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चीन 10 दिन में कोरोना वायरस के लिए अस्पताल खड़ा कर देता है और हम मरीज़ों को पलंग तक नहीं उपलब्ध करवा पाते

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नेहाल रिज़वी । ग्राउंड रिपोर्ट

भारत को आज़ादी मिले 72 वर्ष बीत चुके हैं। इन 72 वर्षों में हमने बहुत कुछ बदलता हुआ देखा। देश की स्वास्थ्य व्यवस्था भी बेहतर हुई हैं लेकिन उतनी नहीं की हम विश्व शक्ति बन जाएं। आज भी हमारे अस्पताल डॉक्टर और दवाईयों की राह देख रहे हैं। आज भी हमारे मरीज़ अस्पताल में पलंग और स्ट्रेचर से मोहताज हैं। तकिया न हो तो मरीज़ का पैर काटकर उसके सर के नीचे लगा दिया जाता है तो कभी बच्चों के अस्पताल में ऑक्सीज़न खत्म हो जाता है। कभी अचानक 100 नवजात बच्चों की मौत हो जाती है तो कभी गर्भवती महिला की समय से अस्पताल न पहुंचने पर मौत हो जाती है। दुनिया कोरोना वायरस की चपेट में है। चीन से फैली यह बीमारी अब दुनिया भर में पैर पसार रही है। केरल में तीन मरीज़ों के पॉज़िटिव पाए जाने की पुष्टि हुई है। चीन में 350 से ज़्यादा जानें जा चुकी हैं। चीन ने 10 के भीतर कोरोना वायरस के लिए स्पेशल अस्पताल बना कर खड़ा कर दिया। ऐसे में भारत में उपलब्ध स्वास्थ्य व्यवस्था की जानकारी लेना बहुता अहम हो जाता है। क्या हमारा देश ऐसी बीमारियों से लड़ने में सक्षम है? ग्राउंड रिपोर्ट के नेहाल रिज़वी ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था से संबंधित आंकड़े जुटाए हैं। आईए इनपर नज़र डालते हैं-

स्वास्थ व्यवस्था का निजीकरण चिंता का विषय

कुछ अहम सवाल जो आज़ादी के 72 वर्षों के बाद भी हमारे देश की चिंता का विषय बने हुए हैं। किसी भी देश के युवा उस देश की रीढ़ की हड्डी होती हैं, मगर जब रीढ़ की हड्डी ही कमज़ोर और लाचार हो तो देश की तरह मज़बूत बन पाएगा। बीते 72 वर्षों में हमने देश में बहुत बदलाव देखे। हमने बहुत कुछ हासिल किया अलग-अलग क्षेत्रों में उन्नति करते आए हैं। मगर आज़ादी के 72 वर्षों बाद भी हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाएँ अत्यधिक महँगी हैं जो गरीबों की पहुँच से काफी दूर हो गई हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा, भोजन व आवास जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं। गौरतलब है कि हमारे संविधान में इस बात का प्रावधान होते हुए भी कि नागरिकों को स्वास्थ्य व शिक्षा प्रदान करना हमारी प्राथमिकता है, हम एक राष्ट्र के रूप में इस लक्ष्य की प्राप्ति में असफल रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण जारी है जिससे आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

बीते वर्ष 2019 में देश में कैसा रहा स्वास्थ सेवाओं का हाल ?

बीते वर्ष 2019 में हमने स्वास्थ के क्षेत्र में बहुत से बदलाव किए और कई मामलों में सुधार भी किया मगर अभी भी स्वास्थ के क्षेत्र में बहुत काम बाक़ी है।

ज़रा नज़र डालिए कुछ शर्मसार करने वाले केस पर

हैदराबाद के गांधी अस्पताल में पलंग का आभाव तो ज़मीन पर ही मरीज़ों का हो रहा इलाज

हैदराबाद के गांधी अस्पताल में ज़मीन पर सोते मरीज़  | Photo Credit: Nagara Gopal

कुल्लू: सड़क का अभाव, कंधों पर गर्भवती को मुख्य मार्ग तक पहुंचाया, फिर ले गए अस्पताल

