विचार| राष्ट्रीय कांग्रेस या ‘गांधी प्राइवेट लिमिटेड’

Sharing is Important
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

विचार । हर्षवर्धन सिंह सिसोदिया।

हर बार की तरह इस बार भी 23 मई को मेरी थोड़ी बहुत राजनीतिक समझ ने जो अनुमान लगाया था,गलत निकला। पर दिल को तसल्ली इस बात की है कि बड़े बल्लम-बल्लम राजनीतिक पंडितों और न्यूज एजेंसियों के दावे सब के सब धरे के धरे रह गए। भाजपा के लोग टीवी बाइट में जो भी बोलें, इस जनादेश की कल्पना उन्होंने भी नहीं की होगी। पर इस जनादेश ने सबसे बड़ा आघात जिसे दिया है,वे हैं हमारे राहुल बाबा..कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष, या थोड़े तल्ख लहजे में कहूं, तो ‘कांग्रेस प्राइवेट लिमिटेड’ के युवराज। जी हां! मेरे इस कथन पर हो सकता है मेरे प्रिय कांग्रेसी मित्र नाराज़ हो जाएं,पर मेरा मानना है कि इस समय जब सत्ता पक्ष अपार जनादेश से प्राप्त असीमित ताकत के नशे में झूम रहा है, एवं देश को मज़बूत विपक्ष की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, हमारे देश की सबसे पुरानी पार्टी और उनके युवराज निराशा के समंदर में गोते लगा रहे हैं।

वाह राहुल बाबा वाह!

आज न्यूज में देखा तो पता चला कांग्रेस में हार के कारणों पर ‘मंथन’ चल रहा है। चूंकि इसमें हार का ठीकरा फोड़ने की कवायद भी होती है तो इस बार भी हुई और सुनने में ये आता है कि राहुल बाबा ने हिंदी हार्टलैंड में हार का जो कारण गिनाया है वो है – चौंकिएगा मत, वंशवाद! जी हां, राहुल गांधी ने कमलनाथ, अशोक गहलोत और पी चिदंबरम आदि नेताओं पर अपनी संतानों को पार्टी से आगे रखने का आरोप लगाते हुए उन्हें हार के लिए ज़िम्मेदार माना है। अब ये तो उनके नाम के आगे लगे हुए ‘गांधी’ उपनाम की महिमा है कि उनके नेतृत्व में लगातार कई चुनाव हारने और अपनी 125 वर्ष की राजनीतिक पूंजी खोने के बाद भी कांग्रेसी नेता चुपचाप उनके आरोपों को सुन गए । अन्यथा यदि आज खोज बीन की जाए तो सारे भारत में राहुल गांधी से बड़ा वंशवाद का लाभार्थी नहीं मिलेगा।

ALSO READ:  कांग्रेस में राहुल गाँधी को बर्दाश्त कर पाना कठिन होने  लगा है?

सबसे बड़ी निराशा मेरे उन कांग्रेसी मित्रों को है जो पिछले कुछ दिनों से राहुल में नजर आ रही नई ऊर्जा और आत्मविश्वास को देखकर गदगद हुए जा रहे थे। थोड़ा खुश तो मै भी था के चलो मोदी को कोई तो टक्कर देता दिखाई देता है, पर 23 मई के बाद वह खुशी भी समाप्त हो गई। सच तो यह है कि अब गुस्सा आता है, राहुल गांधी, गांधी परिवार और पूरी कांग्रेस पर, जिसने देश की सबसे गौरवमयी इतिहास वाली राजनीतिक शक्ति को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में बदल दिया। वास्तव में कांग्रेस देश के लोकतंत्र का अभिन्न अंग है, देश की धरोहर है और दशकों तक देश के नागरिकों की एकमात्र आवाज़ रही है। पर आज की घोर रूप से परिवार केंद्रित कांग्रेस एक ऐसे लोगों का समूह हो गई है जो एक ही परिवार के नीचे काम करने को बाध्य हैं और परिवार के युवराज का करियर बनाने की असफल कोशिशों में लगे हैं।

ALSO READ:  Sonia Gandhi says Congress state units will foot bill for migrants workers returning home

वंशवाद के विरूद्ध कुछ तर्क

दिक्कत सबसे बड़ी तब होती है मेरे पढ़े लिखे कांग्रेसी मित्र भी वंशवाद के पक्ष में कुतर्क करने लगते हैं। माना वंशवाद हर तरफ है.. फिल्मों से लेकर बिज़नेस वर्ल्ड तक,हर जगह। पर वहां वंशवाद किसी राष्ट्र के नागरिकों का भविष्य निर्धारित नहीं करता, जैसा कि राजनीति में करता है। हम यह भी मानते हैं कि भाजपा सहित दूसरी तमाम जमातें वंशवाद से मुक्त नहीं है, पर वहां यह समस्या इतनी बड़ी भी नहीं है कि सारी शक्तियां दशकों तक एक परिवार में निहित हो जाए और पार्टी कि सफलता उस परिवार की सफलता असफलता से निर्धारित होने लगे। आज भी कांग्रेस में जब भी राहुल पर सवाल उठते हैं,जवाब के रूप में प्रियंका को आगे कर दिया जाता है, जबकि कांग्रेस में एक से एक परिपक्व राजनीतिक प्रतिभाएं हैं,परन्तु वे सालों से युवराज के परिपक्व होने का इंतज़ार कर रहे हैं। राज्यों में भी कुछ कांग्रेसी परिवार दशकों के राज का रिकॉर्ड बना रहे हैं। इस तरह से देश की धरोहर और दशकों तक लोकतंत्र का आधार रही कांग्रेस का गांधी परिवार द्वारा हाईजैक किया जाना किसी भी सामान्य व्यक्ति को अखरता ही है,शायद इसी वजह से नए, युवा भारत ने कांग्रेस से जुड़ाव महसूस नहीं किया।

ALSO READ:  मज़ूदरों का रेल ख़र्च उठाएगी कांग्रेस !

तो कैसे बचाएं कांग्रेस?

कांग्रेस में व्याप्त राजनीतिक वंशवाद एक ऐसी बीमारी है, जिसका इलाज कांग्रेस खुद कभी नहीं करना चाहेगी, वह दिख भी रहा है, क्यूंकि इतनी बड़ी असफलता के बाद भी, कोई विरोध का स्वर नहीं, कोई असहमति नहीं, इस हद तक चाटुकारिता में डूबी पार्टी से क्या उम्मीद करें। अब आखिरी उम्मीद मुझे उन ही कांग्रेसी मित्रों से है, जो एकमत के इस दौर में विपक्ष का झंडा पकड़े खड़े हैं! उनसे अपील है कि बदली परिस्थितियों को समझते हुए अपने नेतृत्व को आइना दिखाएं, असहमति का मुजायरा करते हुए नेताओं को देशहित में फैसले लेने के लिए मजबूर करें, क्योंकि नेता की शक्तियां कार्यकर्ताओं में निहित होती हैं वास्तव में अगर देश को कांग्रेस मुक्त होने से बचाना है,तो पहले कांग्रेस को ‘गांधी परिवार मुक्त’ बनाना होगा, अन्यथा धृतराष्ट्र की तरह रहे तो परिणाम हस्तिनापुर को ही भुगतना होगा।