किसानों का असली दुश्मन, जलवायु परिवर्तन

बिहार का किसान
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फ़िलहाल देश में किसानों का आन्दोलन मीडिया की सुर्खिया बटोर रहा है। किसानों से जुड़ी हर रिपोर्ट में एमएसपी और आढ़ती शब्द जगह बनाए हुए हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन एक ऐसा शब्द युग्म है जिसका प्रयोग किसानों और किसानी के संदर्भ में ज़्यादा से ज़्यादा होना चाहिए।

इसकी वजह यह है कि भारतीय किसानों का सबसे बड़ा दुश्मन जलवायु परिवर्तन है। लेकिन समस्या यह है कि इस दुश्मन को न किसान देख पा रहे हैं हैं उन्हें मीडिया दिखा रही है। फ़िलहाल, ताज़ा ख़बर ये है कि भारतीय किसान पहले से ही जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की चपेट में हैं। औसत वार्षिक तापमान बढ़ने से फसल की पैदावार/ उपज में गिरावट आई है और बेमौसम बारिश और भारी बाढ़ से फसल क्षति के क्षेत्र में वृद्धि हो रही है। यह सारी जानकारी आज क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा जारी एक रिपोर्ट से मिलती है। इस ब्रीफिंग रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे जलवायु परिवर्तन भारत की कृषि को प्रभावित कर रहा है।

ब्रीफिंग  में कहा गया है कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन निश्चित रूप से भारत के कृषि के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इस बात के बढ़ते सबूत हैं कि इन परिवर्तनों से भूमि उत्पादकता में कमी आएगी और सभी भारतीय प्रमुख अनाज फसलों की उपज के साथ-साथ उपज परिवर्तनशीलता में भी वृद्धि होगी। प्रमुख उत्पादित फसलों में, गेहूं और चावल सबसे कमज़ोर हैं। बढ़ता तापमान भारतीय कृषि के लिए सबसे बड़ा जोखिम है। सबसे बुरी स्थिति में, भारत अपनी आबादी को खाना खिलाने के लिए भोजन का आयातक बन सकता है।

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जलवायु-प्रेरित फसल की विफलताएँ आय में कमी ला रहीं हैं और भविष्य में, वार्षिक कृषि आय के नुकसान का अनुमान 15% -18% के बीच है, जो असिंचित क्षेत्रों के लिए 20% -25% है। किसानों की आजीविका पर आय में गिरावट का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है, पहले से ही किसानों में ऋणग्रस्तता, बेरोजगारी, मिटिगेशन, भूख और आत्महत्याओं की वृद्धि हुई है।

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● कोविड-19 ने भारत की कृषि की कमजोरियों को उजागर किया क्योंकि एक से संकट ने सभी आकारों के खेतों को चोट पहुंचाई। लेकिन इस सेक्टर को “प्रकृति-आधारित रिकवरी” की ओर अग्रसर करने का एक अवसर है। जलवायु-स्मार्ट कृषि उपज और आय बढ़ा सकता है और उत्सर्जन को कम कर सकता है। प्रकृति में निवेश महान आर्थिक लाभ और व्यापार के अवसरों को उजागर कर सकता है। फसल बीमा और ऋण जैसे संरचनात्मक सुधार, पूंजी तक पहुंच और पैदावार को बढ़ावा दे सकते हैं। स्थानीय और छोटी आपूर्ति श्रृंखलाओं को बढ़ाने से लचीलापन बढ़ सकता है और किसानों को बाजारों में जोड़ा जा सकता है, जो लॉकडाउन के दौरान प्रमुख समस्याओं में से एक रही।

ये यह भी बताता है कि इन परिवर्तनों से किसानों द्वारा सामना की जाने वाली सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना कैसे होगा।

रिपोर्ट की कुछ मुख्य बातें:

– इस बात के सबूत बढ़ते जा रहे हैं कि औसत अधिकतम तापमान, औसत न्यूनतम तापमान, उतार-चढ़ाव और अत्यधिक वर्षा में परिवर्तन से भूमि उत्पादकता में कमी और अधिकांश फसलों की उपज में कमी, साथ ही उपज परिवर्तनशीलता में वृद्धि हुए और होने वाले हैं।

– अनुमानों में तब्दीली के साथ – गेहूं, चावल, मक्का, चारा, सरसो, सोयाबीन और अन्य गैर-खाद्य अनाज फसलों की उत्पादकता कम होने की संभावना है।

