Journalist Injured in Kanpur Protest

कानपुर हिंसा कवर करते हुए घायल ग्राउंड रिपोर्ट संवाददाता ने बयां किया मंज़र

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ग्राउंड रिपोर्ट । न्यूज़ डेस्क

देशभर में एनआरसी और सीएए के विरोध में हो रहे प्रदर्शन की हमने बीते हफ्ते कई तस्वीरें देखी। कहीं आगजनी, कहीं पथराव, कहीं आंसू गैस के गोले से भीड़ को तितर बितर करती पुलिस, तो कहीं हवा में गोली चलाती पुलिस। उत्तर प्रदेश से कई चौकाने वाली तस्वीरें भी सामने आई। लोगों ने पुलिस पर गोली चलाने के आरोप भी लगाए लेकिन यूपी पुलिस ने गोली चलाने की बात को अस्वीकार कर दिया। जबकि कई वीडियो में पुलिस को पथराव करते और गोली चलाते देखा गया। बिजनौर में 20 वर्षीय मुहम्मद सुलेमान की मौत पुलिस फायरिंग में होने की बात आखिर यूपी पुलिस के अधिकारी ने स्वीकार की और कहा कि सेल्फ डिफेंस में चलाई गोली से मुहम्मद सुलेमान की मौत हुई। जामिया में हुई हिंसा की सीसीटीवी फुटेज सामने आई जिसमें लोगों को पुलिस पर पथराव करते और आगज़नी करते साफ देखा गया। कानपुर में भी हिंसा में मुहम्मद शरीफ की 30 वर्षीय बेटे मुहम्मद रईस की हिंसा के दौरान पुलिस की गोली से मौत हो गई। रईस के पेट में गोली लगी थी। रईस का परिवार पापड़ बेच कर अपनी रोज़ी चलाता है। रईस की मां ने बताया कि उनके बेटे को आसपड़ोस के लोग गोली लगने के बाद घर लेकर आए। पुलिस वालों ने उसे अस्पताल पहुंचाने तक की ज़हमत नहीं उठाई।

कानपुर हिंसा में घायल हुए ग्राउंड रिपोर्ट पत्रकार की आपबीति-

पुलिस का पहले फायरिंंग की बात से मुकरना और फिर यह कबूल करना कि क्रॉस फायरिंग और सेल्फ डिफेंस में मौत हुई, कई सवाल पैदा करता है। कानपुर में जब हिंसा हुई तब ग्राउंड रिपोर्ट के संवाददाता भी वहां मौजूद थे। वो वहां स्टोरी कवर करने गए थे। उनका कहना है कि पुलिस ने उनपर ईंट फेंकी जिससे उनके जबड़े में चोट आई, पुलिस नें उनके मोबाईल से रिकॉर्ड किए गए हिंसा के वीडियो भी डिलीट कर दिए। पढ़िए हमारे संवाददाता की आपबीति-

जो कुछ पिछले 4 दिनों से मेरी आँखों ने देखा और अभी देख रही हैं। उसे सारी जिंदगी भुला पाना मेरे बस की बात नहीं। इससे पहले अपने शहर में बहुत से छोटे-मोटे दंगे फसाद देखें हैं। जनता और पुलिस दोनों का तमाम बर्बर से बर्बर रूप देखा है। मगर ज़िन्दगी में पहली बार पुलिस का इतना बर्बर और साम्प्रदायिक रूप देखा। ये सच है कुछ उपद्रवियों ने हिंसा की शूरुआत की थी। पत्थरबाज़ी/आगज़नी को अंजाम दिया था। पुलिस ने सरकार के इशारे पर जो किया, उसको मैं बाद में विस्तार से बयान करूँगा एक-एक घटना क्रम!!

मुझे दंगे-फसाद जैसी स्थिति को कवर करने का ख़ासा अनुभव नहीं है। पत्रकारिता के क्षेत्र में मात्र 2 साल का ही अनुभव है। जान हथेली पर लेकर चलती गोलियों के बीच पहली बार कुछ कवर करने का प्रयास कर रहा था।

यतीम खाना परेड पर मैंने देखा कि कुछ पुलिस वाले बोतलों से गाड़ियों में कुछ पलट रहे हैं। पहले मैं समझ नहीं पाया कि बोतल में क्या है। मगर कुछ ही पल में गाड़ियों में आग लग गयी।

मैं समझ गया था कि इसमें पेट्रोल ही है। जैसे ही कुछ पुलिस वालों ने दूसरी गाड़ियों में तेल डाला मैंने अपना मोबाइल निकाला और उसको कैप्चर करने की कोशिश की। मैं घुटनों पर बैठा था । उपद्रवियों की भीड़ जमा थी और लगातार पुलिस पर पत्थरबाजी कर रही थी।

मैंने मोबाइल निकालकर उनकी तरफ़ घुमाया ही था कि उतनी ही देर में एक पुलिस वाले ने ईंट मेरे मोबाइल को निशाना बनाते हुए मारी। ईंट मोबाइल को मिस करते हुए मेरे चेहरे पर लगी।

मैं ज़मीन पर गिरा और आंखों के सामने अंधेरा सा छा गया। मुझे लगा मुझे कहीं गोली न मार दे। मैं बेसुद हालात में अपना मोबाइल उठाकर उस पुलिस वाले कि दोबारा वीडियो बनाने की कोशिश की मगर असफल रहा।

कुछ लोगों ने उठाया और मुझे लेकर भागे। मेरी नाक से ख़ून जारी था। मुझे लगा कि मेरा जबड़ा भी टूट गया। लोग मुझे जब लेकर भागे तो सब पूछ रहे थे, “क्या हुआ, इसको भी गोली मार दी क्या”! एक आवाज़ आयी, “अबे ये तो पत्रकार है इसको किसने पीट दिया”। मैं बेसुद था। कुछ पल के लिये कुछ समझ नहीं सका। ख़ैर ज़्यादा चोट नहीं आई। नाक फट गयी थी। झबड़े में दर्द है।

मैं बहुत मजबूत दिल का इंसान हूँ। कई साल हो गए मुझे याद भी नहीं मैं लास्ट बार कब रोया था। मगर पुलिस , सरकार और उसकी बर्बरता ने मुझे रुला दिया । मुझे पता है कि मैं सच नहीं लिख पाऊंगा। सभी अखबारों ने जो झूठ फैलाया उसपर ज़रूर लिखूँगा।