दिल्ली में फिर बढ़ने लगे कोरोनावायरस के मामले

नवंबर में चरम पर होगा कोरोना, लेकिन डरने की नहीं है ज़रुरत

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भारत में कोरोना की रफ्तार तेज़ी से बढ़ रही है। दिल्ली, मुंबई, चैन्नई, अहमदाबाद जैसे महानगरों में हालात काबू से बाहर जा चुके हैं। छोटे शहरों में मामले बढ़ रहे हैं लेकिन स्थिति नियंत्रण में दिखाई देती है। देश में कोरोनावायरस से ठीक होने वालों की संख्या भी 50 फीसदी से ऊपर पहुंच चुकी है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च द्वारा गठित एक रिसर्च ग्रुप के स्टडी में बताया गया है कि भारत में महामारी नवंबर माह में अपने चरम पर होगी। आठ सप्ताह के लॉकडाउन की वजह से महामारी का चरम स्तर 34-76 दिनों के लिए टल गया है। वहीं, लॉकडाउन के खत्म होते-होते 69-97% मामले कम हो गए है। स्टडी के अनुसार, नवंबर महीने में जब कोरोना के मामले चरम पर होंगे, तब भारत में आईसीयू बेड्स और वेंटिलेटर्स की कमी हो सकती है।

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तैयारी करने का है समय

सरकार को नवंबर माह तक सभी ज़रुरी इंतज़ाम करने होंगे वरना हालात बेकाबू हो सकते हैं। बैड और वेंटीलेटर की कमी से जिन्हें बचाया जा सकता है, वे समय से उपचार न मिलने पर दम तोड़ सकते हैं। ऐसे में सभी को ज़रुरी इलाज मुहैया कराने का प्रबंध सरकार को करना होगा। अगर सरकार ने जल्द ही टेस्टिंग की उचित व्यवस्था नहीं कि तो हालात खराब हो जाएंगे। लॉकडाउन के बाद सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय 60 फीसदी तक बढ़ाए जाने की वजह से नवंबर के पहले सप्ताह तक मांग को पूरा किया जा सकता है। इसके बाद 5.4 महीनों तक आइसोलेशन बेड, 4.6 महीनों तक आईसीयू बेड्स और 3.9 महीनों तक वेंटिलेटर्स में कमी आ सकती है।

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जन स्वास्थ्य उपायों को 80 फीसदी तक बढ़ाना होगा

हालांकि, स्टडी में दावा किया गया है कि यदि लॉकडाउन और जन स्वास्थ्य उपायों को नहीं किया जाता तो हालात और खराब हो जाते। इनकी वजह से जो पहले हालात होते, उससे अब आने वाले समय में 83 फीसदी की कमी होगी। रिसर्चर्स का कहना है कि यदि जन स्वास्थ्य उपायों को 80 फीसदी तक और बढ़ाया जाता है तो फिर महामारी से हालात काफी कम बिगड़ सकते हैं।

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60 फीसदी मौतें टाली गईं

भारत में कोविड-19 महामारी के लिए मॉडल-आधारित विश्लेषण के अनुसार, लॉकडाउन के दौरान मरीजों की टेस्टिंग, उपचार और आइसोलेशन की अतिरिक्त क्षमता जो बनाई गई है, उसकी वजह से मामलों के उच्च स्तर पर पहुंचने में 70 फीसदी तक की कमी आएगी। इसके अलावा क्युमुलेटिव मामलों में तकरीबन 27 फीसदी की कमी आ सकती है। डाटा के विश्लेषण में यह बात सामने आई है कि 60 फीसदी तक अधिक मौतें हो सकती थीं, जिन्हें टाला दिया गया। 

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