पुस्तक समीक्षा : बिर बुरु के दावेदार ऊर्फ जंगल पहाड़ के दावेदार

Bir Buru Ke davedaar
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बिर बुरु के दावेदार पुस्तक की लेखिका आलोका कुजूर कहती हैं’ ‘‘बचपन से ही पहाड़ सपने में आता था अनगिनत सपने में अनगिनत पहाड़ से मिलना हुआ। हर सपने में नए पहाड़ से मुलाकात हुई। आश्चर्य की बाद में हकीकत में उन पहाड़ों से मुलाकात हुई जो सपने में आते थे। मैंने अपनी मां को अपने सपने और पहाड़ के बारे में बताया। मां ने कहा कि मकान में तुम रहती हो उसके नीचे एक पहाड़ है जिसे मुंडारी में बुरु बोलते हैं। काफी साल पहले चार महिने तक पानी और तूफान आया था जिससे हो सकता है कि वह पहाड़ जमीन के नीचे दब गया हो और हो सकता है वो मरंगबुरु हो और तुम उसके दावेदार हो इसलिय वह अपने सब परिवार के सदस्यों से तुम्हें सपने में मिलाता है।’

बुरु यानि पहाड़, बोंगा यानि भगवान। आदिवासी मुंडा समुदाय पहाड़ को ही अपना देवता मानते है। झारखण्ड, छोटानागपुर के दक्षिण भाग मुण्डा आदिवासी का इलाका है। इन इलाकों में 31 दिसम्बर से ले कर 14 जनवरी तक मुंडा आदिवासी के इलाके में बुरु यानि की पहाड़ो की पूजा होती है। कहा जाता है पहाड़ हमें कई विपत्तियों से बचाता रहा है। इसलिए पूरा मुण्डा समाज में इसकी विशेष पूजा होती है और गांव-गांव में जतरा यानि मेला लगता है। हर मुण्डा आदिवासी के घर में इसकी पूजा होती है। यह मुंडा आदिवासी संस्कृति का एक बड़ा हिस्सा है।

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झारखंड में सामाजिक कार्यों में सक्रिय जुझारू पत्रकार आलोका कुजुर ने पहाड़ के प्रति अपने अनजाने लगाव के कारण पहाड़ो के बारे में शोध और अध्ययन शुरू कर दिया। लगभग तीस से अधिक पहाड़ों के बारे में उन्होंने पता लगाया जिनसे उनकी मुलाकात पहली बार सपने में हुई और बाद में हकीकत में हुई। सब के नाम लिखकर रखने लगी। कुछ समय बाद झारखण्ड के गीतों में पहाड़ के जिक्र ने उन्हें फिर आकर्षित और बेचैन करने लगा। पहाड को लेकर उनके मन में चलने वाले द्वंद और पहाड़ के बारे में अपने शोध को कविताओं में पेश किया है। इस महत्वपूर्ण पुस्तक को आप अमेजन किंडल पर पढ़ सकते हैं पहाड़ो के बारे में काव्यों के जरिए दुलर्भ जानकारी देने वाली इस पुस्तक को साची प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।

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