दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से लड़ रही है और हम हिंदू-मुस्लिम में उलझे हुए हैं

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विचार । पल्लव जैन

दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन का असर दिखाई देने लगा है। कहीं जंगल के जंगल आग से तबाह हो रहे हैं तो कहीं मौसम में हो रहे अचानक बदलाव से लोग घबराए हुए हैं। कभी न देखी हो ऐसी गर्मी, सूखा झेलने वाले क्षेत्रों में बाढ़ तो कहीं खून जमा देने वाली सर्दी। मौसम चक्र में हो रहा अनदेखा बदलाव चिंताएं बढ़ा रहा है। पृथ्वी का तापमान 1 डिग्री बढ़ चुका है, दुनिया के देशों ने मिलकर इसे देढ़ डिग्री पर रोकने के लिए कार्बन उतसर्जन में कमी लाने का मसौदा तैयार किया। कई देश इसे अमल में लाने में जुट चुके हैं। लेकिन हम निश्चिंत होकर घरों में सो रहे हैं, यह मानकर की हम कुछ नहीं कर सकते। हमारे नेता सिंगल यूज़ प्लास्टिक पर बैन लगाने का ऐलान लाल किले से करते हैं लेकिन उसे अमल में नहीं ला पाते। विकास के नाम पर सरकार ने पिछले चार साल में जंगलों की ज़मीन को काट कर वहां इंडस्ट्री लगाने के लिए हरी झंडी दे दी लेकिन हमें नहीं पता चला। क्यों? क्योंकि हमारे सामने ऐसे मुद्दे रख दिए गए जिसमें हम उलझे रहें और हमारा ध्यान प्रकृति के हो रहे बेतहाशा दोहन की तरफ न जाए।

एक करोड़ दस लाख पेड़ों की कटाई

इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने इस साल वन क्षेत्रों में पड़ने वाली 99% परियोजनाओं को मंज़ूरी दे दी। जिसमें एक करोड़ दस लाख पेड़ों की कटाई शामिल है। आखिर क्यों? आखिर क्यों पर्यावरण से संबंधित नियमों में बदलाव किए जा रहे हैं। क्यों इंडस्ट्री लगाने के लिए वन क्षेत्र की ज़मीन का अधिग्रहण किया जा रहा है। कोई सवाल क्यों नहीं करता? केंद्र के आदेश पर 2015 से 2017 के बीच इंडस्ट्रीज़ लगाने के लिए तय नियमों में ढील दी गई। जिससे की उद्योगपति जल्द से जल्द इंडस्ट्री लगा सके इसमें प्रदूषण नियंत्रण संबंधित नियमों में ढिलाई शामिल है। यानि अब फैक्ट्रियां मनमाने ढंग से प्रदूषण उत्पन्न करेंगी कोई उसकी जांच करने नहीं जाएगा। पहले स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड जाकर फैक्ट्रियों से उतपन्न होने वाले प्रदूषण की जांच कर सर्टिफिकेट जारी करता था लेकिन अब वे थर्ड पार्टी से यह सर्टिफिकेट जारी करवा सकते हैं। इसका उद्देश्य ईज़ ऑफ डूईंग बिज़नेस को बढावा देना है। लेकिन दिन प्रतिदिन भारत में प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है।

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प्राकृतिक आपातकाल में भी राजनीति

दुनिया के 15 सबसे प्रदूषित शहरों की लिस्ट में 14 भारत के हैं। हम अपने देश को विकास के नाम पर कहां लेकर जा रहे हैं इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है। जब दिल्ली में प्रदूषण का स्तर अति गंभीर हुआ तब केंद्र सरकार सोती रही और राज्य सरकार राजनीति करती रही। इससे अंदाज़ा लगा लीजिए अगर देश ऑस्ट्रेलिया की तरह जलवायू परिवर्तन की वजह से आपातकाल की स्थिति में आएगा तो आप उसके परिणाम भुगतेंगे और राजनेता एक दूसरे पर आरोप लगाते रहेंगें।

पीने योग्य पानी के लिए मोहताज

सीपीसीबी 2018 की रिपोर्ट बताती है कि 351 नदियों के आसपास वाले इलाकों का पानी पीने योग्य नहीं बचा यानी फैक्ट्रीयों से इन नदियों में रसायन छोड़े जा रहे हैं।

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यह उन्ही मानकों में ढील की वजह से है जिसकी बात हमने ऊपर की है। 2014 में सरकार ने फैक्ट्रियों की होने वाली नियमित जांच के नियम को कमज़ोर कर दिया। 63 तरह की फैक्ट्रियों को सेल्फ सर्टिफिकेशन की छूट दे दी यानी आप खुद ही यह लिख कर दे दो की हम पाक साफ हैं। 83 प्रकार की फैक्ट्रीयों को तीसरी पार्टी से सर्टिफिकेट लेने की छूट दे दी यानी पैसा फेको सर्टिफिकेट बनवाओ और पाक साफ हो जाओ। बताईए इतनी छूट दे दी है इंडस्ट्री लगाने वालों को फिर भी रोज़गार का संकट। यहां अब कोई बोलेगा इनको रोज़गार भी चाहिए, विकास भी चाहिए और पर्यावरण भी बचाना है।

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तो कुल मिलाकर जलवायू परिवर्तन का मुद्दा मेनिफेस्टो में नहीं आया है अबतक, क्योंकि सड़कों पर हम अभी पर्यावरण के लिए उतरे नहीं है। अभी तो पहले हमें इस धरती की नागरिकता लेनी है फिर हम सोचेंगे इसे बचाने के बारे में…

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