कानपुर के बिधनू सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव पीड़ा से तड़प रही प्रसूता को स्वजन सब्जी की ठेलिया पर लेकर पहुंचे। पीड़ितों ने आरोप लगाया कि कई बार सरकारी एम्बुलेंस के नंबर पर भी कॉल किया गया, पर उन्हें वह भी नसीब नहीं हुई।

झांसी मेडिकल कॉलेज में मरीज के कटे पैर को बना दिया तकिया

यह सब देख कर तकलीफ होती है। लेकिन यह सच्चाई है। हमें बहुत कुछ बदलने की ज़रुरत है। अब बात करते हैं भारत के सामने खड़ी चुनौतियों के बारे में-

भुखमरी से लड़ता देश

सबसे पहले बात करते हैं देश में भुखमरी की। ग्लोबल हंगर इंडेक्स (Global Hunger Index) में भुखमरी के मामलों में भारत दुनिया के सबसे ख़राब 15 देशों की सूची में शामिल था। 2019 के वैश्विक भुखमरी सूचकांक में भारत दुनिया के उन 45 देशों में शामिल है, जहां भुखमरी गंभीर स्तर पर है। सूची के अनुसार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार इस मामले में भारत से बेहतर स्थिति में हैं । welthhungerhilfe एंड Concern Worldwide द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया के उन 45 देशों में शामिल है जहां ‘भुखमरी काफी गंभीर स्तर पर है।’

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जीएचआई में भारत का खराब प्रदर्शन लगातार जारी है। साल 2018 के इंडेक्स में भारत 119 देशों की सूची में 103वें स्थान पर था। इस साल की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2017 में इस सूचकांक में भारत का स्थान 100 वां था लेकिन इस साल की रैंक तुलना योग्य नहीं है।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स लगातार 13वें साल तय किया गया है। इसमें देशों को चार प्रमुख संकेतकों के आधार पर रैंकिग दी जाती है – अल्प पोषण, बाल मृत्यु, पांच साल तक के कमजोर बच्चे और बच्चों का अवरुद्ध शारीरिक विकास।

इस सूची में भारत का स्थान अपने कई पड़ोसी देशों से भी नीचे है। इस साल हंगर इंडेक्स में जहां चीन 25वें स्थान पर है, वहीं नेपाल 73वें, म्यांमार 69वें, श्रीलंका 66वें और बांग्लादेश 88वें स्थान पर रहा है। पाकिस्तान को इस सूचकांक में 94वां स्थान मिला है।

बीते वर्ष 2019 में दीमाग़ी बुखार का रहा कहर

बीते वर्ष देश के कई राज्यों में दिमाग़ी बुखार का कहर जारी रहा। Acute Encephalities syndrome यानि जिसे हम आम भाषा में दिमाग़ी बुखार के नाम से जानते हैं। इस बुखार से देश का एक ग़रीब राज्य बिहार सबसे ज़्यादा मौतों वाला राज्य बना। साल 2019 में दिमाग़ी बुखार से 162 बच्चों की मौत हुई।

भारत सरकार सरकार ने भी इस बात को स्वीकार किया कि पिछले वर्षों की तुलना में 2019 में बिहार में एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) के मामलों में और इसके कारण बच्चों की मौत के आंकड़ों में वृद्धि हुई है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने राज्यसभा में बताया था कि-

2016 में एईएस के 324 मामले सामने आए और 102 बच्चों की मौत हुई।

2017 में इस बीमारी के 189 मामले सामने आए और 54 बच्चों की मौत हुई।

2018 में 124 मामले सामने आए और 33 बच्चों की मौत हुई।

2019 में दो जुलाई तक एईएस के 837 मामले सामने आए और 162 बच्चों की मौत हुई।

मंत्री अश्विनी चौबे ने राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया था कि बिहार के अलावा, देश के सात अन्य राज्यों में एईएस की वजह से 63 बच्चों की जान जाने की गई हैं। इनमें से असम में 25, झारखंड में दो, महाराष्ट्र, मणिपुर, ओडिशा में एक-एक, उत्तर प्रदेश में 17 और पश्चिम बंगाल में एईएस के कारण 63 बच्चों की मौत होने की ख़बर है। बिहार इन मौतों में सबसे आगे रहा।

