Home » संगी साथी गांव कहां, अंबवा की छांव कहां

संगी साथी गांव कहां, अंबवा की छांव कहां

Sharing is Important
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

ग्राउंड रिपोर्ट । पल्लव जैन

आधुनिकता और ज़्यादा पैसे कमाने की होड़ में हम गांव छोड़ शहरों की तरफ़ चल पड़े। साफ हवा और शांत जीवन को छोड़ हमने ज़हरीली होती हवा और सरपट दौड़ती ज़िंदगी को चुन लिया। लगा था पैसा कमा कर एक दिन फिर वहीं लौट जाएंगे जहां हमने अपना बचपन जिया। लेकिन कभी यह नहीं सोचा था कि बदलाव और आधुनिकता की आंधी हमारे पहुंचने से पहले हमारे गांवों तक पहुंच जाएगी। हमारे गांव इंटरनेट के तारों से तो जुड़ गए, लेकिन आम के पेड़ पर टंगने वाले सांवन के झूले काट दिए गए या यूं कहिए कि आम के पेड़ ही काट दिए गए। आखिर क्यों प्रकृति की गोद में पलने वाले गांव पेड़ों से नाता तोड़ रहे हैं? इस सवाल की खोज में पहुंचा ग्राउंड रिपोर्ट मध्यप्रदेश के कुछ गांवों में और लोगों से जाना की आखिर क्यों गांवों में बाग-बगीचे और जंगल काटे जा रहे हैं?

मध्यप्रदेश के सीहोर जिले में स्थित रोलागांव निवासी संतोष जैन से हमने जब यह सवाल पूछा तो उन्होने बड़े विस्तार से इसके बारे में बताया। संतोष जैन पेशे से शिक्षक हैं और कई सालों से सीहोर शहर में रह रहे हैं, लेकिन उनका मन हमेशा अपने गांव से जुड़ा रहा। प्रकृति के प्रति उनका प्रेम उनके हर कार्य में दिखाई देता है। वे अपने शहर में पौधारोपड़ की अलख जगाते रहे हैं। उन्होंने यह माना की गांवों में बाग-बगीचे तबाह हो चुके हैं, इसके पीछे मुख्य वजह खेतों से ज़्यादा से ज़्यादा उपज हासिल करना है। पहले के लोग खेती केवल अपना पेट पालने के लिए करते थे, उनकी ज़रुरतें सीमित थी। आज लाभ की खेती किसान करना चाहता है। वह ज़्यादा से ज़्यादा ज़मीन खेती के काम में लेना चाहता है। उन्होंने बताया की पहले खेतों के किनारे पेड़ लगाए जाते थे, बाग और बगीचे भी खूब हुआ करते थे। लेकिन अब पारिवारिक बंटवारे के कारण लोगों के पास सीमित ज़मीने बची हैं। 10 एकड़ ज़मीन में किसान अगर बाग-बगीचे लगा देगा तो उसकी आमदनी पर असर पड़ेगा। क्योंकि पेड़ों से मिलने वाले फलों के लिए काफ़ी इंतज़ार करना होता है और लाभ भी अधिक नहीं होता। इसकी अपेक्षा किसान पेड़ों को काटकर अपना खेत का जोत क्षेत्र बढ़ा लेता है और 1 वर्ष में 2 फ़सलों का लाभ पा सकता है। खेत के किनारे लगे पेड़ की छांव में पौधे नहीं बढ़ पाते इस वजह से किसान इन पेड़ों को काट देना ही बेहतर समझता है। गांव में बीहड़ और परती ज़मीन भी ज़्यादा नहीं बची हैं, जहां पर पेड़ स्वत: ही उग जाया करते थे। इन ज़मीनों को शासकीय भवन बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा है। संतोष जैन का मानना है कि गांवों में लोगों को जागरुक करने का अब समय आ गया है, क्योंकि तापमान में वृद्धि की वजह से जलस्तर गिरता जा रहा है। पेड़ नहीं होंगे तो बारिश नहीं होगी और बारिश नहीं होगी तो खेत खलिहान, ताल-तलैया सब सूख जाएंगे। शहर में पानी का संकट गहरा रहा है, गांवों से थोड़ी आस है, वह भी टूट जाएगी। संतोष जैन एक कवि भी हैं उनकी कविताओं में हमें प्रकृति प्रेम साफ़ दिखाई देता है। इस लेख का शीर्षक हमने उन्ही की कविता की एक पंक्ति से लिया है।

READ:  India's GDP rate may increase by 8.3 percent in 2021-22: World Bank

नदी-नद ताल कहां, पत्तियों की नांव कहां
संगी-साथी गांव कहां, अंबवा की छांव कहां।।

इस ही विषय पर हमने मध्यप्रदेश के पीपलिया ग्राम निवासी पं संतोष शर्मा से भी बात की। वे एक संपन्न किसान हैं, उन्होंने हाल ही में संतरे और नींबू का बगीचा लगाया है। उनका मानना है कि खेती अब पहले की तरह नहीं रही। कम ज़मीन में ज़्यादा से ज़्यादा उपज ही किसान का लक्ष्य है। पेड़ों की उपयोगिता भी गांव के लोगों के जीवन में कम हुई है। पहले गांव के लोग ईंधन के लिए भी पेड़ों पर निर्भर थे। आज सभी के घरों में गैस चूल्हा आ गया है। गांवों में जंगल भी तेज़ी से काटे जा रहे हैं क्योंकि जंगलों में वन्य जीव नहीं बचे हैं। वन्य जीवों के भय से जंगल कटने से बच जाया करते थे। उन्होंने खुद हाल ही में अपने खेत से कुछ पुराने पेड़ कटवा दिए क्योंकि उनकी छांव से खेत की फसल प्रभावित हो रही थी। हमने उनसे पूछा की क्या किसान भविष्य में इससे होने वाली समस्या को महसूस नहीं कर पा रहा है? तो उन्होने बताया कि जब तक समस्या सिरहाने न आ जाए व्यक्ति की चेतना पर असर नहीं पड़ता। वे मानते हैं कि पेड़ लगाना बहुत ज़रुरी है और मध्यप्रदेश सरकार भी इस ओर ध्यान दे रही हैं। वे खुद शासन की नीति के तहत कई जगह पौधारोपण करवा चुके हैं। प्रकृति को बचाने के लिए हर एक को प्रयास करना होगा। इस समस्या के लिए केवल किसान की ओर देखना उचित नहीं है। शहर हो या गांव हर जगह पौधारोपण करना होगा।

READ:  World Ocean Day 2021: Impact of human action on ocean

ग्राउंड रिपोर्ट ने इतना जाना की गांवों में विकास होना ज़रुरी है, आधुनिक साधनों का पहुंचना भी ज़रुरी है, लेकिन हमें प्रकृति को साथ लेकर चलना होगा। हमें विकास की अंधी दौड़ में शामिल हमारे शहरों को देखना होगा। जहां जीवन को सुखद बनाने की तमाम चीज़ें मौजूद होंगी लेकिन आने वाले समय में पीने योग्य पानी नहीं होगा। दिल्ली, चेन्नई जैसे शहरों में 2020 तक भूमिगत जल खत्म हो जाएगा। प्रदूषण से सांस लेना दूभर हो जाएगा।जो बर्बाद हो चुका उसे हम सुधारने का प्रयास करेंगे, लेकिन जो बचाया जा सकता है, उसे बचाना ही होगा।