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क़ानूनी साज़िश के तहत तोड़ा गया है संत रविदास मंदिर?

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नेहाल रिज़वी, नई दिल्ली: आस्था और अदालत के बीच जनता किसको चुनती है? ज़ाहिर है, जनता आस्था के साथ ही जाएगी. 1992 में भी जनता ने आस्था और अदालत के बीच आस्था को ही चुनते हुए बाबरी मस्जिद को गिरा दिया था. संत रविदास के मंदिर को तोड़ने का मुद्दा भारतीय मीडिया से बिल्कुल ग़ायब है. मानों, किसी ने आदेश जारी किया हो कि संत रविदास का मुद्दा मीडिया की बहस का हिस्सा न बनने पाए. दिल्ली के रामलीला मैदान में लाखों की संख्या में दलितों के प्रदर्शन को मीडिया द्वारा नकारना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है.

आस्था और अदालत के बीच उलझता मामला

सुप्रीम कोर्ट ने जैसे ही दिल्ली के तुग़लकाबाद में बने दलितों के पूजनीय संत रविदास के मंदिर को गिराने का आदेश दिया, दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने बिना वक्त गवाएं उस मंदिर को गिराने में भी देर नहीं की और बीते 10 अगस्त को मंदिर को गिरा दिया. मंदिर के गिरते ही तमाम दलित संघटनों ने मंदिर को दोबारा से वहीं पर स्थापित करने की मांग को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन करना शुरू कर दिए हैं. भीम आर्मी के नेता ‘चन्द्रशेखर’ की अगवाई में दिल्ली के रामलीला मैदान में किय गए एक बड़े प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया, जिसके बाद चन्द्रशेखर समेत कई नेताओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. मामले का अब राजनीतिकरण भी होने लगा है.

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पंजाब के सी.एम अमरिंदर सिंह ने भी नरेंद्र मोदी से इस मामले में हस्ताक्षेप की जल्द से जल्द मांग की है. दिल्ली में में इसे लेकर भूचाल मचा हुआ है. इसकी वजह ये है कि दिल्ली में दलित खासी संख्या में हैं. दिल्ली में दलितों की कुल आबादी लगभग 17 प्रतिशत है. मीराबाई भक्तिकालीन संत कवि रविदास को अपना गुरू मानती थीं. उनकी कुछ रचनाओं का संपादन सिखों के गुरू अर्जुन देव ने किया है जिन्हें गुरु ग्रंथ साहिब में स्थान दिया गया है. इसलिए रविदास मंदिर के गिराए जाने पर पंजाब में रोष देखा गया है. दिल्ली में दलितों को पंजाबियों का भी भरपूर साथ मिला हुआ है.

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कौन थे संत रविदास औऱ कितना गहरा है दलितों से उनका रिश्ता?

संत रविदास के जन्म का कोई लिखित प्रमाण तो नहीं मिलता मगर मान्यताओं के अनुसार संत रविदास का जन्म 1433 में यूपी के बनारस में हुआ था. मान्यता है कि रविदास अपना जीवन यापन करने के लिय जूते बनाने का काम करते थे. निचले तबके के लोग उनके विचारों से बहुत ही प्रेरित हैं. दलितों के लिय वे भगवान से कम नहीं है. अमृतपाल कहते हैं, ‘मंदिर में जब कोई कुष्ठ रोगी आता था तो वो संत रविदास जी के आशीर्वाद से ठीक हो जाता था. रविदास जी का आशिर्वाद हमारे लिय अमृत का रूप है’. दलितों से संत रविदास का लगाओ बहुत ही गहरा है. दिल्ली में संत रविदास के काफी मंदिर भी बने हुए हैं.

मंदिर को लेकर क्या है पूरा मामला

इस पूरे विवाद की वजह नई दिल्ली के तुगलकाबाद में स्थित 15वीं सदी के महान संत रविदास का एक मंदिर है जिसे अब डीडीए ने तोड़ दिया. ऐसी मान्यता है कि ये मंदिर जहां स्थिति था वहां संत रविदास तीन दिनों तक रुके थे. कोर्ट के दस्तावेजों के मुताबिक तुगलकाबाद में मौजूद ये परिसर 12,350 स्क्वॉयर यार्ड का है जिसमें 20 कमरे हैं और एक बड़ा हॉल भी है.

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डीडीए का दावा है कि मंदिर अवैध तरीके से कब्ज़ा की गई ज़मीन पर बना था. मामले में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एम आर शाह ने नौ अगस्त को सबसे ताज़ा सुनवाई की. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस के मुखिया और दिल्ली सरकार के सचिव को ये सुनिश्चित कराने का आदेश दिया था कि 13 अगस्त से पहले मंदिर गिरा दिया जाए. 10 अगस्त को मंदिर गिरा दिया गया.

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‘मंदिर वही बनायेगें’!

ये नारा आप 1992 से सुनते आ रहे हैं और इसको सुनते ही आप राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद वाले मसले पर सोचने लगते होंगे, मगर ऐसा नहीं है. यहां दलितों ने भी यही नारा दोहराना शुरू कर दिया है कि ‘मंदिर वहीं बनायेगें’, अब ये कितने दिन चलेगा ये तो वक़्त बताएगा.

दिल्ली में संत रविदास के मंदिर को क़ानूनी तौर पर गिराया गया है. दलितों के आंदोलन से क्या सुप्रीमकोर्ट के फ़ैसले पर कोई असर पड़ने वाला है, ऐसा अभी दिखता तो नहीं है. आम आदमी पार्टी ने चुनाव को देखते हुए इस मामले पर दलितों की तरफ़ झुकना शुरू कर दिया है. उधर दिल्ली बीजेपी में इसको लेकर हलचलें तेज़ होती जा रही हैं. अब ये आंदोलन का रूप कितना बड़ा होता है ये आने वाला वक़्त बता देगा. फ़िलहाल इस मामले पर राजनीति शुरू हो चुकी है.

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