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दिल्ली दंगों के बाद अल्पसंख्यक मंत्री ने लोगों का हाल जानना भी मुनासिब नहीं समझा

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तीन दिनों तक दंगों की आँच में झुलसने के बाद दिल्ली धीरे धीरे सामान्य हो रही है और उम्मीद है कि अगले कुछ ही दिनों मे ज़िंदगी पटरी पर आ जायेगी पर बहुत से ऐसे प्रश्न छोड़ जायेगी जिनके हल ढूंढना इसलिए भी आवश्यक है कि ये अनुभव दोहरायें न जायें।  पुलिस बल की भारी तैनाती के बीच धीरे धीरे जनजीवन पटरी पर लौट रहा है। वहीं, पुलिस ने रविवार को तीन अलग अलग जगहों से चार और शव बरामद किए। इसके साथ ही हिंसा में मरने वालों की संख्या 46 तक पहुंच गई है। 

लोगों के घर जल रहे थे और मंत्री चैन की नींद सो रहे थे

दिल्ली हिंसा पर राजनीति भी शुरू हो चुकी है। बयानबाज़ियों का दौर अपने चरम पर है। मगर एक सवाल जो चर्चा का हिस्सा नहीं बन पाया। सत्तारूढ़ पार्टी के एक मात्र बड़ा मुस्लिम चेहरा और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी की ख़ामोशी। दिल्ली हिंसा के बाद नक़वी ने बयान देते हुए महज़ इतना कहा कि कुछ राजनीतिक दल और ‘उकसाने वाले पेशेवेर लोग’ साम्प्रदायिक दंगों से प्रभावित लोगों के जख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं लेकिन इन सबके बावजूद सौहार्द्र कायम होगा। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता ने कहा कि भड़काने वाले और मुजरिम जेल में होंगे तथा शांति एवं सौहार्द्र कायम होगा। यह ‘हमारी प्रतिबद्धता तथा विश्वास’ होना चाहिए।

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देश में जब अल्पसंखयकों को लेकर कोई मसला चर्चा का विषय बनता है तो नक़वी हमेशा बोलने से बचते दिखाई देते हैं अगर बोलते है तो काफ़ी सदा हुआ। दिल्ली दंगों पर नक़वी की ख़ामोशी ढेर सारे सवाल पैदा करती है। दशकों से बीजेपी का हिस्सा रहे नक़वी आज अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री हैं। देश के मुस्लिमों में आज असुरक्षा की भावना साफ दिख रही है। नक़वी इस  देश के मुस्लमानों को भरोसे में लेने में पूरी तरह से विफल होते रहे हैं। जब दिल्ली 3 दिनों तक हिंसा की आग में जलती रही तो नक़वी ख़ामोश रहे। जब हिंसा थमी तो दुनिया ने हिंसा ग्रस्त क्षेत्रों का मंज़र देखा जो बेहद ही डरावना था।

दिल्ली दंगों के बाद पुलिस की भूमिका पर सवाल

अब सवाल ये है कि भाजपा का एक मात्र बड़ा मुस्लिम चेहरा और केन्द्रीय मंत्री होने के बावजूद भी नक़वी किसी परिवार से मिलने नहीं पहुंचे। जब पूरी तरह से टूट चूके लोगों को हिम्मत और उम्मीद की ज़रूरत थी तब नक़वी सोते रहे। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री होने के नाते नकवी के हिंसा में मारे गए लोगों के परिवार से मिलना ज़रूरी नहीं समझा।

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साथ ही दिल्ली हिंसा के बाद सबसे बड़ा जो सवाल बना हुआ है वो दिल्ली पुलिस की भूमिका को लेकर। दिल्ली में शांति बहाली के बाद इस सवाल को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होना महत्वपूर्ण हो गया है। क्या कारण है कि साम्प्रदायिक दंगों में पुलिस की भूमिका सवालों के घेरे में आ जाती है ?

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