मीडिया के चरित्र का असली चेहरा दिखाती है मंटो की ये कहानी..’आओ अख़बार पढ़ें’!

Sharing is Important
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

ग्राउंड रिपोर्ट । नेहाल रिज़वी

जो कहानियों से ज्यादा सच लिखा करता था, जो भाषा को प्रभावी तरीके से लिखने में कम और सच, सटीक और वास्तव में बोले जाने वाले लफ़्ज़ों को लिखने में विश्वास करता था, फिर चाहे वो कोई गाली ही क्यों न हो? अपनी बेबाकी के लिए कुल 6 बार जेल भी जा चुका ये लेखक कोई और नहीं सआदत हसन मंटो ही है। इनकी लेखनी जब भी चलती थी, समाज का सच्चा चेहरा ही सामने लाती थी, फिर चाहे वो कितना ही खूबसूरत हो या कितना ही घिनौना हो।

“मैं सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा, जो है ही नंगी. मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश नहीं करता, क्योंकि यह मेरा काम नहीं, दर्ज़ियों का काम है.”

सआदत हसन मंटो

ज़िंदगी भर अपने लिखे हुए के लिए कोर्ट के चक्कर लगाने वाले, मुफ़लिसी में जीने और समाज की नफ़रत झेलने वाले मंटो। गुज़रे समय मंटो ने लिखा था कि मैं ऐसे समाज पर हज़ार लानत भेजता हूं जहां यह उसूल हो कि मरने के बाद हर शख़्स के किरदार को लॉन्ड्री में भेज दिया जाए जहां से वो धुल-धुलाकर आए।

कितने भी मुकदमों से इनको रोकने की कोशिश कर ले, मैं इन कहानियों को लिखना बंद नहीं करूंगा, मैं सच लिखना बंद नहीं करूँगा। अगर मेरे किस्सों कहानियों से इतनी ही तकलीफ है तो समाज बदल लो, मैं समाज लिखता हूँ, मैं सच लिखता हूँ, नमाज-पूजा पाठ करोगे तो वो लिखूंगा और वेश्याओं के यहाँ जाता कोई दिखेगा तो वो लिखूंगा। मैं अपनी आँखें बंद कर भी लूँ? पर अपने ज़मीर का क्या करूं?

सआदत हसन मंटो

मंटो सभ्यता और संस्कृति के ठेकेदारों की नज़र में जहां एक तरफ समाज के मुजरिम थे तो वही इसी सभ्य समाज की बनाई गई अदालतों में वो सिर्फ समाज की नंगी सच्चाइयों पर लिखने वाले एक कहानीकार थे। मंटो ने ताउम्र मजहबी कट्टरता के खिलाफ लिखा, मजहबी दंगे की वीभत्सता को अपनी कहानियों में यूं पेश किया कि आप सन्न रह जाए। उनके लिए मजहब से ज्यादा कीमत इंसानियत की थी।

मंटो ने लिखा, “मत कहिए कि हज़ारों हिंदू मारे गए या फिर हज़ारों मुसलमान मारे गए। सिर्फ ये कहिए कि हज़ारों इंसान मारे गए और ये भी इतनी बड़ी त्रासदी नहीं है कि हज़ारों लोग मारे गए। सबसे बड़ी त्रासदी तो ये है कि हज़ारों लोग बेवजह मारे गए।

हज़ार हिंदुओं को मारकर मुसलमान समझते हैं कि हिंदू धर्म ख़त्म हो गया लेकिन ये अभी भी ज़िंदा है और आगे भी रहेगा। उसी तरह हज़ार मुसलमानों को मारकर हिंदू इस बात का जश्न मनाते हैं कि इस्लाम ख़त्म हो चुका। लेकिन सच्चाई आपके सामने है। सिर्फ मूर्ख ही ये सोच सकते हैं कि मजहब को बंदूक से मार गिराया जा सकता है।

सआदत हसन मंटो

सआदत हसन मंटो की रचना यात्रा उनकी कहानियों की तरह ही बड़ी ही विचित्रता से भरी हुई है। एक कहानीकार जो जालियांवाला बाग कांड से उद्वेलित होकर पहली बार अपनी कहानी लिखने बैठता है वो औरत-मर्द के रिश्तों की उन परतों को उघाड़ने लगता है जहां से पूरा समाज ही नंगा दिखने लगता है।

