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महामारी ने ‘तोड़ी’ जातीय रूढ़ियां लेकिन महामारी की जरूरत पड़ी ही क्यों?

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Priyanshu | Opinion

कोविड-19 कोई पहली महामारी नहीं है। महामारियों का अपना इतिहास है, लेकिन उन पर उतनी बात कभी नहीं होती जितनी युद्धों और साम्राज्यों पर होती है और ऐसा तब है जब महामारियों ने युद्ध भी कराए हैं और साम्राज्यों का पतन भी। महामारियों की छाप दूरगामी होती है और इनके साथ आई हुई अधिकांश चीजें अनचाही लेकिन सबकुछ खराब ही नहीं होता। जैसे 14वीं सदी के यूरोप में फैले प्लेग ने चर्च पर से लोगों का भरोसा हिलाकर रख दिया। अवैज्ञानिक निर्भरता कम हुई और लोग विज्ञान की तरह रुख करने लगे। आज के विकसित यूरोप के पीछे प्लेग की बड़ी भूमिका है। भारतीय गांवों में कोरोना वायरस ने जाति आधारित अछूतपन को फिलहाल के लिए दूसरे दर्जे पर ढकेल दिया है।

केंद्र में आई देह
पहले विश्व युद्ध के फौरन बाद स्पेनिश फ्लू ने दुनिया को जकड़ लिया। इससे भारत में तकरीबन 1.2 करोड़ लोगों की मौत हुई। इसने सामाजिक रूप से यहां पर क्या असर छोड़ा इस बारे में न के बराबर जानकारी है लेकिन कोरोनाकाल में गुजर रहे दिनों से अंदाजा लगा सकते हैं कि तब कितनी उथल-पुथल रही होगी। हम खुद भी देख रहे हैं और जो नहीं देख पा रहे उसका पता लगाने जी.बी पंत सोशल साइंस इंस्टिट्यूट की टीम गांवों में पहुंची। संस्थान के निदेशक प्रोफेसर बद्री नारायण कहते हैं कि, “कोरोना ने भारतीय समाज में जाति को थोड़ा पीछे ढकेल कर ‘संक्रमण की चिंता से ग्रसित देह’ को केंद्र में ला दिया है। जातीय भाव आधारित ऊंची-पिछड़ी और नीची जैसी कोटियां इस प्रक्रिया में या तो टूट रही हैं या आहत हो रही हैं।”

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लेकिन कब तक
महामारी खत्म हो जाने के बाद क्या होगा, क्या आछूतवाद ‘देह’ से निकलकर फिर ऊंच-नीच करने लगेगा? प्रो. बद्री नारायण कहते हैं कि, “संक्रमण का भय खत्म होते ही जातिगत रूढ़ियों में आई यह सकारात्मक टूट-फूट, लचीलापन खत्म हो जाएगा।” जब इसमें कुछ समय के लिए तोड़फोड़ भी महामारी के कारण आई हो, न कि स्वतः, उस देश से जातीय भेदभाव कैसे हमेशा के लिए खत्म होगा, कहना मुश्किल है। उस स्थिति में तो बिल्कुल भी नहीं, जब तक जातियां टूटकर बिखर नहीं जातीं लेकिन यह आगे भी तक जस की तस रहेंगी। कारण कई हैं।

ग्रेडेड इनिक्वॉलिटी
जातियों के चले आने का पहला और मुख्य कारण है, सगोत्रीय विवाह यानी अपनी-अपनी जाति के भीतर ही विवाह की व्यवस्था और दूसरा बड़ा कारण जिसे अंबेडकर ने ग्रेडेड इनिक्वॉलिटी (परतबद्ध असमानता) कहा है। ग्रेडेड इनिक्वॉलिटी में ब्राह्मण सर्वोच्च हैं। इनके नीचे उच्च (क्षत्रिय) होते हैं। उच्च के नीचे कम उच्च (वैश्य) हैं, कम उच्च के नीचे निम्न (शुद्र) हैं और निम्न के नीचे निम्नतम (अछूत) होते हैं।

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जो सर्वोच्च है उसके खिलाफ सबकी शिकायतें हैं। उसे सब ध्वस्त करना चाहते हैं लेकिन वे कभी आपस में एकजुट नहीं होते। जो उच्च है वह सर्वोच्च से छुटकारा पाना चाहता है लेकिन कम उच्च, निम्न और निम्नतम से हाथ नहीं मिलाना चाहता। उसे डर है कहीं वह भी उनके स्तर पर आकर उनके समान न हो जाए।

जो कम उच्च है वह सर्वोच्च और उच्च को उखाड़ फेंकना चाहता है लेकिन निम्न और निम्नतम से हाथ नहीं मिलाना चाहता क्योंकि उसे डर है कि कहीं वो भी उनकी हैसियत में आकर उनके बराबर न हो जाए। जो निम्न हैं वह सर्वोच्च, उच्च और कम उच्च को गिरा देना चाहता है लेकिन वह इस भय से निम्नतम से हाथ नहीं मिलाना चाहता कि कहीं वह भी उनके साथ आकर उन जैसा न हो जाए।

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सबके पास कुछ न कुछ अधिकार हैं सिवाय सबसे निचले पायदान पर खड़े निम्नतम को छोड़कर। इसलिए हर वर्ग कहीं न कहीं जाति व्यवस्था को बनाए रखना चाहता है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक नई दिल्ली स्थित भारतीय जन संचार संस्थान के पूर्व छात्र हैं और अमर उजाला, पत्रिका जैसे संस्थानों में काम कर चुके हैं।)

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