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सरकार जानती थी दूसरी लहर खतरनाक होगी, फिर भी कुछ नहीं किया

PM Modi corona second wave
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इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना का डबल म्यूटेंट स्ट्रेन B.1.167 जो भारत में दूसरी लहर में कहर बरपा रहा है, उसके बारे में पिछले वर्ष अक्टूबर 5 में ही पता चल गया था। विशेषज्ञों ने जीनोम सीक्वेंसिंग के ज़रिए इस नए स्ट्रेन के बारे में पता लगाया था। लेकिन सरकार की ओर से इस रिसर्च के लिए फंड में कटौती कर दी गई, जिससे यह रिसर्च ठंडे बस्ते में चली गई। आज हम जो परिणाम देख रहे हैं उनको रोका जा सकता था, अगर वायरस के बदलते स्वरुप पर सरकार ने गंभीरता दिखाई होती।

क्या होती है जीनोम सीक्वेंसिंग?

जीनोम सीक्वेंसिंग के ज़रिए वायरस की संरचना को समझा जाता है। इसमें 5 से 6 दिन का समय लगता है और एक सीक्वेंस बनाने में 3 हज़ार से 5 हज़ार तक खर्च आता है। शुरुवात में सरकार ने इस काम के लिए INSACOG को 115 करोड़ रुपए आवंटित किए थे। लेकिन इसके बाद बायोटेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट को कोई फंड नहीं दिया गया, और इस काम के लिए खुद ही पैसों का बंदोबस्त करने के लिए कह दिया गया। जिसके चलते पहले से धीमी रफ्तार में चल रहा काम ठप ही पड़ गया।

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जीनोम सीक्ववेंसिंग के ज़रिए ही वैज्ञानिकों को वायरस के स्वरुप के बारे में पता चला और वे इससे लड़ने के लिए वैक्सीन बना पाए। दूसरे देशों में यह काम बहुत तेज़ रफ्तार से किया गया लेकिन भारत में लापरवाही बरती गई। जिसका परिणाम हम आज भुगत रहे हैं।

फिल्हाल सरकार ने जीनोम सीक्वेंसिंग की रफ्तार को बढ़ा दिया है लेकिन ये 5 प्रतिशत से भी कम है। विशेषज्ञों की माने तो इस बीमारी से लड़ने के लिए वायरस को समझना बहुत ज़रुरी है। वायरस का कौनसा स्ट्रेन कहां एक्टिव है और वह कैसे प्रभावित करता है यह जानना ज़रुरी है। हो सकता है आने वाले समय में वायरस इतना प्रभावी हो जाए की हमारा इम्यून रिसपॉन्स ही उसपर काम न करे। इसलिए इस मामले में ज़रा सी भी लापरवाही भारी पड़ सकती है।

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