‘ठंडा गोश्त’ जिस पर उस दौर में अश्लीलता का मुकदमा किया गया था, क्या उस कहानी का विरोध सिर्फ इसलिए हो रहा था क्योंकि वह कहानी लोगों की नजर में अश्लील थी? या फिर इसलिए कि इसर सिंह और कुलवंत के बीच ‘खेले जा रहे पत्तों को’ मंटो ने अपने शब्द दे दिए थे? इस कहानी में 2 लोगों के बीच बनते शारीरिक संबंध के दौरान हुई बातों, हरकतों को मंटो ने बेहद उम्दा तरीके से बयां किया जो इस तथाकथित सभ्य समाज के खांचे में फिट नहीं बैठा और उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया गया।

मंटो ने ख़ुद के बारे में यह कहा, “ऐसा होना मुमकिन है कि सआदत हसन मर जाए और मंटो ज़िंदा रहे।”

सआदत हसन मंटो

जब आप मंटो की कहानियों से होकर गुजरते हैं तो पाते हैं कि ये सब हमारे आस-पास हर रोज हो रहा है जिसे मंटो ने कहानियों के किरदारों के रूप में ढाल दिया। वेश्या, सेक्स, बंटवारा, शादी, रिश्ते, मोहब्बत जैसी चीजें हमसे ही जुड़ी हैं और इन मुद्दों पर वैसे का वैसा ही लिख देने पर मंटो को अश्लील लेखक के तमगे से नवाज दिया गया।

मंटों की कई कहानियों में वेश्याओं का जिक्र आता है। मंटो कहते हैं कि क्या वेश्याएं हमारे मआशरा का हिस्सा नहीं हैं? वे हैं तभी मैं लिखता हूं। जिन वेश्याओं को अंधेरे तले हम सिर्फ उपभोग की वस्तु समझते हैं और दिन के उजाले में हिकारत भरी नजरों से देखते हैं उनके बारे में मंटो ने खूब लिखा। औरतों का एक अलग रूप मंटो ने पेश किया। इस ‘बदनाम’ लेखक ने हाशिए औरतों को अपनी कहानी में इंसान के रूप में पेश किया। मंटो की कहानियों में औरतें दबी-कुचली नहीं नजर आती थीं। उनके अपने विचार होते थे, मंटो की कहानियों की औरतें सेक्स की इच्छा से लेकर अपने प्रेम पर खुलकर बातें करती नजर आती हैं।

सआदत हसन मंटो (11 मई 1912–18 जनवरी 1955) का जन्म ज़िला लुधियाना के गाँव पपड़ौदी (समराला नज़दीक) में हुआ। उनके पिता गुलाम हसन मंटो कश्मीरी थे। मंटो के जन्म के जल्द बाद वह अमृतसर चले गए।मंटो की प्राथमिक पढ़ाई घर में ही हुई। 1931 में उन्होंने मैट्रिक पास की और उसके बाद हिंदु सभा कालेज में एफ ए में दाख़िला लिया। वह प्रसिद्ध उर्दू कहानीकार थे। उन की शाहकार कहानियाँ हैं ; टोबा टेक सिंह, बू, ठंडा गोश्त, खोल दो । मंटो के बाईस कहानी संग्रह, पाँच रेडियो नाटक संग्रह, एक उपन्यास, तीन निजी स्कैच संग्रह और तीन लेख संग्रह छपे हैं।

जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड की मंटो के मन पर गहरी छाप थी। इसको लेकर ही मंटो ने अपनी पहली कहानी ‘तमाशा’ लिखी थी। उनकी रचनायें हैं: आतिशपारे; मंटो के अफसाने; धुआँ; अफसाने और ड्रामे; लज्जत-ए-संग; सियाह हाशिए; बादशाहत का खात्मा; खाली बोतलें खाली डिब्बे; लाउडस्पीकर (सकैच); ठंडा गोश्त; सड़क के किनारे; यज़ीद; पर्दे के पीछे; बगैर उन्वान के; बगैर इजाजत; बुरके; शिकारी औरतें; सरकंडों के पीछे; शैतान; ‘रत्ती, माशा, तोला’; काली सलवार; नमरूद की ख़ुदायी, गंजे फ़रिशते (सकैच), मंटो के मज़ामीन, सड़क के किनारे, मंटो की बेहतरीन कहानियाँ।

मीडिया के चरित्र का असली चेहरा दिखाती है मंटो की ये कहानी..’आओ अख़बार पढ़ें’!

