दिलवालों की दिल्ली में जब कुछ दरिंदे जा बैठे

Sharing is Important
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

पिछले तीन चार दिनों से सुबह से लेकर रात तक जब भी फेसबुक या ट्विटर खोलो बस दिल्ली में नफरत की आग में जलकर राख हुई सैकड़ों कहानियां, तस्वीरें, वीडियो ही दिखते हैं। किसी की बूढ़ी मां को इस नफरत की आग ने लील लिया तो किसी के जवान बेटे की तो किसी नई नवेली दुल्हन के सपनों को छिन लिया। इन दर्द भरी दास्तानों को सुनकर देखकर मन में यह सवाल उठता है कि वह कौन लोग होते हैं जो यह सब कर के चले जाते हैं और फिर बड़े आराम से अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं? क्या चल रहा होता है जब वे यह सब करते हैं? और क्या चल रहा होता है जब इंसानियत का गला घोंटकर अपने घरों को जाते हैं?

अपने परिवार वालों से, अपने चाहने वालों से वह नज़रें मिला लेते हैं? अपनी मां को देख उन्हें अपने हाथों सूनी की हुई किसी मां की गोद का ख़्याल आता होगा? अपने बाप से नज़रें मिलाते हुए किसी बूढ़ें बाप की रोती हुई तस्वीर उनके आंखों के सामने नहीं गुज़रती? उनके इंतज़ार में दरवाज़ें को तकती पत्नी जब उनसे सवाल पूछती होगी कि कहां थें तो उनके पास देने के लिए क्या जवाब होगा? किसी की पत्नी की मांग सूनी करके आए हैं? या फिर अपने बेटे को अपनी गोद में लेते हुए उन्होंन जवाब दिया होगा कि देखों इतने ही बड़े बच्चे की हम दुनिया उजाड़ आए हैं? क्या सच में यही जवाब दिया होगा? अगर उनका यही जवाब होगा तो क्या सच में ऐसा जवाब देते हुए वह अपने अपनों से आंखें मिला पाए होंगे? यदि आंखे मिलाने की हिम्मत उनमें मौजूद थी भी तो क्या वह सुकुन से परिवार के बीच बैठकर खाना खा सके होंगे? मान लेते हैं कि नफरत की आग में वह इतने अंधे हो गये कि उन्हें अपने परिवार से आंखे मिलाने में शर्म नहीं आयी होगी तो क्या इतनी क्रुरता की हदें पार करने के बाद, अपने हाथों से मासूमों का संसार उजाड़ने के बाद मन को वह शांति मिल गई होगी जिसकी तलाश हर इंसान को होती है?

READ:  CM Kejriwal announces weekend curfew in Delhi. Check all details

क्या जब वह सोते होंगे तो उनको चैन की नींद आती होगी? उन्हें सपनों में डरे सहमे रोते बिलखते बच्चों की चीखें नहीं सुनाई देती होंगी? हाथ जोड़कर रहम की भीख मांगते बूढ़े मां बाप नहीं दिखाई देते होंगे? या फिर आग की लपटों में जलते किसी के सपनों के आशियानों का भंयानक मंज़र उनकी आंखों के सामने नहीं घूमता होगा? अगर ऐसा नहीं होता तो आखिर कैसे नहीं होता? क्या वह इंसान ही नहीं हैं? अगर इंसान नहीं हैं तो हम जैसे बोलते, खाते पीते लोग क्यों हैं? क्यों उन्हें ईश्वर ने इंसान की शक्ल में पैदा कर हमारे बीच में छोड़ दिया? क्यों उनके जिस्म के अंदर मौजूद दिल केवल एक गोश्त का टुकड़ा बन कर रह गया? क्यां सत्ता को लोभ या किसी इंसान के प्रति नफरत इस हद तक पहुंचा देती है लोगों को? वही पड़ोसी, वहीं एक शहर में रहने वाले, एक साथ ढेरों काम करने वाले, साथ मिलकर त्यौहार मनाने वाले अचानक से हैवान बन जाते हैं?

READ:  मुल्ला और जिहादी बताकर तोड़ डाली साईबाबा की मूर्ती, कौन हैं ये लोग?

दिल्ली के मौजूदा मंज़र पर शारिब मौरान्वी की ये ग़ज़ल आज भी ताज़ा है

ज़ुल्म करते हुए वो शख़्स लरज़ता ही नहीं

जैसे क़हहार के मअ’नी वो समझता ही नहीं

हिन्दू मिलता है मुसलमान भी ईसाई भी

लेकिन इस दौर में इंसान तो मिलता ही नहीं

किस तरह उतरेगा आँगन में क़मर ख़ुशियों का

ग़म का सूरज कभी दीवार से ढलता ही नहीं

मिट नहीं सकता कभी दामन-ए-तारीख़ से दाग़

ख़ून-ए-मज़लूम कभी राएगाँ होता ही नहीं

हमारा अतीत ऐसे ढेरों दंगे और नरसंहार की दर्दनाक दास्तां संजोंए हुए मौजूद है जिसका ट्रेलर हम वर्तमान में भी देख लेते हैं लेकिन क्यों नहीं हम इनसे सबक हासिल कर अपनी अगली पीढ़ियों तक इस नफरत को पहुंचने से रोक पाते? क्या हम नफरत के आगोश में पलते हुए अपने बच्चों के दर्दनाक भविष्य से आंख मूंद लेते हैं या फिर सत्ता का लोभ इंसान को इतना पागल कर देता है कि सबकुछ देखते हुए भी हम कुछ नहीं देख पाते?

READ:  IFFCO ने लिया अहम फैसला, किसानों को दी बड़ी राहत

ये लेख कानपुर की स्वतंत्र पत्रकार सहीफ़ा खान ने लिखा है

आप ग्राउंड रिपोर्ट के साथ फेसबुकट्विटर और वॉट्सएप के माध्यम से जुड़ सकते हैं और अपनी राय हमें Greport2018@Gmail.Com पर मेल कर सकते हैं।