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2019 में BJP की सरकार बनने के बावजूद नरेंद्र मोदी नहीं बन पाएंगे प्रधानमंत्री?

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न्यूज़ डेस्क।। लोकसभा चुनाव 2019 की सरगर्मी शुरू हो चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुक्तसर से अपने चुनाव अभियान की शुरुआत कर दी है। पीएम मोदी के सेनापति अमित शाह भी समर्थन के लिए जनसंपर्क में जुट गए हैं। विपक्ष इस बार मोदी को बराबरी की टक्कर देने के लिए कमर कस चुका है। वहीं राजनीतिक पंडितों की ओर से कई तरह की भविष्यवाणियों का दौर शुरू हो गया है।

उपचुनाव में मोदी को मिली करारी शिकस्त
अब तक 2019 का चुनाव एक तरफा माना जा रहा था। उमर अब्दुल्ला ने उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिली जीत के बाद कहा था कि अब विपक्ष को सीधे 2024 चुनावों की तैयारी करनी चाहिए। लेकिन राजनीति में हवा बदलने में देर नहीं लगती। उत्तरप्रदेश के कैराना, फूलपुर और गोरखपुर उपचुनावों में धुर-विरोधी विपक्षी दलों ने साथ आकर ऐसी व्यूह-रचना की जिसमें अब तक अपराजेय मोदी को भी पराजय का स्वाद चखना पड़ा।

हो सकता है 50 सीटों का नुकसान
लोकसभा में जीत का रास्ता उत्तर प्रदेश और बिहार से होकर ही गुज़रता है। 2014 में बीजेपी ने यूपी में 80 में से 73 और बिहार में 40 में से 31 सीटें जीती थी, लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश में भाजपा को कम से कम 50 सीटों का नुकसान हो सकता है, इसका एक कारण सपा और बसपा का साथ चुनाव लड़ना है।

बीजेपी वोट प्रतिशत में भारी गिरवाट
2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा का वोट प्रतिशत 42.63 फ़ीसदी था और बसपा+सपा+कांग्रेस का वोट प्रतिशत 49.83 फीसदी, वहीं 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा का वोट प्रतिशत गिरकर 38.6 फीसदी रह गया है। वहीं एसपी+बीएसपी+कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़कर 50.3 फीसदी हो गया।

सीटों के बंटवारें में उलझन
अगर यह गठबंधन 2019 लोकसभा तक जारी रहा तो मोदी का सिंहासन हिलाने में कामयाब हो सकता है। बिहार में इस बार भाजपा और नीतीश साथ है ऐसे में सीटों के बटवारे में जनता दल यूनाइटेड को कम से कम 15 सीटें देनी होगी जिसे पिछले चुनाव में केवल 2 सीट ही हासिल हुई थी।

…तो करनी होगी अन्य सहयोगियों की तलाश 
सीटों के बटवारें को लेकर भाजपा जदयू में रार खिंचना तय है। यहां होने वाले सीटों के नुकसान की भरपाई भाजपा पूर्वोत्तर और दक्षिणी राज्यों से करना चाहती है। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह पूर्वी राज्यों पर ज़्यादा ज़ोर देते दिखाई दे रहे हैं, लेकिन इन राज्यों में सीटों की संख्या ज्यादा नहीं है ऐसे में अगर बीजेपी 2019 में अपने दम पर 272 का जादुई आंकड़ा नहीं छू पाई तो उसे सहयोगियों की तलाश करनी होगी।

बीजेपी से नाराज एनडीए के सहयोगी दल
मौजूदा सहयोगी मोदी सरकार से छिटकते नज़र आ रहे हैं। सबसे बड़ी सहयोगी शिवसेना खुल कर मोदी सरकार का विरोध करती रही है और दूसरी टीडीपी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने को अमादा है। जम्मू में पीडीपी से गठबंधन टूट चुका है और  छोटे सहयोगी भी मोदी सरकार से नाराज चल रहे हैं। ऐसे में नए सहयोगियों की तलाश भाजपा को करनी होगी। क्योंकि अगर 2019 में भाजपा अपने दम पर 272 का जादुई आंकड़ा छूने में नाकामयाब नहीं हो पाई तो गठबंधन के बिना सरकार बनना मुश्किल हो जाएगा और ऐसी स्थित में NDA के दल ही प्रधानमंत्री की कुर्सी पर कौन बैठेगा यह तय करेंगे।

प्रधानमंत्री पद का साझा उम्मीदवार
प्रधानमंत्री मोदी से नाराज़ चल रही शिवसेना किसी और को प्रधानमंत्री बनाने की मांग रख सकती है। इस बात का संकेत हाल ही में मोहन भागवत द्वारा प्रणब मुखर्जी को आरएसएस के कार्यक्रम में आमंत्रित करने पर शिवसेना दे चुकी है। शिवसेना ने कहा कि आरएसएस प्रधानमंत्री पद के लिए किसी साझा उम्मीदवार की तलाश कर रही है।

दलितों-अल्पसंख्यकों में सरकार के खिलाफ अंसतोष
मई 2018 में एबीपी न्यूज़-CSDS द्वारा किये गए सर्वे पर नज़र डालें तो 2019 में मोदी सरकार के लौटने की संभावना कम है। 19 राज्यों में करीब 15849 लोगों पर किये गए सर्वे में 47% लोगों ने कहा कि मोदी सरकार को दूसरा कार्यकाल नहीं मिलना चाहिए। इस सर्वे के अनुसार दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों में सरकार के खिलाफ असंतोष बढ़ा है।

जानी मानी स्तंभकार तवलीन सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस में अपने कॉलम में लिखा कि, अब हमें यह सोचना शुरू कर देना चाहिए कि 2019 में मोदी नहीं तो फिर कौन? उनके कॉलम को और ज्यादा विस्तार से पढ़ने के लिए आप इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं –Read Tavleen Singh’s column

भारतीय राजनीति हमेशा से रोचक रही है। यहाँ सरकार 1 वोट से गिरी भी हैं और प्रचंड बहुमत से बनी भी है। इतना साफ है कि 2019 का रास्ता विपक्ष और सरकार दोनों के लिए आसान नहीं है। जनता जनार्दन क्या चाहती है यह तो समय ही बताएगा लेकिन तब तक कयासों का दौर जारी रहेगा…

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