लाजवंती: (बड़े इश्तियाक़ भरे लहजे में) आओ अख़बार पढ़ें ! (काग़ज़ की खड़खड़ाहट) किशवर: (चौंक कर) क्या कहा ? लाजवंती: कह रही हूँ आओ अख़बार पढ़ें! किशवर: पढ़ो पढ़ो ज़रूर पढ़ो । शुक्र है कि तुम्हें कुछ पढ़ने का शौक़ पैदा हुआ । लाजवंती: जी । गोया मैं बिलकुल अन-पढ़ हूँ अलिफ़ का नाम भला नहीं जानती आज दिन तक घास ही छीलती रही हूँ ।किशवर: अरे भई तुमसे ये किस ने कहा है तुम सब कुछ जानती हो। इस से किसे इनकार है मैंने तो सिर्फ ये कहना चाहा था कि अख़बार पढ़ने का शौक़ बड़ा अच्छा होता है । दुनिया-भर की ख़बरें घर बैठे मालूम हो जाती हैं । अभी तुमने अख़बार पढ़ने का इरादा ज़ाहिर किया तो मुझे बड़ी ख़ुशी हुई । लाजवंती: जाने भी दो क्यों झूट बोलते हो तुम्हें ख़ुशी हुई । ज़रूर हुई होगी अगर तुम्हारी तरह मैं भी सुब्ह-सवेरे उठ कर ये मुआ अख़बार पढ़ना शुरू कर दूं तो देखूं जनाब की ख़ुशी कहाँ रहती है । ख़ुद तोस सेंकने दूध उबालना और चाह का पानी बनाना पड़ जाये तो ये अख़बार इस घर में कभी नज़र आएं । दिन-ब-दिन अंग्रेज़ ही बनते जाते हो ।

शवर: ये अंग्रेज़ बनते चले जाने की भी एक ही कही खाना खाने के बाद सिगरट पिए वो तुम्हारे नज़दीक अंग्रेज़ जो शेव करने के बाद थोड़ा सा पाउडर चेहरे पर मल ले वो भी अंग्रेज़ हैट लगाया तो अंग्रेज़ ज़रा बातचीत में दो एक शब्द भूले से अंग्रेज़ी के बोल दीए वो भी अंग्रेज़ । अब नाशते पर अख़बार पढ़ने वाला भी अंग्रेज़ । चलो भई अंग्रेज़ ही सही ये गाली थोड़ी है जो चिड़ जाऊं । वो तुम ही हो जो इस रोज़ मुझ पर बिगड़ गई थीं । जब मैंने तुम्हें मेम कहा था । लाजवंती: मेम हो कोई तुम्हारी होती सोती में क्यों मेम बनूँ । ये मोई लाल मुँह वाली बंदरियाँ तुम्हें पसंद थीं तो मुझसे ब्याह करने की ज़रूरत क्या आन पड़ी थी किसी ने तुमको मजबूर थोड़ी किया था किसी ऐसी वैसी को पकड़ कर घर में बसा लिया होता । आज उन झगड़ों की नौबत तो ना आती । किशवर: तुम अख़बार पढ़ने वाली थीं । लाजवंती: मैं परमात्मा जाने क्या-क्या करने वाली थी पर इस घर में आते ही ऐसे जंजाल में फंसी कि सब कुछ भूल गई कभी बीते हुए दिनों को याद करती हूँ तो बे-इख़्तियार आहें निकल जाती हैं । मैं समझी थी कि मेरे सारे सपने इस घर में पूरे हो जाऐंगे । पर जो भाग में लिखा है वो कैसे मिट सकता है ।

किशवर: (हमदर्दी भरे लहजे में) सब के साथ ऐसा होता आया है लाजवंती । शुरू शुरू में ये ज़िंदगी बड़ी अच्छी मालूम होती है लेकिन जब बाल बचे पैदा हो जाते हैं और जब दूसरे दुख दर्द शुरू हो जाते हैं तो एक थकावट महसूस होती है पर ये भी तो हमारे जीवन का एक रंग है सुख ही सुख हो तो क्या मज़ा । मीठा ज़्यादा हो जाये तो मन को नहीं भाता । ज़बान को कड़वा मालूम होने लगता है । मैं तो ये कहता हूँ कि ऐसी बातों पर ध्यान ही नहीं देना चाहीए । चलो अख़बार पढ़ें । लाजवंती: सर्द आह भर कर आओ अख़बार ही पढ़ें ।किशवर: तुम पढ़ो मैं सुनूँगा ।लाजवंती: मेरी आँखें बहुत कमज़ोर हो गई हैं तुम पढ़ो मैं सुनती रहूंगी । किशवर: (अख़बार उठाने और वर्क़ गरदानी करने की आवाज़) पहले कोई दिलचस्प ख़बर ढूंढ लूं । ये तो सब बेकार हैं जर्मनी और इटली के डिक्टेटरों की ख़बरें हैं । । ये सारा कालम हिटलर की बकवास से भरा पड़ा है और ये कालम ।


