कोरोना महामारी और शिक्षकों की समस्याएं

महामारी, पढ़ाई और शिक्षकों की समस्याएं

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कोविड-19 महामारी ने पूरे विश्व को पूरी तरह प्रभावित किया। चाहे वह वैश्विक अर्थव्यवस्था हो या अंतरराष्ट्रीय संबंध कुछ भी इससे अछूता नहीं रहा। शिक्षा व्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित हुई जिसका सबसे ज्यादा असर शिक्षकों पर पड़ा। कोरोना महामारी ने शिक्षकों की कड़ी परीक्षा ली है। शिक्षण संस्थान बंद हो जाने से शिक्षकों के सामने कई समस्याएं आ खड़ी हुई। भारत के शिक्षक इस संदर्भ में अपने आप को और असहाय पाते हैं। उनके सामने नई तकनीक के अलावा और भी कई चुनौतियां हैं जो उनके दुख का कारण बनी हुई हैं।

“मैं पहले 6 विद्यालयों में कराटे प्रशिक्षण देता था। इससे मैं महीने के 40,000 कमा लिया करता था। लेकिन जब से स्कूल बंद हुए है, मेरी आमदनी रुक गई है। मैं किसी को दोष नहीं दे सकता, क्योंकि सभी के पास अपनी – अपनी परेशानियां हैं। चूंकि मुझे कंप्यूटर की जानकारी है,तो मैं शारीरिक शिक्षा के ऑनलाइन क्लासेज लेकर किसी तरह अपना गुजारा चला रहा हूं। “झारखंड के एक कराटे प्रशिक्षक संजय ने अपनी परेशानियों का जिक्र करते हुए ये बातें  कहीं। संजय की तरह कई शिक्षक एवं प्रशिक्षक इस विषम परिस्थिति में कई परेशानियों से जूझ रहे हैं।

शिक्षकों के वेतन भुगतान में देरी  

विभिन्न क्षेत्रों में, बहुत सारे लोगों को इस महामारी से उत्पन्न में हुए आर्थिक संकट की वजह से नौकरी से हाथ धोना पड़ा है। शिक्षकों के हालात भी कुछ ऐसे ही हैं। ऐसे विद्यालय जिनमें मध्यम एवं निम्न आय वर्ग वाले परिवार के बच्चे पढ़ते थे, आज शिक्षकों का वेतन भुगतान करने में असमर्थ हैं। हाल ही में दिल्ली के कुछ विद्यालयों ने सरकार से इस संबंध में आर्थिक मदद की गुहार लगाई थी। छोटे विद्यालयों ने बहुत सारे शिक्षकों को नौकरी से निकाल दिया है। वहीं बाकियों ने लंबे समय से उन्हें वेतन नहीं दिया है। कुछ विद्यालय जिन्होंने वेतन नहीं रोका है, वे इसमें 40 से 50 प्रतिशत तक की कटौती कर रहे हैं। ऐसे शिक्षकों के लिए जिनका परिवार पूरी तरह से उन की कमाई पर निर्भर है, स्थिति और भी बदतर है। वह सिर्फ इसलिए आवाज नहीं उठा पा रहे क्योंकि उन्हें नौकरी खोने का डर है।

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शिक्षकों पर अतिरिक्त दबाव एवं निजता का हनन  

कई शिक्षकों का कहना है कि इस महामारी के कारण उनका काम और बढ़ गया है। उन्हें स्कूल प्रशासन के संपर्क में भी रहना पड़ता है और अभिभावकों के भी। वे बच्चाें और स्कूल प्रशासन के बीच की कड़ी बन गए हैं, जिस वजह से उन्हें 24 घंटे उपलब्ध रहना पड़ता है। हर बच्चे को क्लास में बुलाने से लेकर असाइनमेंट करवाने तक की सारी जिम्मेदारी उन पर आ गई है।इस नए प्रयोग से उनकी निजता का भी हनन हुआ है।न उन्हेें हर बच्चे के साथ अपना मोबाइल नंबर साझा करना पड़ रहा है, जिसके उन्हें कई गंभीर परिणाम झेलने पड़ रहे हैं। छात्रों के परिवार वाले उन्हें कभी भी कॉल या मैसेज कर देते हैं, और उन्हें बात करनी पड़ती है। इस कारण वे अपने परिवार के लिए भी समय नहीं निकाल पा रहे।

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नई तकनीक, नई समस्याएं      

हर तकनीक के कुछ फायदे और नुकसान होते हैं।  ऑनलाइन क्लासेस के भी कई नुकसान है, जिनकी वजह से बच्चों एवं शिक्षकों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। छात्रों की तुलना में शिक्षकों को ज्यादा परेशानी हो रही है। सभी शिक्षक पढ़ाने के नए तरीके को लेकर सहज नहीं है, लेकिन उनके पास इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है। इंटरनेट और मोबाइल एसोसियेशन  के अनुसार, ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की पहुंच शहरी क्षेत्रों की तुलना में आधी है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले शिक्षकों के लिए, इंटरनेट कनेक्टिविटी ना होना या बहुत कम होना एक बहुत बड़ी बाधा बन जाती है। जिस तकनीक से वो खुद संघर्ष कर रहे होते हैं, उसके बारे में  बच्चों को पूरी जानकारी देनी पड़ती है। बच्चे क्या कर रहे हैं और कितना समझ रहे हैं, इसका भी कम ही पता चल पाता है।      

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शिक्षकों को अधिकतर पढ़ाई हुई चीजें दोबारा पढ़ानी पड़ रही है क्योंकि हर क्लास में बच्चों की संख्या मोबाइल फोन की उपलब्धता एवं इंटरनेट की स्पीड के अनुसार घटती – बढ़ती रहती है। इस नए प्रयोग में समय-समय पर और भी नई चीजें जोड़ी जा रही हैं। ऐसे में शिक्षकों के लिए सामंजस्य बिठा पाना और भी मुश्किल होता जा रहा है।

यह लेख अंजनी कुमारी द्वारा लिखा गया है, अंजनी भारतीय जनसंचार संस्थान नई दिल्ली में पत्रकारिता की छात्र हैं

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