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मलेरिया और डेंगू का कहर भी रहा जारी

दुनिया में मलेरिया सबसे ज्यादा भारत के लोगों को अपनी गिरफ्त में लेता है। राष्ट्रीय वेक्टरजनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम की रिपोर्ट के मुताबिक मलेरिया से जंग में हमारे छोटे पड़ोसी मुल्क भी हमसे कहीं आगे हैं। बीते वर्ष 2019 में मलेरिया के मामलों में कमी तो आई है मगर अभी इस पर बहुत काम करना होगा।

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भारत में सबसे ज़्यादा मलेरिया से मौत के मामले ओडिशा और महाराष्ट्र से सामने आते हैं। इसके अलावा छत्तीसगढ़, झारखंड और पश्चिम बंगाल भी मलेरिया की बीमारी से सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में शामिल हैं। हालांकि बीते वर्ष इसमें कमी देखने को मिली है।

दुनिया के 125 देश डेंगू (Dengue) की चपेट में हैं और हर साल करीब 10 करोड़ लोग इस रोग के शिकार होते हैं। यह दावा नेचर माइक्रोबायलॉजी नामक एक पत्र की है। दुनिया की करीब 4 अरब की आबादी इस बीमारी की आशंका वाले इलाकों में रह रही है। अगर इस दावे में सच्‍चाई है तो यकीन मानिए इस पृथ्‍वी पर सबसे कमजोर प्राणी समझा जाने वाला मच्‍छर (Mosquito) महामारी का कारण बनेगा।

भारत के कई राज्यों में बीते बर्ष 2019 में डेंगू से हुई मौत के अधिक मामले सामने आए हैं। बीते वर्ष भारत में डेंगू के कारण सैकड़ो लोगो की मौत हो गई थी ।

भारत में टीबी से होने वाली मौत

सरकार ने टी.बी जैसे रोगों से लड़ने के लिए काफ़ी काम किया। भारत में 2019 में टीबी के मामलों में काफ़ी कमी आयी हैं। सरकार ने 2025 तक भारत को टीबी मुक्त करने का लक्ष्य तय किया है। मगर ज़मीनी हक़ीकत को देखने के बाद ये काफ़ी मुश्किल दिखता है। 2025 तक भारत का टीबी से मुक्त होना मुश्किल नज़र आता है।

भारत में क्षय रोग (टीबी) विकसित करने वाले एचआईवी संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ रही है। 25 सितंबर, 2019 को भारत सरकार द्वारा जारी की गई टीबी रिपोर्ट 2019 में यह खुलासा किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि एचआईवी और टीबी से एक साथ पीड़ित होने पर मौत होने की आशंका बढ़ जाती है।

2019 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में टीबी के साथ-साथ एचआईवी के संक्रमण से पीड़ितों की संख्या लगभग 50,000 है, जबकि टीबी के कुल मामले कुल 2,155,894 हैं। यानी कि टीबी-एचआईवी पीड़ितों की का प्रतिशत 3.4 है, जबकि 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक, यह दर 3 फीसदी थी। 2018 में टीबी के कुल मामले 1,444,175 थे, जिनमें से 43,253 मामले टीबी-एचआईवी संक्रमित रोगियों की थी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि हर साल लगभग 11 हजार एचआईबी-टीबी सह संक्रमित रोगियों की मौत होती है। ऐसे मामले सबसे अधिक-

नागालैंड (15.6 प्रतिशत) कर्नाटक (10 प्रतिशत) और चंडीगढ़ में 9.1 प्रतिशत और मणिपुर में 8.9 प्रतिशत रिकॉर्ड किए गए।