लाजवंती: ज़रा ठहरो तो । ये मुआ हिटलर है कौन? । बड़ा चर्चा हो रहा है आजकल उस का परसों धोबी धुलाई लेकर आया तो कहने लगा । सरकार बस इसे आख़िरी धुलाई समझिए । सब घाटों पर थोड़ी ही देर में हिटलर का क़बज़ा हो जाएगा । क्या ये हिटलर ज़ात का धोबी है? किशवर: धोबी ? । नहीं नहीं वो तो अच्छा भला इन्सान है यानी यानी । जर्मनी का डिक्टेटर । जानती हो डिक्टेटर किसे कहते हैं? लाजवंती: डकटेटर । एडीटरों और एक्टरों की किस्म का कोई आदमी होगा? तुम ही बता दो ना ये कौन होते हैं? किशवर: डिक्टेटर उस आदमी को कहते हैं । ठहरो मैं तुम्हें मिसाल दे कर समझाता हूँ ये हमारा घर है इस में तुम हो हमारा मुना है दुरगा नौकरानी है । मेरे पिता जी हैं माता जी हैं और मैं हूँ । ये सब लोग मुझे बड़ा मानते हैं । इस लिए कि घर का इंतिज़ाम मैं करता हूँ पर मैं सबकी राय लेकर काम करता हूँ अब अगर कल से मैं इस घर में सिर्फ अपना ही हुक्म चल्लाना शुरू कर दूँ और सबसे अपना कहा मनवाना शुरू कर दूँ तो मैं वो नहीं रहूँगा जो पहले था ठीक है ना?लाजवंती: ठीक है ।

किशवर: बस यूं समझ लू कि मैं डिक्टेटर बन जाऊँगा और जब मैं डिक्टेटर बन जाऊँगा तो मुझे इस बात का अधीकार होगा कि आलूओं को टमाटर कहना शुरू कर दूं, टमाटरों को घड़ियाँ और घड़ियों को दवातें कहने लगूँ । सुबह का नाशतादान रात के बारह बजे हो डिनर सुबह को खाया जाये, लंच रात को हो चाय में सकंजबी मिला कर पी जाये सालन पहले खाया जाये और रोटी बाद में। लाजवंती: क्या पागल ख़ानों में क़ुफ़ुल लगवा दोगे ? किशवर: अब क्या लोगों ने इन तमाम डिक्टेटरों को पागलखाने भिजवा दिया है जिनका हाल हर-रोज़ अख़बारों में छपता है । अरी बाओली डिक्टेटर बहुत बड़ा आदमी होता है बहुत बड़ा आदमी वो दिन कहे तो दिन रात कहे तो रात । परजा को इस की हर बात मानना ही पड़ती है । मैंने घर की मिसाल इसी लिए दी थी कि तुम जल्दी समझ जाओ ।

लाजवंती: सब समझ गई हूँ ये अख़बार पढ़ पढ़ कर अब तुम भी इस घर में हिटलर बनना चाहते हो पर मुझसे सन लो तुम्हारी डिक्टेटरी यहां ना चल सकेगी । जिस दिन तुमने आलूओं को टमाटर कहा और टमाटरों में कूओक भरना शुरू की मैं अपने मुने को लेकर यहां से चल दूँगी मुझसे ये पागलपन ना देखा जाएगा । किशवर: लाजवंती तुमने ये कैसे सोच लिया कि मैं इस घर में डिक्टेटर बन सकता हूँ । इस जर्मनी का हिटलर तो सिर्फ तुम ही हो । मैं तो जी हुज़ूरी हूँ । आँखें बंद किए सब हुक्म मानता रहता हूँ लाजवंती: सब हुक्म मानते रहते हो । तुमने कहा और मैंने मान लिया । शादी के दो दिन बाद जब मैंने तुमसे कहा था कि नाथ मैं तुमसे इल्तिजा करती हूँ ये सिगरट पीना छोड़ दो तो याद है तुमने मुझसे कहा था? लाज प्यारी तुम मुझे हुक्म दे सकती हो ये इल्तिजा कैसी? सिगरट क्या मैं तुम्हारी ख़ातिर अपनी अज़ीज़ से अज़ीज़ चीज़ छोड़ सकता हूँ? । और इस वक़्त तुम्हारे मुँह से धुएँ के ये बादल जो निकल रहे हैं क्या बताते हैं? हमारी शादी को चार बरस गुज़र चुके हैं ज़रा हिसाब कर के बताओ तो कितने सिगरट अब तक पी चुके हो? । किशवर: सिगरट की क्या बात करती हो लाज ? पिया पिया ना पिया । तुम तो मामूली से मामूली बात भी ले बैठती हो ।

