हमारी पीढ़ी ने शायद ही सिस्टम को कभी इतना लाचार देखा हो

कोरोना की दूसरी लहर में लाचार हेल्थ सिस्टम
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कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। लेकिन जिस तरह से दूसरी वेव का असर भारत पर पड़ा है, वो बहुत ही भयंकर है। इस समय पूरे विश्व में एक दिन में सबसे ज्यादा मामले हमारे देश से ही आ रहे हैं।

सिस्टम को इतना लाचार शायद ही हमारी पीढ़ी ने कभी देखा हो। हर जगह से पूरे देश से सिर्फ खौफ भरी खबरे सुनने को मिल रही हैं। सोशल मीडिया पर हर जगह किसी के मरने और किसी को दुआ का सहारा देते लोग फीड्स में दिख रहे हैं। कोई रेमेडेसिविर की मांग कर रहा है, कोई ऑक्सीजन सिलिंडर, तो कोई प्लाज्मा, कोई अपने आसपास के लोगो की कहानी या उनके लिए मदद मांग रहा है।

अस्पतालो में बेड्स नहीं है। सरकारें आपस में लड़ रही हैं। एक दूसरे के ऊपर दोष मढ़ रहे हैं। श्मशानों में जगह नहीं है शव जलाने की, कब्रिस्तान में जगह खत्म हो रही है शव दफ़नाने की।

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इन सब के बीच देखिये सरकारों की नाकामी। एक साल पहले भी देश में यही स्थिति थी और आज भी। क्या हमारी सरकारें इतनी भी सक्षम नहीं की एक साल में मेडिकल हेल्थ सेवाओं को बेहतर कर पाती? सारा धयान सिर्फ इस बात पर रहा की वैक्सीन आ जाए बाकी सब को ठीक करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। सिस्टम ऐसा ही था, ऐसा ही रहा और अब पूरे एक साल बाद देखिये। देश में वैक्सीन भी है और कोरोना पहले से भी ज्यादा आक्रामक। काश इसके साथ-साथ सिस्टम को भी अपग्रेड किया होता।हॉस्पिटल की हालत भी सुधरी होती, लेकिन ऐसा हुआ नहीं और कोरोना ने हमें बख्शा नहीं। आश्चर्य की बात यह है कि वैक्सीन डोज़ के बाद भी कोरोना हो रहा है। इसी से अंदाज़ा लगा लीजिये की हम लड़ाई में कहाँ खड़े हैं।

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मेरी मानिये तो आप कितने भी और किसी भी राजनेता के भक्त हों, लेकिन इस देश की स्थिति को ठीक नहीं ठहरा सकते। सरकार मृत्यु दर सही नहीं बता रही। इसको लेकर मीडिया में कितनी रिपोर्ट्स आई। क्या आपने इससे पहले कभी सुना था कि श्मशानों को टिन से ढाका जा रहा हो, कब्रिस्तानों में दफ़नाने को 2 गज़ ज़मीन खत्म हो रही हो। ये सरकार श्मशानों को नहीं बल्कि अपनी नाकामी को ढक रही हैं।

आप याद रखिये एक पूरा साल क्या कुछ नहीं हो सकता था। इन्ही नेताओ के पास वाकई में एक अच्छा लीडर बनने का मौका भी था। जैसा कहा भी गया था आपदा को अवसर में बदलिए, लेकिन अफ़सोस ऐसा हुआ नहीं और स्थिति आपके सामने है और भयावह है।

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क्या आप किसी ऐसे नेता को जानते हैं, जिसके देश में लगातार 5 दिन 1000 से ज्यादा मौते हो रही हों और वो देश के नाम एक सम्बोधन न करे। लेकिन इलेक्शन कैंपेन जरूर करे। आप माने ना माने ऐसा प्रतीत हो रहा है, देश वासियों से ज़्यादा चुनाव जीतना और रैलियों में भीड़ इकट्ठा करना ज़रुरी है। वर्तमान सरकार का सारा ध्यान इलेक्शन पर है। आप किसी भी बड़े मंत्री के ट्विटर हैंडल पर जा सकते हैं। कोरोना और इलेक्शन पर कितने ट्वीट्स हैं इसी महीने के?

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विपक्ष पूरी तरह नाकाम है, दबाव बनाने में। ये लोग कब जागेंगे शायद उन्हें भी नहीं पता। लेकिन आप लोग जाग जाइये। ये बीमारी इसी तरह बढ़ती चली गयी तो ये याद रखियेगा, इन राजनेताओं का कुछ जाएगा नहीं, नुक्सान आपको और हमको ही झेलना पड़ेगा।

पूरे देश में हालात ख़राब हैं, लेकिन फिर भी कोई कड़े नियम नहीं दिख रहे। हर रोज़ मीटिंग हो रही है, लेकिन असर कुछ दिख नहीं रहा। फिल्हाल तो इंतज़ार करिये इलेक्शन ख़त्म होने का। देखते हैं कौन इन सरकारों की ख़ुशी में शरीक होगा। इलेक्शन ख़त्म होने पर।

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हर आदमी को सतर्क होना पड़ेगा। मास्क लगाना होगा, दूरी बनानी होगी, इससे लड़ना होगा। कोरोना को छोटा साबित करना होगा। आप सभी से अपील है।

यह लेख योगेश खिंची द्वारा लिखा गया है। इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दिए गए आंकड़ों और तथ्यों की पुष्टी ग्राउंड रिपोर्ट नहीं करता।

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