इन राज्यों में हैं अधिक टीबी रोगी

उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 4.2 लाख टीबी रोगी हैं। यह कुल टीबी रोगियों का लगभग 20 फीसदी है। इसके बाद कुल रोगियों के मुकाबले महाराष्ट्र में लगभग 10 फीसदी, राजस्थान में सात फीसदी, मध्यप्रदेश और गुजरात में भी लगभग 7 फीसदी, तमिलनाडु, बिहार व पश्चिम बंगाल में 5 फीसदी है।

बच्चों में टीबी के बढ़ते मामले

टीबी रिपोर्ट 2019 में कहा गया है कि देश में 15 साल से कम उम्र के बच्चों में टीबी रोग बढ़ा है और 133059 बच्चों को टीबी रोगी के तौर पर अधिसूचित किया गया है। ये मामले उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक पाए गए हैं। एमडीआर टीबी एक बार दवा शुरू करने के बाद बीच में दवा छोड़ने से टीबी दोबारा हो जाती है, इसे मल्टी ड्रग रेसिसटेंस (एमडीआर) कहा जाता है। दुनिया में ऐसे मामले में 114237 हैं, इनमें 26966 भारत में हैं। इसी तरह एक्सटेंसिव ड्रग रेसिसटेंस के मामले भी भारत में 2130 हैं, जबकि दुनिया में इनकी संख्या 8000 है।

PM-JAY प्राधानमंत्री जन आयोग्य योजना रही बेअसर

PM-JAY प्राधानमंत्री जन आयोग्य योजना को 2019 में एक साल पूरा हो चुका है। मगर सबसे बड़ा सवाल यही है कि अभी भी देश के सबसे ग़रीब लोगों को जोड़ा नहीं जा सका है। हमारे देश का दुर्भाग्य है कि देश के सबसे ग़रीब लोग जो थाड़ा बहुत पैसा कमाते हैं उसका एक बड़ा हिस्सा उनको अपनी स्वास्थ सेवाओं पर खर्च करना पड़ता है।

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तथ्यों पर जायें तो ‘आयुष्मान भारत’ के इस साल के 2,000 करोड़़ रुपयों के बजट में करीब-करीब 1,000 करोड़ राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का है, जो पहले भी था, अब भी है और बाकी 1,000 करोड़ कथित तौर पर हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर के लिए रखा गया है!

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कि 80,000 रुपये प्रति सेंटर की इस मामूली सी रकम से कितना काम हो सकता है? चूंकि सरकार ने ऐसे सवालों पर चुप्पी साधकर इससे जुड़ी चिंताएं और बढ़ा दी हैं। ओडिशा, तेलंगाना, दिल्ली, केरल और पंजाब जैसे पांच राज्यों ने ‘आयुष्मान भारत’ को सिरे से अस्वीकार कर दिया है।

MATERNAL MORTALITY RATIO ( MMR ) प्रसव के दौरान होने मांओं की मौत के मामले

वहीं बीते वर्ष 2019 में MATERNAL MORTALITY RATIO ( MMR) प्रसव के दौरान होने माओं की होने वाली मौतें। सरकार ने भारत में प्रसव के दौरान होने वाली की माओं की मौत को प्रति 100000 में से 70 पर लाने का लक्ष्य रखा है। मगर ये लक्ष्य आसान नहीं दिखता है। हालाकिं साल 2011 से 2017 के बीच MMR में 27 फीसदी की कमी देखी गई थी। मगर हम इस मामले में बांग्लादेश, भूटान, नेपाल और चीन से पीछे हैं।

INFANT MORTALITY RATIO : शिशु मृत्यु दर के मामले

वहीं अगर देश में शिशु मृत्यु दर की बात करे तो इसके आकडे बेहद ही चौकाने वाले हैं। कम मृत्यु दर के बावजूद, दुनिया में सबसे ज़्यादा मौतें