लाजवंती: सिगरट पीना मामूली बात हुई तो कभी कभी विसकी और बेअर पीने में क्या हर्ज है इन मोई एक्ट्रसों के यहां जाने में क्या मज़ाइक़ा है बरिज और रेस खेलने से किया होता है । बाहर ही बाहर दोस्तों के साथ गुलछर्रे उड़ाने से किया बिगड़ता है? कुछ भी नहीं बेचारी इस्त्री घर में पड़ी घुलती रहती है । इस से ज़्यादा और हो भी किया सकता है? जाने दो अब मुझसे उन मामूली बातों की फ़हरिस्त ना बनवाओ । चलो आओ अख़बार पढ़ें! किशवर: अख़बार । हाँ अब अख़बार पढ़ना ही पड़ेगा । लाजवंती: अगर नहीं जी चाहता तो छोड़ दो ।

किशवर: नहीं नहीं जी क्यों नहीं चाहता अभी पढ़ते हैं । मैं ये सोच रहा था कि तुम्हें मुझसे बिलकुल प्रेम नहीं है तुम्हारे लिए मैंने हमसाइयों से लड़ाई मोल ली । अपने रिश्तेदारों को छोड़ा आप ग़ुलामी का तौक़ पहन लिया । मोटर बेच दी कि तुम्हारी चूड़ियां बन जाएं सर्दीयों में मैं हमेशा हिन्दुस्तानी दवाखाने का बना हुआ हलवा खाया करता था । पर इस साल मैंने वो भी ना लिया कि तुम अपनी सहेलीयों की दावत कर सको । मैंने इतनी क़ुर्बानियां कीं पर तुम्हारा प्रेम । वो प्रेम जो मर्द के दिल की ग़िज़ा है अभी तक मुझे नहीं मिला । परमात्मा के लिए मुझे आज ये तो बता दो कि मैं तुम्हारा प्रेम किस क़ीमत पर ख़रीद सकता हूँ । (बाहर से आवाज़ करती है । एक आने में । एक आने में) किशवर: ये कौन बोला ? लाजवंती: ये किस ने कहा ? (बाहर से फिर आवाज़ आती है । आज का ताज़ा अख़बार । एक आने में । एक आने में किशवर: (हँसता है) लाजवंती: (हँसती है) किशवर: मैं हैरान हो गया था कि एक आने में तुम्हारा प्रेम कैसे मिल सकता है । लाजवंती: मिल सकता है । लाओ एक आना किशवर: क्या करोगी ? लाजवंती: अख़बार खरीदूँगी । ज़रा गर्मा गर्म ख़बरें पढ़ें । जल्दी निकालो एक आना कहीं वो चला ना जाये । किशवर: ये लो । लाजवंती: अरे ओ छोकरे । ज़रा ठहरीयो । ज़रा ठहरीयो । (दरवाज़ा खुलने की आवाज़) किशवर: (अपने आपसे) एक आने में । एक आने में । मगर किया? । आज का ताज़ा अख़बार । गर्मा गर्म ख़बरों से भरा हुआ । मेरी लाजवंती क्या कम गर्म है । लेकिन आज की ताज़ा लाजवंती क़दरे ठंडी मालूम होती है । (दरवाज़े की आवाज़ । साथ ही काग़ज़ की खड़खड़ाहट) लाजवंती: ले आई हूँ धड़ा धड़ बिक रहे थे मालूम होता है बड़े हंगामे की बातें लिखी हैं । लो पढ़के सुनाओ पर ज़रा हौले हौले पढ़ना । किशवर: लाओ । देखते हैं क्या लिखा है? (काग़ज़ की खड़खड़ाहट)