– जलवायु-प्रेरित फसल विफलताएँ आय में कमी कर रही हैं और भविष्य में वार्षिक कृषि आय के नुकसान का अनुमान 15% -18% के बीच है, जो असिंचित क्षेत्रों के लिए 20% -25% है। भारत में कुल श्रमिकों का 55% या 263 मिलियन कृषि श्रमिक प्रतिनिधित्व करतें हैं।

भारत सरकार के अनुसार, मॉडल्स बताते हैं कि 21-वीं शताब्दी के अंत तक औसत तापमान 4.4 ° C बढ़ सकता है, जिससे हीटवेव बढ़ेंगें (3-4 बार) और सूखा भी  (2100 तक 150% तक)। औसत, वर्षा की चरम और अंतर-वार्षिक परिवर्तनशीलता बढ़ जाएगी, और अनुमान है कि मानसून का मौसम अधिक तीव्र होगा और बड़े क्षेत्रों को प्रभावित करेगा। 2100 तक समुद्र का स्तर 20-30 सेमी बढ़ने की उम्मीद है, विशेष रूप से उत्तर हिंद महासागर में। ये सभी बदलाव कृषि के महत्वपूर्ण क्षेत्रों, विशेष रूप से तटीय दक्षिण भारत, मध्य महाराष्ट्र, इंडो-गेनजेटिक मैदानों और पश्चिमी घाटों, को प्रभावित करेंगे।

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– कृषि संकट के कारण 2011-2016 के बीच औसतन नौ मिलियन श्रमिक प्रवास कर गए। किसान बेहतर परिस्थितियों के लिए भी विरोध कर रहे हैं; 2014-16 के बीच विरोध प्रदर्शन आठ गुना बढ़ गए हैं।

– फसल बीमा योजनाओं से निजी बीमाकर्ता बाहर हो रहे हैं, इसके लिए जलवायु परिवर्तन को आंशिक रूप से जिम्मेदार ठहराया गया है। यह घटती उत्पादकता लागत को बढ़ाती है और किसानों के लिए अपने ऋणों को चुकाना कठिन बना देती है, विशेषकर बीमा तक पहुँच के बिना। परिणामस्वरूप, भारत की जनगणना के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में औसत मृत्यु दर (2014-16 के बीच 5.1%) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में औसत मृत्यु दर (2014-16 के बीच 7.1% औसत क्रूड डेथ रेट) अधिक है, और हालांकि आत्महत्याएं इसका एक छोटा सा हिस्सा हैं, वे बहुत चिंता का कारण हैं।

– एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि वार्मिंग पूरे भारत में सालाना 4,000 से अधिक अतिरिक्त मौतों के लिए जिम्मेदार है, जो वार्षिक आत्महत्याओं के ∼3% के लिए जिम्मेदार है। 1980 के बाद से, वार्मिंग और आगामी फसल क्षति को 59,300 किसान आत्महत्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

– जैसे-जैसे किसानों को अधिक उत्पादन घाटा होगा, सरकारी खर्चों में वृद्धि होगी। यह अनुमान लगाया गया है कि कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 1.5% की हानि होगी, जबकि RBI भविष्यवाणी करता है कि GDP का लगभग 3% उन्हें काउंटर करने पर खर्च किया जाएगा।

– अंतर्राष्ट्रीय स्वीकरन बढ़ रहा है कि कोविड दुनिया को अधिक प्रकृति आधारित वसूली को शामिल करने की आवश्यकता है, विशेष रूप से कृषि और कृषि वानिकी क्षेत्रों के लिए। खाद्य और भूमि उपयोग गठबंधन की एक हालिया रिपोर्ट में पाया गया कि हम जिस तरह से खेती करते हैं और भोजन का उत्पादन करते हैं, वह 2030 तक वैश्विक रूप से नए व्यापार अवसरों में एक वर्ष में USD 4.5 ट्रिलियन जारी कर सकता है। विश्व आर्थिक मंच (वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम) की न्यू नेचर इकोनॉमी (नई प्रकृति अर्थव्यवस्था) रिपोर्ट में पाया गया कि 2030 तक खाद्य, भूमि और महासागर क्षेत्र में निवेश से वैश्विक स्तर पर 191 मिलियन नई नौकरियां पैदा हो सकती हैं।

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Contributor: Nishant, a Lucknow-based journalist and environment enthusiast working towards prioritization of issues like climate change and environment in Hindi and vernacular media.

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