दी जानी चाहिए।

2) एक महान आदमी एक प्रतिष्ठित आदमी से इस तरह से अलग होता है कि वह समाज का नौकर बनने को तैयार रहता है।

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3) मैं ऐसे धर्म को मानता हूं, जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाए।

4) हर व्यक्ति जो मिलकर ‘एक देश दूसरे देश पर शासन नहीं कर सकता’ के सिद्धान्त को दोहराता है उसे ये भी स्वीकार करना चाहिए कि एक वर्ग दूसरे वर्ग पर शासन नहीं कर सकता।

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5) इतिहास बताता है कि जहां नैतिकता और अर्थशास्त्र के बीच संघर्ष होता है, वहां जीत हमेशा अर्थशास्त्र की होती है। निहित स्वार्थों को तब तक स्वेच्छा से नहीं छोड़ा गया है, जब तक कि मजबूर करने के लिए पर्याप्त बल न लगाया गया हो।

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6) बुद्धि का विकास मानव के अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए।

7) समानता एक कल्पना हो सकती है, लेकिन फिर भी इसे एक गवर्निंग सिद्धांत रूप में स्वीकार करना होगा।

8) हिन्दू धर्म में विवेक, कारण और स्वतंत्र सोच के विकास के लिए कोई गुंजाइश नहीं है।

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9) जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता नहीं हासिल कर लेते, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है, वो आपके किसी काम की नहीं।

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10) यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्मों के शास्त्रों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए।

11) यदि नई दुनिया पुरानी दुनिया से भिन्न है तो नई दुनिया को पुरानी दुनिया से अधिक धर्म की जरूरत है।

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