लाजवंती: अब देखना क्या शुरू करोगे । पढ़ते चले जाओ । सारा अख़बार ख़बरों ही से तो भरा है । तौबा इतना भी गुमान ना होना चाहीए अपनी लियाक़त पर । मेरी ऐनक की कमानी ठीक नहीं है वरना मैं ख़ुद ही पढ़ लेती । और हाँ ये तो बताओ कि ये मेरी ऐनक की कमानी कब ठीक करा दोगे, परमात्मा झूट ना बुलवाए तो हज़ार एक-बार तुमसे कह चुकी हूँ कि उसे ले जाओ मुरम्मत के लिए पर हज़ार बार तुम उसे यहीं छोड़ गए । देखा आप ही आप क्या मज़े ले-ले कर पढ़ रहे हो । ज़रा मुँह से बोलते जाओ तो तुम्हारा कुछ घस तो नहीं जाएगा । किशवर: क्या कहा? लाजवंती: गोया मैंने कुछ कहा ही नहीं तुम्हारा सारा ध्यान तो इस अख़बार में पड़ा है सुनोगे क्या ख़ाक । मैंने ये अख़बार तुम्हारे लिए नहीं ख़रीदा पढ़ो और मुझे सुनाओ । किशवर: तुम्हारे मतलब की कोई ख़बर तो ढूंढ लूं ।लाजवंती: नहीं नहीं ढ़ूढ़ने वूँढने की कोई ज़रूरत नहीं तुम कोई सी ख़बर पढ़ कर सुनाना शुरू कर दो सभी मेरे मतलब की हैं मैं तुम्हारी सब चालाकियां जानती हूँ सारा अख़बार ढूँढते ढूंडते पढ़ लोगे और आख़िर में ये चचोड़े हुए काग़ज़ मेरे सर मार कर कलब चले जाओगे । चलो पढ़ो । किशवर: लो सुनो । मियां ने बीवी की नाक काट दी। लाजवंती: क्या?

किशवर: बीच में बोलो नहीं सुनती चली जाओ । क़सूर: ग्यारह जून । हमारा नामानिगार लिखता है कि दिन-दहाड़े एक शख़ज़ मुसम्मा गंडा सिंह ने अपनी बीवी की नाक उसतरे से काट दी । इस ज़ालिमाना फे़अल की वजह ये बयान की जाती है कि इस की बीवी अनंत कौर बड़ी झगड़ालू किस्म की औरत थी । वो हरवक़त गंडा सिंह से लड़ती रहती थी जिससे वो आजिज़ आ गया था एक रोज़ उसने रोज़ रोज़ के झगड़े से तंग आकर उस की नाक उसतरे से काट दी । लाजवंती: झूट । बिलकुल झूट! किशवर: अख़बार तुम्हारे सामने है । ये रही सुर्ख़ी । तुम ऐनक के बग़ैर भी पढ़ सकती हो । मियां ने बीवी की नाक काट दी । और यहां से ख़बर शुरू होती है । क़सूर: ग्यारह जून ।
लाजवंती: कोई और ख़बर पढ़ो । किशवर: क्यों ये पसंद नहीं आई?

लाजवंती: नहीं ये बात नहीं । ये तो पढ़ चुके अब कोई और पढ़ो या अब बार-बार यही पढ़ कर सुनाने का ख़्याल है । जंगली आदमीयों को लड़ने मरने के सिवा और काम ही किया होता है । पर तुम मेरी तरफ़ ऐसी गहरी नज़रों से क्यों देख रहे हो । किशवर: नहीं तो । मैं ये सोच रहा था कि बेचारे गंडा सिंह ने बड़ी मजबूरी की हालत में अपनी प्यारी बीवी की नाक काटी होगी । इस के बाद में कितना दुख हुआ होगा । लाजवंती: प्यारी बीवी और इस का प्यारा ख़सम । भाड़ में जाएं दोनों । पर तुम मेरी नाक की तरफ़ क्या देख रहे हो । किशवर: कितनी ख़ूबसूरत नाक है? । इस पर ये नन्हा सा तिल कितना भला मालूम होता है । (खाँसने की आवाज़ आती है । (निरावन की आमद) किशवर: निरावन । निरावन: हाँ भई निरावन ही है पर तुम्हें क्या हो गया है जो हरवक़त अपनी बीवी की तारीफ़ करते रहते हो बड़ी अच्छी हैं लाखों में एक हैं । नमस्कार भाई जान ।
लाजवंती: नमस्कार ।