देश में पांच साल से कम उम्र के 35% बच्चों का क़द उनकी उम्र के हिसाब से कम है, 33% बच्चों का वज़न कम है, 17% बच्चों का वज़न उनकी लंबाई के हिसाब से कम है और 41% बच्चे अनीमिक हैं। इस मॉनसून में बिहार में दिमाग़ी बुख़ार से 162 बच्चों की मौत हो गई। इस साल कुपोषण के मामलों में कमी ज़रूर आई लेकिन फिर भी ग्लोबल हंगर इंडेक्स के 117 देशों की लिस्ट में भारत का स्थान 104 पर रहा।

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1 दिसंबर, 2019 से लेकर अब तक राजस्थान और गुजरात के छह सरकारी अस्पतालों से 600 से ज़्यादा नवजात शिशुओं की मौत की ख़बर है। राजस्थान में कोटा के जे के लोन अस्पताल में दिसंबर में 101 से ज़्यादा नवजात शिशुओं की मौत हुई है।

जोधपुर के उम्मेद और एमडीएम अस्पताल में यह संख्या 102, और बीकानेर के सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज में 124 थी। गुजरात में राजकोट के पंडित दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल में 111 नवजात शिशुओं की मौत हुई और अहमदाबाद सिविल अस्पताल में यह संख्या 85 थी।

2018 में देश भर में 721,000 शिशुओं की मौत

2018 में देश भर में 721,000 शिशुओं की मौत हुई थी, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र के बाल मृत्यु दर अनुमानों में बताया गया है। यानी 2018 में औसतन हर रोज़ 1,975 शिशुओं की मौत हुई। भारत में बच्चों की सबसे ज़्यादा जनसंख्या है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर (प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 37) दुनियाभर के औसत (39) से कम है। इसके बावजूद 2018 में, भारत में पांच साल से कम उम्र के 882,000 बच्चों की मौत का अनुमान लगाया गया है, जो दुनिया में सबसे ज़्यादा है।

ग़रीबी और स्वास्थ व्यवस्था से 2019 का भारत से सीधा रिश्ता नज़र आया

2019 में देश के सबसे ग़रीब 5 राज्यों स्वास्थ व्यव्स्था की हालात सबसे ख़राब रही। बिहार, यूपी, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड रहे।

अगर 2019 में स्वास्थ बजट की बात करें तो सरकार ने 62659 करोड़ रूपय दिए थे। भारत ने अपनी जीडीपी का 1.4 फीसदी हिस्सा ही स्वास्थ पर खर्च किया था जो नेशनल हेल्थ पॉलिसी के अंदर तय किए गए लक्ष्य 2.5 फीसदी से काफी कम है। वहीं अगर 2020 के बजट की बात करे तों सरकार ने हेल्थ को 67116 करोड़ दिए हैं जो पिछली बार से 10 फीसदी ज़्यादा है।

Air Pollution – अब बात वायु प्रदूषण की

बीते वर्ष 2019 में देश में वायु प्रदूषण से ही सबसे ज़्यादा लोग बीमार हुए। बीते साल हमारे देश में होने वाली हर आठवीं मौत का कारण रहा वायु प्रदूषण।

वायु प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए तीसरा सबसे बड़ा खतरा बन गया है। अमेरिका स्थित हेल्थ इफेक्ट इंस्टीट्यूट (एचईआई) और इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवेल्यूएशंस (आईएचएमई) की ओर से जारी स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर, 2019 रिपोर्ट के अनुसार, दूषित वायु धूम्रपान से भी ज्यादा मौतों का कारण बन रही है। वायु प्रदूषण के कारण 2017 में दुनियाभर में 49 लाख मौतें हुई हैं। कुल मौतों में 8.7 प्रतिशत योगदान वायु प्रदूषण का रहा।

