43 मज़दूरों की मौत को इस देश की संसद ने आज ऐसे इग्नोर किया जैसे घटना 43 साल पुरानी हो..

Sharing is Important
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

ग्राउंड रिपोर्ट । न्यूज़ डेस्क

किसे पता था कि अगली सुबह ज़िन्दगी की आख़री सुबह होगी। अपने-अपने गांव से हज़ारों किलोमीटर का सफर तय करके दिल्ली की एक फ़ैक्टरी में 12 से 15 घंटे काम करके अपना परिवार पालने वाले वो 43 मज़दूरों की मौत की दर्दनाक कहानी का मंज़र जो लोगों के लिय कई सवाल छोड़ गया है।

इस मुल्क में गरीब आदमी की जान कितनी सस्ती है! दिल्ली की जिस इमारत में आग लगने से कल 43 लोग मर गए, उसमें चल रही फैक्ट्री में थैले बनते थे। बच्चे, जवान और बूढ़े, सभी तरह के लोग इनमें काम करते थे। एक थैला बनाने के पांच रुपए मिलते थे। दिनभर में एक मजदूर तकरीबन 60 से 70 थैला बनाता था! जिस बिल्डिंग में आग लगी, वहां की गलियां, उस बिल्डिंग की दीवारें, उसकी खिड़कियां, उसकी छतें, वहां की मशीनें और वहां की हवाएं उन मजदूरों को पहचानती थीं। पर वे उनका मज़हब नहीं जानती थीं! सिर्फ़ उनकी ग़रीबी और मजबूरी समझती थीं।

ये सभी लोग दिल्ली में जिस कारखाने में काम करते थे, वहीं सोया भी करते थे। ये लोग जितना भी पैसा कमाया करते थे उसका अधिकतम हिस्सा अपने परिवार को भेज दिया करते थे ताकि घर वालों को दो वक्त की रोटी मिल सके। लेकिन रविवार की सुबह लगी आग ने न केवल 43 लोगों की जलकर मौत हुई बल्कि उनके परिवार वालों के जीने का रास्ता भी खत्म हो गया।

बिहार के अलावा इस कारखाने में उत्तर प्रदेश के भी कुछ युवा काम करते थे। मोहम्मद मुशर्रफ़ भी ऐसे ही लोगों में शामिल थे। मुशर्रफ़ की मौत के बाद उनके परिवार में कमाने वाले कोई नहीं बचा है। मौत से पहले उन्होंने अपने दोस्त को फोन करके कहा था कि वो आग में फंस गए हैं और अपने दोस्त से वादा लिया था कि वो उनके परिवार का ख़्याल रखें।

ALSO READ:  63/70: In Delhi, development trumps hate

लोकनायक अस्पताल के मुर्दाघर में उनकी शिनाख़्त करने आए उनके फूफ़ा बताते हैं,

“मुशर्रफ़ अभी दो दिन पहले ही गाँव से आए थे। उनकी मौत ही उन्हें दिल्ली खींच लाई।मुशर्रफ़ ने कुछ समय पहले अपनी बहन की शादी कराने के लिए भूमि विकास बैंक से लोन लिया था। अब बैंक वाले परेशान कर रहे थे। इस वजह से वह घर गया था। गांव में उसने कुछ ज़मीन बेचकर अपना कर्जा भरा और फिर कमाने के लिए दिल्ली लौट आया।”

क्योंकि अभी भी दर्जनों परिवार ऐसे हैं जिनके परिवारवाले अपने-अपने गाँव से किसी न किसी तरह दिल्ली पहुंच रहे हैं और उन्हें नहीं पता है कि उनके घरवाले ज़िंदा हैं या नहीं। इस दर्दनाक हादसे को महज़ एक ही दिन बीता है। संसद से सड़क तक नागरिकता संशोधन विधेयक का ही हल्ला मचा रहा। संसद में आज कितने लोगों ने इस पर शोक संदेश ज़ाहिर किया? ग़रीब मज़दूरों की मौत को काग़ज़ी कारवाई कर वैसे ही भुला दिया जाएगा जैसे हमेशा से इस देश में ग़रीबों की लाशों को मुआवज़े का कफ़न ढंक कर भुला दिया जाता रहा है।

एक मज़दूर की मरने से पहले फ़ोन पर बातचीत जिसने सभी को झंकझोर दिया

“मोनू भैया आग लग गई है… टाइम कम है भागने का कोई रास्ता नहीं है, खत्म हुआ भैया मैं तो, घर का ध्यान रखना, अब तो सांस भी नहीं ली जा रही…. किसी को एकदम से मत बताना, पहले बड़ों को बताना….बच्चों. सब घरवालों को संभालकर रखना….”।

दिल्ली अग्निकांड में 43 मजदूरों की मौत पर अब सियासत शुरू हो गई है। दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष मनोज तिवारी ने कहा कि इलाके में बिजली की तार लटक रहे हैं लेकिन कई शिकायतों के बाद भी सरकारी एजेंसियों ने कोई कार्रवाई नहीं की। कांग्रेस ने इस घटना के लिए आम आदमी पार्टी (आप) सरकार और बीजेपी के नेतृत्व वाले नगर निगमों को जिम्मेदार ठहराया है। वहीं आम आदमी पार्टी ने बीजेपी शासित दिल्ली एमसीडी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है।

ALSO READ:  SC/ST Act के विरोध में सवर्णों का 'भारत बंद', ड्रोन कैमरों से नजर, डैमेज कंट्रोल में जुटी बीजेपी

लोग बयान देते रहेंगे। सरकारें मुआवज़ा देती रहेंगी। मगर ग़रीब की मौत पर इस देश की संसद में शोक तक जताने में नेताओं को शर्म आएगी। क्या इस देश में 43 मज़दूरों की मौत के मुद्दे को राष्ट्रीय शोक के रूप में नहीं देखना चाहिए था ?