निरावन: आप उकताती नहीं हैं उनके मुँह से हर-रोज़ अपनी तारीफ़ सुनते सुनते? लाजवंती: तारीफ़ काहे की? । वो तो ।निरावन: अजी छोड़ीए मैं सब जानता हूँ ये औरतों की कमज़ोरी है । वो अपनी तारीफ़ से बहुत ख़ुश होती हैं । हम मर्दों में बेशुमार कमज़ोरियाँ हैं । मिसाल के तौर पर । ये क्या ? आज मेज़ पर इतने अख़बार कहाँ से आ गए ? किशवर: एक तुम्हारी भाबी ने ख़रीदा है दो मैं लाया था । निरावन: क्या लिखते हैं ये? । बाहर की दुनिया में क्या हो रहा है? (अख़बार पकड़ने और खोलने की आवाज़) यूरोप के आसमान पर जंग के स्याह बादल लीग आफ़ नेशन मैदान-ए-अमल में (हँसता है) । ये लीग आफ़ नेशन क्या बला है मेरी समझ में अभी तक नहीं आया । किशवर: तुम लीग आफ़ नेशन नहीं जानते तो अख़बार को हाथ में लिया ही क्यों था? । लाजवंती: जैसे दुनिया-भर की चीज़ें यही जानते हैं । सारी हिकमतें सिर्फ इनकी ही दिमाग़ में जमा हैं । भला बताईए तो लीग आफ़ नेशन किसे कहते हैं ।

किशवर: लीग आफ़ नेशन को । यानी । क़ौमों की जमईयत को । समझती हो जमईयत किसे कहते हैं । संगत को । पर ये तो इस से भी मुश्किल है । ठहरो मुझे कोई सहल सा लफ़्ज़ सोचने दो । लीग आफ़ नेशन । देखो । ये एक ऐसी पंचायत है जिसमें हर मुलक के आदमी शामिल होते हैं अगर कहीं झगड़ा फ़साद हो जाये तो ये एक जगह जमा हो कर उस का फ़ैसला करते हैं । लाजवंती: और अगर उनका आपस ही में झगड़ा हो जाये तो? किशवर: तुम्हें हर जगह झगड़ा ही झगड़ा नज़र आता है । गंडा सिंह और अनंत कौर का क़िस्सा भूल गई हो? निरावन: अरे लीग आफ़ नेशनज़ में ये गंडा सिंह और अनंत कौर कहाँ से आ गए । क्या ये लीग में हिन्दोस्तान के नुमाइंदे हैं? किशवर: नहीं तुम्हारी तो हर बात उलटी होती है ।निरावन: देखिए भाबी जान ये आपके बारे में क्या कह रहे हैं । किशवर: परमात्मा के लिए झूट ना बोलो निरावन । वो समझेंगी मैंने ये उनकी बाबत ही कहा है अच्छी तरह वाक़िफ़ हो उनकी तबीयत से फिर ख़्वाह-मख़ाह ऐसी छेड़ख़ानी से फ़ायदा? निरावन: हूँ । ठीक है ठीक है (वर्क़ उलटने की आवाज़) । ये ख़बर पढ़ी तुमने । लाजवंती: Disarmament के मुताल्लिक़ एक बहुत भारी कान्फ़्रैंस हो रही है । लाजवंती: Disarmament किया हुआ निरावन साहिब । लीग आफ़ नेशनज़ की किस्म की मालूम होती है ।

निरावन: जी हाँ । किशवर से पूछिए वो आपको अच्छी तरह समझा देगा । किशवर बताओ भई उन्हें ये Disarmament कान्फ़्रैंस क्या होती है । लाजवंती: आप क्यों नहीं बताते? निरावन: किशवर अच्छी तरह समझा सकेगा । इस लिए कि वो कई बार आपके मुक़ाबले में हथियार फेंक चुका है ।
लाजवंती: क्या कहा आपने? किशवर: कुछ भी नहीं निरावन ने कुछ नहीं कहा वो दूसरे हथियारों की बात कर रहा था । हाँ भई क्या पूछते हो । निरावन: ये पूछ रही हैं कि ये कान्फ़्रैंस क्या होती है । किशवर: Disarmament के मअनी हैं बंदूक़ों तोपों और इस चीज़ को जो जंग में हथियार के तौर पर काम आ सके अलैहदा कर देना । ये कान्फ़्रैंस जिसका ज़िक्र तुमने अभी अभी अख़बार में पढ़ा है जंग व जदाल कम करने के लिए मुनाक़िद हो रही है । इस में ये फ़ैसला किया जाएगा कि हर मुलक को कितने कितने हथियार अपने पास रखना चाहिऐं । इस से एक दूसरे को ख़तरा ना रहेगा । निरावन: वो कैसे? फ़र्ज़ कर लिया जाये कि हम यानी मैं भाबी और तुम तीन मुल्क हैं । अलग अलग लेकिन हमारी सरहदें आपस में मिलती हैं । अब भाबी जान के पास लोहे का एक क्रोशिया है और तुम्हें डर है कि किसी रोज़ मुन्ने का बिब् बुनते बुनते अगर ये बिगड़ गईं तो क्रोशिया तुम्हारे पेट में भोंक देंगी उस का फ़ैसला किया होगा?

