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सफलता डिग्री या उम्र नहीं देखती

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लेखक- सत्यम सिंह बघेल

यह सच है कि जो लोग अपने लक्ष्य को पाने के लिए जान लगा देते हैं वे सफलता की इबादत लिखते ही लिखते हैं और ऐसी इबादत लिखते हैं कि उनकी इबादत किताबों तक में अंकित हो जाती हैं, फिर आप पढ़ाई में असफल हो भी जाएं तब भी अपनी ज़िन्दगी में सफलता हासिल करेंगे ही करेंगे। ऐसे ही शख्स हैं लुधियाना के मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे 22 वर्षीय त्रिशनित अरोड़ा।

त्रिशनित अरोड़ा की दिलचस्पी बपचन से ही कम्प्यूटर और एथिकल हैकिंग में थी, इसमें इतना मग्न हो गए कि पढ़ाई ही नहीं की। आठवी क्लास में दो पेपर ही नहीं दिए और फेल हो गए। फेल होने के बाद रेग्युलर पढ़ाई छोड़ दी। इसके बाद उन्होंने 12वीं तक की पढ़ाई कॉरेस्पॉन्डेंस से की। इसके साथ-साथ वे कम्प्यूटर और हैकिंग के बारे में लगातार नई जानकारियां भी इकट्‌ठा करते रहे। मां और पिता इस काम को पसंद नहीं करते थे, लेकिन त्रिशनित कम्प्यूटर में अपने शौक को ही करियर बनाने का फैसला कर चुके थे।

शुरुआत में उनकी बातें सुन कर लोग मुस्कुरा देते। लोग मजाक उड़ाते थे। मीडिया भी गंभीरता से नहीं लेता, लेकिन फिर वह अपने काम के जरिए साबित करते कि कैसे विभिन्न कंपनियों का डाटा चुराया जा रहा है और इन दिनों हैकिंग के क्या तरीके इस्तेमाल किए जा रहे हैं। धीरे-धीरे उनके काम को मान्यता मिलने लगी। कंपनियां उनके काम को सराहने लगीं।

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जब उनकी उम्र 21 वर्ष थी, उन्होंने टीएसी सिक्युरिटी नाम की साइबर सिक्युरिटी कंपनी बनाई। त्रिशनित अब रिलायंस, सीबीआई, पंजाब पुलिस, गुजरात पुलिस, अमूल और एवन साइकिल जैसी कम्पनियों को साइबर से जुड़ी सर्विसेज दे रहे हैं। वे ‘हैकिंग टॉक विद त्रिशनित अरोड़ा’ ‘दि हैकिंग एरा’ और ‘हैकिंग विद स्मार्ट फोन्स’ जैसी किताबें लिख चुके हैं।

त्रिशनित की कमाई करोड़ों रुपए में आंकी जाती है। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि फिलहाल उनकी नजर कंपनी का टर्नओवर 2000 करोड़ रुपए तक पहुंचाना है। दुनियाभर की 500 कंपनियां इस वक्त त्रिशनित की क्लाइंट हैं।

इन्होंने साबित कर दिखाया कि ‘पैशन’ के आगे हर चीज छोटी है यहां तक कि पढ़ाई भी मायने नहीं रखती। इन्होंने यह भी साबित कर दिया कि जीवन में असफलताओं से कभी निराश नहीं होना चाहिए, क्योंकि असफलताएं ही आगे बढ़ने का रास्ता बताती हैं।

अपने लगाव, लगन, हुनर, परिश्रम से इन्होने 22 साल कि उम्र मे जो कंपनी खड़ी कर दिए हैं, इनके हौसले को दिखाता है। इतनी छोटी उम्र मे सफलता के झंडे गाड़कर इन्होने एक बार फिर साबित कर दिया कि सफलता कोई डिग्री या उम्र नहीं देखती बल्कि परिश्रम व लक्ष्य के प्रति लगन देखती है।

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इस लेख में व्यक्त विचार पूरी तरह से लेखक के निजी विचार हैं। ग्राउंड रिपोर्ट द्वारा इस लेख में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। हम अभिव्यक्ति की आज़ादी को सर्वोपरि मानते हैं।

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