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जनता-कर्फ़्यू में “कर्फ़्यू” पर भारी पड़ती “जनता”

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Ground Report News Desk | Pawan Chaurasia

22 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा “जनता-कर्फ़्यू” का आह्वान करना इस बात का प्रतीक है कि भारत में कोरोना वायरस (कोविड-19) के कारण होने वाले संक्रमण से लड़ने के लिए देश को अब इस लड़ाई को अगले स्तर तक लेकर जाना पड़ेगा. सरकार द्वारा उठाए जा रहे अनेकों प्रयासों में से यह प्रयास बेहद विशेष है क्योंकि इस प्रयास को सफल बनाने में जितना हिस्सा सरकार का होगा, उससे कहीं अधिक हिस्सा जनता का होगा.

जनता-कर्फ़्यू वैसे तो सुनने में थोड़ा अटपटा ज़रूर लग रहा होगा, और देखा जाए तो यह अपने आप में विरोधाभासी भी है. लेकिन फिर भी इस शब्द के प्रयोग को कोई संयोग नहीं बल्कि अपने आप में एक ख़ास तकनीक मानी जानी चाहिए।

शब्दों में निहित भाव

ऐसा माना जाता है कि हर शब्द के अपने अर्थ होने के साथ साथ अपने भाव भी होते हैं जिनको अंग्रेज़ी में connotation कहा जाता है. यह भाव नेगेटिव या पॉजिटिव दोनों ही हो सकते हैं. इसीलिए कई बार किसी चीज़ की व्याख्या करते समय यह ध्यान देना पड़ता है कि उसका नाम अपने आप में नेगेटिव connotation न दे जिससे लोगों में गलत भावना का संचार हो.

एक उदाहरण से समझते हैं- आम तौर पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा किसी भी युद्ध संघर्ष से जूझ रहे देश में अपना सुरक्षा बल भेजा जाता है, जिसका नाम होता है “यू एन पीस कीपिंग फोर्स”. इस सुरक्षा बल के आधिकारिक नाम में “पीस” यानी शांति इसलिए जोड़ा जाता है ताकि युद्ध संघर्ष झेल रहे लोगों में यह पॉजिटिव connotation पहुंचाया जा सके ताकि वो इन शस्त्रों से लैस सैनिकों को देख कर भयभीत न हो और यह समझें कि उस देश में मौजूद अन्य हथियार-बंद गुटों के विपरीत यह लोग वहां शांति स्थापित करने आए हैं.

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कुछ ऐसा ही प्रयास प्रधानमंत्री मोदी ने आज की इस पहल को ”जनता-कर्फ़्यू” का नाम दे कर किया है. “कर्फ़्यू” एक नेगेटिव connotation वाला शब्द है जिसको सुनते ही हमारे मन में दंगा, फसाद, युद्ध, हिंसा आदि जैसी चीजें चलने लगती हैं, जो हमारे मन में असुरक्षा और खौफ का भाव पैदा करती है. ऐसे में प्रधानमंत्री द्वारा इस मुहिम को “जनता-कर्फ़्यू” घोषित करने से उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की है कि इस कर्फ्यू को सरकार द्वारा नहीं, बल्कि जनता द्वारा संचालित किया जा रहा है.

यह आज के ज़माने का जन-आंदोलन और जन-भागीदारी का वह जीवंत स्वरूप है, जिसका प्रयोग राष्ट्रपिता महात्मा गांधी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देश के नागरिकों को एकजुट करने में किया करते थे. इस कर्फ़्यू में जनता इसलिए नहीं हिस्सा लेगी क्योंकि यह शासन की पुलिस या सेना द्वारा जनता पर थोपा गया है, बल्कि इस लिए इसका हिस्सा बनेगी की क्यों कि यह उसका नैतिक दायित्व है.

इसके साथ-साथ प्रधानमंत्री द्वारा कोरोना से लड़ने के लिए दिन-रात मुस्तैदी से काम करने वाले स्वास्थ्यकर्मी, सैनिक एवं अन्य सरकारी अधिकारीयों के कार्यों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए अपने घरों से ताली बजाना या थाल पीटना भी एक विशेष प्रयास है. यह उन लोगों के लिए उत्साहवर्धन का काम करेगा.

प्रधानमंत्री मोदी हमेशा से ही जनभागीदारी के समर्थन में रहे हैं और इस बार भी वो ऐसा ही कुछ कर रहे हैं. वो सरकारी योजनाओं को केवल कागजों तक या कुछ अधिकारियों तक नहीं सीमित रहने देते बल्कि अपने कम्युनिकेशन स्किल के माध्यम से सीधे जनता तक पहुंचाते हैं फिर चाहे वह “स्वच्छ भारत” हो या फिर गैस की सब्सिडी को छोड़ने के लिए बनाया गया “गिव इट अप कैंपेन”.

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ज़रूरत है अभूतपूर्ण एकता की
ज्ञात रहे कि कोरोनावायरस कोई राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय आपदा नहीं बल्कि एक मानवीय आपदा है जो देश, जाति, धर्म विचारधारा से भी ऊपर है. पूरे विश्व को इस महामारी ने झकझोर के रख दिया है. दो सौ से अधिक मामले सामने आने के बाद भारत भी क्रिटिकल स्टेज में आ चुका है और आने वाला समय उसके लिए चुनौतीपूर्ण होने जा रहा है.

हालात को देख कर तय हो चुका है कि सरकार केवल अपने दम पर तो इस लड़ाई को नहीं जीत सकती है. ऐसे में हमें यानी जनता को भी जनता-कर्फ्यू को सफल बनाने के लिए अपने घरों से न निकल कर अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी को पूरा करना होगा.

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), में अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर पीएचडी कर रहे हैं.)

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