किशवर: तहदीद-ए-असलाह यानी हथियार रोक कान्फ़्रैंस बैठेगी और इस पर सोच बिचार किया जाएगा । फ़ैसला मेरे ख़्याल में यही होगा कि मुझे बाज़ार से एक छड़ी ख़रीद लेने की इजाज़त मिल जाएगी ताकि मैं उसे रोक के तौर पर इस्तिमाल कर सकूँ । इस में आप लोगों को भी कोई एतराज़ ना होगा । लाजवंती: एतराज़ क्यों नहीं होगा । तुम छड़ी ख़रीद लो और मेरे पास नगोड़ा एक करोशिया ही रहे । तुम जब चाहो मुझे इस छड़ी से धुन डालो और मैं ये अकेला क्रोशिया लिए तुम्हारा मुँह देखती रहूं, पिटती जाऊं, ना बाबा । मैं भी ये कान्फ़्रैंस बिठाऊँगी और इस में इस बात का फ़ैसला कराऊँगी कि मुझे अपनी हिफ़ाज़त के लिए वो चाक़ू जिससे तरकारियां बनाई जाती हैं उठा कर अपने पास रख लेना चाहीए ताकि ये अपनी छड़ी का इस्तिमाल ना कर सकें । लड़ाई को बंद करने के लिए आप सब मेरा साथ देंगे क्या ग़लत कह रही हूँ मैं?

निरावन: नहीं आप बिलकुल ठीक कह रही थी । मगर मुझे ख़तरा पैदा हो जाएगा कि अगर मेरे होते हुए आप दोनों का झगड़ा हो गया क्रोशिया, छड़ी और तरकारियां काटने वाले चाक़ू का इस्तिमाल शुरू हो गया तो मैं अपनी जान कैसे बचाऊंगा । क्या पता कि मैं ज़ख़मी हो जाऊं सो मैं फ़ौरन ही आप लोगों से दरख़ास्त करूँगा कि एक जगह बैठ कर आपस में समझौता कर लिया जाये चुनांचे फ़ैसला ये होगा कि मैं भी अपने बचाओ के लिए एक मामूली सी चीज़ । मिसाल के तौर पर वो शिकारी चाक़ू जो मैंने थोड़े ही रोज़ हुए मेरठ से मंगवाया है जेब में रख लिया करूँ । इस से ये होगा कि हमें एक दूसरे से किसी किस्म का ख़तरा नहीं रहेगा ।

किशवर: शिकारी चाक़ू । बाप रे! । नहीं नहीं निरावन ये नहीं चलेगा । क्या पता है कि हंसी हंसी मैं तुम्हारा ये शिकारी चाक़ू मेरा ही शिकार कर दे । मुझे अपनी हिफ़ाज़त के लिए एक छोटा सा पिस्तौल ख़रीदना ही पड़ेगा । ख़ाह एक महीने की सारी तनख़्वाह इसी में ना चली जाये ये पिस्तौल दग़े ना दग़े पर तुम्हें अपना शिकारी चाक़ू निकालते वक़्त उस का डर तो रहेगा । लाजवंती: पिस्तौल ? यानी आप जब चाहें मुझे गोली का निशाना बना दें ना बाबा । ये नहीं हो सकता । आपके पास छड़ी हो और ऊपर से ये गोलीयों वाला पिस्तौल । जूंही मुझे पता चलेगा कि आप पिस्तौल ले आए हैं मैं भी अपनी हिफ़ाज़त के लिए एक राइफ़ल ख़रीद लूंगी । किशवर: तो ज़ाहिर है कि मुझे एक मशीन गन लेना पड़ेगी ।

लाजवंती: मैं वो ज़हरीली गैस मंगवा लूंगी जो हाल ही में दुश्मनों को मारने के लिए बनाई गई है । निरावन: बस-बस इधर मैं दो बंब ले आऊँगा तो इस घर में बिलकुल अमन क़ायम हो जाएगा ।लड़ाई का बिलकुल अंदेशा ना रहेगा । सुख और चैन इस घर की बलाऐं लेंगे । ना रहेगा बाँस और ना बजे की बाँसुरी । सब ठीक हो जाएगा । लाजवंती: सब ठीक हो जाएगा? किशवर: (तंज़िया अंदाज़ में) हाँ सब ठीक हो जाएगा।

Follow us on twitter