भारत में वायु प्रदूषण के कारण 2017 में 12 लाख लोगों ने जान गंवाई है। यह मौतें आउटडोर (बाहरी), हाउसहोल्ड (घरेलू) वायु और ओजोन प्रदूषण का मिलाजुला नतीजा है। इन 12 लाख मौतों में से 6,73,100 मौतें आउटडोर पीएम-2.5 की वजह से हुईं, जबकि 4,81,700 मौतें घरेलू वायु प्रदूषण के चलते हुईं। भारत के अलावा चीन में 12 लाख, पाकिस्तान में एक लाख 28 हजार, इंडोनेशिया में एक लाख 24 हजार, बांग्लादेश में एक लाख 23 हजार, नाइजीरिया में एक लाख 14 हजार, अमेरिका में एक लाख आठ हजार, रूस में 99 हजार, ब्राजील में 66 हजार और फिलीपींस में 64 हजार मौतों की वजह दूषित बना बनी है। वायु प्रदूषण दुनियाभर में बीमार लोगों की संख्या में बेहताशा वृद्धि कर रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वायु प्रदूषण के कारण लोग समय से पूर्व मर रहे हैं और उनकी आयु 2.6 साल कम हुई है। आउटडोर पीएम के कारण जहां 18 महीने जीवन प्रत्याशा कम हुई, वहीं घरेलू प्रदूषण के चलते इसमें 14 महीने की कमी आई। यह कम जीवन प्रत्याशा के वैश्विक औसत (20 महीने) से बहुत अधिक है।

हमारे देश को आज़ाद हुए 72 बरस हो हए मगर हम लोग आज भी उन चीज़ों से आज़ाद नहीं हो पाए जो हमारे देश के लिए सबसे ज़्यादा ज़रुरी हैं। हम भुखमरी से आज़ाद नहीं, ग़रीबी से आज़ाद नहीं। ग़रीबों तक स्वास्थ सेवाओं को नहीं पहुंचा पाए । हमें बचपन से ही सिखाया जाता है कि स्वस्थ जीवन ही सफलता की कुंजी है। किसी भी व्यक्ति को अगर जीवन में सफल होना है तो इसके लिये सबसे पहले उसके शरीर का स्वस्थ होना आवश्यक है। व्यक्ति से इतर एक राष्ट्र पर भी यही सिद्धांत लागू होता है।

किसी देश के नागरिक जितने स्वस्थ होंगे देश विकास सूचकांक की कसौटियों पर उतना ही अच्छा प्रदर्शन करेगा। उदारीकरण के बाद आर्थिक क्षेत्र में हमारी महत्वाकांक्षाएँ आसमान छू रही हैं। भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था है। लेकिन, जब बात देश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति की आती है तो हमारा सारा उत्साह ठंडा पड़ जाता है।

शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति ज़्यादा बदतर है

शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति ज़्यादा बदतर है। इसके अलावा बड़े निजी अस्पतालों के मुकाबले सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं का घनघोर अभाव है। उन राज्यों में भी जहाँ समग्र औसत में सुधार देखा गया है, उनके अनेक जनजातीय बहुल क्षेत्रों में स्थिति नाजुक बनी हुई है। निजी अस्पतालों की वज़ह से बड़े शहरों में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता संतोषजनक है, लेकिन चिंताजनक पहलू यह है कि इस तक केवल संपन्न तबके की पहुँच है।

महँगी होती चिकित्सा सुविधाओं के कारण, आम आदमी द्वारा स्वास्थ्य पर किये जाने वाले खर्च में बेतहासा वृद्धि हुई है। एक अध्ययन के आधार पर आकलन किया गया है कि केवल इलाज पर खर्च के कारण ही प्रतिवर्ष करोड़ों की संख्या में लोग निर्धनता का शिकार हो रहे हैं। ऐसा इसलिये हो रहा है क्योंकि कि समाज के जिस तबके को इन सेवाओं की आवश्यकता है, उसके लिये सरकार की ओर से पर्याप्त वित्तीय संरक्षण उपलब्ध नहीं है, और जो कुछ उपलब्ध हैं भी वह इनकी पहुँच से बाहर है।

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